कौन थे कर्पूरी ठाकुर, जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देने का मोदी सरकार ने किया एलान
कर्पूरी ठाकुर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और एक प्रमुख समाजवादी नेता थे। मोदी सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की है। यह जानकारी राष्ट्रपति भवन से सामने आई है।
जननायक के नाम से लोकप्रिय कर्पूरी ठाकुर को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान देने की घोषणा उनकी 100वीं जयंती से ठीक एक दिन पहले की गई है। लोकसभा चुनावों से पहले इस तरह का एलान बिहार की राजनीति के लिए काफी मायने रखता है।

दो बार रहे बहार के मुख्यमंत्री
बिहार के समस्तीपुर जिले में जन्मे कर्पूरी ठाकुर दो बार (अलग-अलग समय में) राज्य के मुख्यमंत्री रहे। राज्य में उन्हें पिछड़े वर्ग को आवाज देने वाले पहले नेता के तौर पर जाना जाता है।
लालू-नीतीश की राजनीति के आधार बने कर्पूरी ठाकुर
24 जनवरी, 1924 को जन्मे कर्पूरी ठाकुर की राजनीति बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव की सियासत का भी आधार रही है। उनका निधन 17 फरवरी, 1988 को हुआ था।
उनके जन्म स्थान का नाम अब कर्पूरी ग्राम है
वह बिहार की अति पिछड़ी नाई जाति से ताल्लुक रखते थे। समस्तीपुर के जिस पितौझिया गांव में उनका जन्म हुआ, वह अब कर्पूरी ग्राम के नाम से जाना जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम में 26 महीने जेल में रहे
उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी छात्र नेता के तौर पर हिस्सा लिया था, और लगभग 26 महीने जेल में भी गुजारे थे।
दो बार बने बिहार के मुख्यमंत्री
बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर उनका पहला कार्यकाल सोशलिस्ट पार्टी/भारतीय क्रांति दल से दिसंबर 1970 से लेकर जून 1971 के बीच रहा। दूसरी बार वे जनता पार्टी की सरकार में दिसंबर 1977 से लेकर अप्रैल 1979 तक मुख्यमंत्री रहे।
अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे कर्पूरी ठाकुर
बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर आज भी मायने रखते हैं तो इसके पीछे थी उनकी कट्टर ईमानदारी। वह बहुत ही सामान्य जीवन जीना पसंद करते थे और यही वजह है कि दो-दो बार सीएम रहने पर भी धन-संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं था।
पिछड़ों को आरक्षण देने का रास्ता खोला
उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री बनने पर मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशें लागू करके पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का ऐसा रास्ता खोला कि प्रदेश की सियासत में तब से यही सबसे प्रमुख मुद्दा बन गया। हालांकि, कहते हैं कि इसी के चलते वह कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
'कर्पूरी डिविजन' का किस्सा
कर्पूरी को लेकर एक किस्सा और बहुत ही दिलचस्प है। उनके कार्यकाल में जो बच्चे मैट्रिक पास होते थे तो उन्हें 'कर्पूरी डिविजन' से पास कहा जाता था। इसकी वजह ये थी कि उन्होंने बिहार परीक्षा बोर्ड में अंग्रेजी में पास करने की बाध्यता को खत्म कर दिया था।
जबतक जीवित रहे गरीबों और पिछड़ों की आवाज बने
नीतीश से पहले उन्होंने भी बिहार में शराबबंदी का प्रयोग किया था, लेकिन सरकार बदलते ही वह फिर शुरू हो गया था। उनकी सादगी के कई किस्से आज भी बिहार की राजनीति में मशहूर हैं।
मसलन, उनकी दिनचर्या इतनी साधारण थी कि वह अपने कपड़े खुद ही धोकर सुखाते थे और बिना आयरन किए पहन लेते थे। कहते हैं कि वह अपने लिए हैंडपंप से पानी भी खुद ही भरना पसंद करते थे।
अपने क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि पहली बार 1952 में विधानसभा का चुनाव जीते, उसके बाद जब भी लड़े जीतते ही चले गए। उन्होंने आज के समाजवादी नेताओं के विपरीत अपने राजनीतिक जीवन में हमेशा गरीबों के हितों की बात की और उनके लिए सड़क से सदन तक संघर्ष किया।












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