कौन हैं एनकाउंटर में मारे गए 'मुजाहिद प्रोफ़ेसर'?
भारत प्रशासित कश्मीर में रविवार को शोपियां ज़िले में सुरक्षाबलों ने पांच चरमपंथियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया.
मारे गए पांच चरमपंथियों में हिज़्बुल मुज़ाहिदीन के एक टॉप कमांडर सद्दाम पडर के साथ एक असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर मोहम्मद रफ़ी बट भी शामिल हैं.
ज़िला गांदेरबल निवासी बट कश्मीर यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी पढ़ाते थे. वे तीन दिन पहले गायब हो गए थे. उनके गायब होने के एक दिन बाद कश्मीर यूनिवर्सिटी में बीते शनिवार को प्रदर्शन भी हुए थे.
31 साल के डॉक्टर बट कुछ दिनों पहले तक एक सुलझे हुए बौद्धिक और लोकप्रिय प्रोफ़ेसर और एक बेहतरीन शोधकर्ता के रूप में जाने जाते थे.
5 मई की दोपहर को उन्होंने कश्मीर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में अपना आख़िरी लेक्चर दिया और ग़ायब हो गए.
40 घंटे बाद मौत
सिर्फ़ 40 घंटे के बाद हिज़बुल मुजाहिदीन के चार सशस्त्र चरमपंथियों के साथ वह दक्षिणी कश्मीर के शोपियां ज़िले में घेर लिए गए और मुठभेड़ के बाद मारे गए.
उनकी नई पहचान पिछले पहचानों पर हावी हो गई. लोग अब उन्हें 'मुजाहिद प्रोफ़ेसर' कहते हैं.
श्रीनगर के पूर्वी ज़िले गांदरबल में एक मध्यम परिवार में पैदा होने वाले डॉक्टर रफ़ी असाधारण क्षमताओं के धनी थे.
उन्होंने समाजशास्त्र में मास्टर्स के बाद भारत की राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) दो बार पास किया और इसके लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की तरफ़ से उन्हें फ़ैलोशिप भी मिली.
बाद में उन्होंने पीएचडी की और कुछ सालों पहले ही कश्मीर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में वह बतौर लेक्चरर तैनात हुए थे.
उनके छात्र उनके प्रशंसक थे.
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डॉक्टर रफ़ी के छात्र अब बात करने से कतराते हैं और जो बोलना चाहते हैं वे अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते.
ऐसे चंद छात्रों ने बताया कि डॉक्टर रफ़ी के बारे में ऐसा सपने में भी नहीं सोचा जा सकता था कि वह हथियार उठाने के लिए तैयार हैं.
एक छात्र आगे कहते हैं, "वह तो हमें किताबें तोहफ़े में देते थे. उन्होंने मुझसे वादा किया था कि वह आधुनिकता पर मुझे एक किताब देंगे. मेरा दिमाग़ फट रहा है कि यह सब क्या हुआ और क्यों हुआ."
हथियार क्यों उठाया?
हालांकि, डॉक्टर रफ़ी के रिश्तेदारों का कहना है कि वह जब मीडिया में मारे जाने या ज़्यादतियों के बारे में सुनते थे तो परेशान हो जाते थे.
उनका कहना है, "लेकिन उन्होंने ऐसा कोई इशारा कभी नहीं दिया कि वह हथियार उठाकर लड़ना चाहते हैं."
जम्मू-कश्मीर पुलिस के प्रमुख एसपी वैद्य का कहना है कि डॉक्टर रफ़ी के दो कज़न मारे गए हैं और हो सकता है कि उसकी वजह से उन्होंने यह क़दम उठाया हो.
उनका दावा है कि कट्टरपंथ भी उनके मानसिक बदलाव की वजह हो सकता है.
चंद महीने पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पीएचडी स्कॉलर मनान वानी भी ग़ायब होकर हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो गए हैं.
लेकिन डॉ. रफ़ी बट पहले प्रोफ़ेसर हैं जो बक़ायदा हथियारबंद समूह में शामिल हुए.
तीस साल पहले जब कश्मीर घाटी में सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ था तब कई प्रोफ़ेसर चरमपंथी समूहों के समर्थक होने के शक़ में रहस्यमयी तरीके से मारे गए थे.
इनमें डॉक्टर अब्दुल अहमद गुरू, प्रोफ़ेसर अहमद वानी, डॉ. ग़ुलाम क़दीर वानी, एडवोकेट जलील अंद्राबी आदि शामिल हैं.












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