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कर्नाटक में 'छोटा भाई' बनकर किसे संदेश दे रही कांग्रेस?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
Getty Images
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

कर्नाटक में 'छोटे' गठबंधन सहयोगी जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) को ख़ुश रखने के लिए कांग्रेस पीछे हटती दिखाई दे रही है. ऐसा लगता है कि वह देश के बाकी क्षेत्रीय दलों को संदेश देना चाहती है कि वह किसी भावी गठबंधन में 'बड़े भाई' की भूमिका का मोह छोड़ने को तैयार है.

कांग्रेस ने पहले कर्नाटक में वोटों की गिनती के दौरान ही जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देकर चौंका दिया था. बीजेपी बार-बार कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देती रही है, कांग्रेस का यह क़दम उनके इस विचार को रोकने का था.

जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर एच.डी. कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के नौ दिन बाद कांग्रेस ने महत्वपूर्ण वित्त मंत्रालय भी छोड़ दिया. इसके साथ ही 14 सालों से बना नियम ख़ुद-ब-ख़ुद टूट गया.

कर्नाटक में पहली बार गठबंधन सरकार 2004 में कांग्रेस-जेडीएस ने मिलकर बनाई थी. कांग्रेस के स्वर्गीय धरम सिंह उस समय मुख्यमंत्री बने थे और वित्त मंत्रालय छोटे दल जेडीएस को दिया गया था. उस समय जेडीएस के सिद्धरमैया उप-मुख्यमंत्री बने थे.

दो साल बाद कुमारस्वामी ने सरकार को गिरा दिया और बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार बनाई. इस सरकार में कुमारस्वामी मुख्यमंत्री थे और वित्त मंत्रालय बीजेपी नेता और उप-मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के पास था.

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इस बार भी येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन बहुमत साबित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद पिछले शुक्रवार को कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने विधानसभा में विश्वास मत जीता था. तब से दोनों दल विभिन्न स्तरों पर बातचीत कर रहे थे.

राज्य के कांग्रेस नेताओं से लेकर अहमद पटेल, ग़ुलाम नबी आज़ाद और अशोक गहलोत समेत पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी वित्त मंत्रालय को लेकर पिता-पुत्र की जोड़ी एच.डी. देवेगौड़ा और कुमारस्वामी से बात की थी.

कर्नाटक प्रभारी और कांग्रेस महासचिव वेणुगोपाल ने कुमारस्वामी, उप-मुख्यमंत्री डॉ. जी. परमेश्वरा और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस में स्वीकार किया था कि गठबंधन सरकार में वित्त मंत्रालय एक मुद्दा था.

कार्यकर्ता
EPA
कार्यकर्ता

वेणुगोपाल ने कहा था, "राहुल गांधी जी ने ख़ुद निर्देश दिए हैं कि गठबंधन सरकार देश की आवश्यकता है. देश के बड़े हितों को ध्यान में रखते हुए कुछ फ़ैसले लिए जाने चाहिए. उन्होंने सुबह कुमारस्वामी से बात की और आख़िरकार कांग्रेस पार्टी ने राहुल जी के निर्देश पर वित्त मंत्रालय जेडीएस को 'देने' का फ़ैसला लिया है."

इस सप्ताह बीबीसी के साथ इंटरव्यू में कुमारस्वामी ने कहा था कि उनकी पार्टी वित्त, लोक निर्माण मंत्रालय चाहती है और सिंचाई एवं विद्युत भी उनके पसंदीदा हैं.

कुमारस्वामी से जब पूछा गया कि 'क्या वह वित्त मंत्रालय अपने पास रखकर सत्ता पर पकड़ बनाए रखेंगे?' कुमारस्वामी मुस्कुराए और उन्होंने सहमति में सिर हिलाया. समझौते में जेडीएस ने वित्त मंत्रालय बनाए रखने के लिए सिंचाई विभाग को छोड़ दिया है.

वित्त मंत्रालय क्यों है ख़ास?

किसी भी सरकार में वित्त बेहद ख़ास मंत्रालय होता है क्योंकि किसी भी कार्यक्रम या प्रोजेक्ट की कामयाबी या नाकामी इसे चला रहे शख़्स पर निर्भर करती है. इसके अलावा लोक कल्याण, सिंचाई, विद्युत, शहरी और ग्रामीण विकास और बेंगलुरु शहरी विकास जैसे विभाग भी सरकार के प्रदर्शनों पर असल डालते हैं.

विभागों के अलावा एक सवाल यह भी आया है कि कांग्रेस काफ़ी झुकी है जबकि उसके 79 और जेडीएस के केवल 37 सदस्य हैं

नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, "इसमें क्या ग़लत है जो हमने वित्त, आबकारी और विद्युत विभाग छोड़ दिए हैं? कृपया यह मत भूलिए कि हार के बाद भी हम सत्ता का स्वाद ले रहे हैं."

पार्टी नेता ने आगे कहा, "गठबंधन देने और लेने का मसला होता है. हम दूसरे तरीक़ों से लाभ पा सकते हैं जैसा कि हमने लोकसभा चुनावों के लिए पहले से ही जेडीएस के साथ गठबंधन की घोषणा की है."

एक दूसरे कांग्रेस नेता ने भी नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "कड़े शब्दों में कह रहा हूं कि हमें विपक्ष की कुर्सी पर बैठना चाहिए था. यह संभव नहीं था कि जेडीएस को छोड़कर बीजेपी के पास जाते और उसके विजय अभियान को आगे बढ़ाते. हम जीतने के लिए हमेशा झुक सकते हैं."

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कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार के साथ एचडी कुमारस्वामी
EPA
कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार के साथ एचडी कुमारस्वामी

कांग्रेस क्या संदेश देना चाहती है?

धारवाड़ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर हरीश रामास्वामी ने बताया, "कांग्रेस देशभर के क्षेत्रीय दलों को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह इस स्थिति में है कि दूसरे पायदान पर क्षेत्रीय पार्टी के अधीन भी काम कर सकती है. यह करके वह यह भी बताने की कोशिश कर रही है कि वह भाजपा के ख़िलाफ़ तीसरे मोर्चे का नेतृत्व भी कर सकती है."

प्रोफ़ेसर रामास्वामी के अनुसार, ऐसा फ़ैसला ज़रूरी था क्योंकि क्षेत्रीय दल कांग्रेस की आलोचना करते रहे हैं कि वह गठबंधन में बराबरी के आधार पर सत्ता का बंटवारा नहीं करती है.

रामास्वामी कहते हैं, "कांग्रेस भी अखिल भारतीय पार्टी है और स्थानीय नेताओं को लुभा रही है. उसने बताया है कि जेडीएस के साथ वह दूसरे दर्जे पर भी रह सकती है. वह दूसरे राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं को लुभाने के लिए देवेगौड़ा का इस्तेमाल कर सकती है. कांग्रेस पंडितजी (जवाहरलाल नेहरू) के समय की ओर लौटी है और सिद्धरमैया की तरह क्षेत्रीय नेताओं को तवज्जो दे रही है.

वेणुगोपाल से जब पूछा गया कि जेडीएस के सामने वित्त मंत्रालय को लेकर कांग्रेस पीछे क्यों हटी? इस पर उन्होंने कहा, "पीछे हटने का सवाल नहीं है. मैंने आपसे कहा है कि यह गठबंधन देश के हित के लिए है."

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