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कौन हैं NCERT डायरेक्टर दिनेश प्रसाद? किस जाति से? जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भेजा नोटिस, किताब विवाद क्या है?

NCERT Director Dinesh Prasad Saklani: देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था के केंद्र में खड़ी संस्था National Council of Educational Research and Training यानी NCERT एक बड़े विवाद में घिर गई है। कक्षा 8वीं की सोशल साइंस की नई किताब में 'करप्शन इन ज्यूडीशियरी' चैप्टर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने 26 फरवरी को सुनवाई करते हुए न सिर्फ किताब के प्रिंट और डिजिटल संस्करण पर रोक लगाई, बल्कि शिक्षा मंत्रालय के सचिव और NCERT के निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने टिप्पणी की कि मामला न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश जैसा प्रतीत होता है। अदालत ने चेतावनी दी कि जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी और जरूरत पड़ी तो अवमानना की कार्यवाही भी हो सकती है। अगली सुनवाई 11 मार्च को तय है। ऐसे में आइए जानें कौन हैं NCERT के डायरेक्टर दिनेश प्रसाद सकलानी?

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कौन हैं प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी? (who is NCERT Director Dinesh Prasad Saklani)

  • प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी फरवरी 2022 से NCERT के निदेशक हैं। उन्होंने 14 फरवरी 2022 को पदभार संभाला था और उन्हें पांच साल के कार्यकाल के लिए चुना गया। इससे पहले वे उत्तराखंड के Hemvati Nandan Bahuguna Garhwal University में इतिहास के प्रोफेसर रहे। प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी उत्तराखंड के रहने वाले हैं मुख्य रूप से उत्तराखंड के ब्राह्मण समुदाय (सकलानी) से आते हैं।
  • शैक्षणिक नेतृत्व के तौर पर यह उनका पहला बड़ा प्रशासनिक दायित्व है, हालांकि वे पहले भी NCERT की परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं। उन्होंने CBSE के लिए ऐतिहासिक एटलस तैयार करने की परियोजना में काम किया था। गढ़वाल विश्वविद्यालय में उन्होंने टूरिज्म विभाग में करीब आठ साल पढ़ाया और वहां के IAS कोचिंग सेंटर से भी जुड़े रहे।
  • उनकी तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें मध्य हिमालय के प्राचीन समुदायों पर आधारित शोध शामिल है। रामायण से जुड़ी अकादमिक परियोजनाओं में भी उनकी भागीदारी रही है। वर्ष 2005 में उन्हें ऐतिहासिक लेखन के लिए पंजाब कला एवं साहित्य अकादमी, जालंधर से सम्मान मिला। वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस और उत्तराखंड हिस्ट्री एंड कल्चर एसोसिएशन के आजीवन सदस्य भी हैं।
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WHO IS Professor Dinesh Prasad Saklani

प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी का प्रशासनिक और शैक्षणिक प्रोफाइल

  • प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी वर्ष 2022 से नई दिल्ली स्थित National Council of Educational Research and Training के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।
  • इस भूमिका में वे देश की शिक्षा व्यवस्था को दिशा देने, पाठ्यक्रम विकास, अकादमिक रिसर्च और शिक्षण मानकों को बेहतर बनाने का काम देख रहे हैं।
  • उन्होंने 22 फरवरी 2022 से 24 जनवरी 2023 तक National Council for Teacher Education के चेयरपर्सन का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला।

प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी की विश्वविद्यालय में प्रमुख जिम्मेदारियां

  • 10 फरवरी 2022 तक इतिहास, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष रहे।
  • जुलाई 2017 से 10 फरवरी 2022 तक कैंपस डायरेक्टर के रूप में कार्य किया और प्रशासनिक व शैक्षणिक समन्वय की जिम्मेदारी निभाई।
  • 2009 से 2014 तक यूनिवर्सिटी एंटी रैगिंग स्क्वॉड के प्रमुख रहे।
  • मई 2009 से अगस्त 2014 तक चीफ प्रॉक्टर की जिम्मेदारी संभाली।
  • 2021 से 10 फरवरी 2022 तक सेंटर फॉर फोक एंड परफॉर्मिंग आर्ट के समन्वयक रहे।
  • 2020 से 10 फरवरी 2022 तक NIRF के नोडल अधिकारी रहे।
  • 2020 से 10 फरवरी 2022 तक लाइब्रेरी कमेटी के संयोजक रहे।
  • 2019-20 में सेंट्रल परचेज कमेटी के संयोजक की भूमिका निभाई।
  • तीन वर्षों तक डिप्टी कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन रहे।
  • 1999-2001 और 2003 के बाद असिस्टेंट प्रॉक्टर की जिम्मेदारी भी संभाली।

अन्य भूमिकाएं:

विश्वविद्यालय की विभिन्न समितियों में संयोजक और सदस्य रहे, जिनमें अकादमिक काउंसिल, प्लानिंग एंड डेवलपमेंट कमेटी, कैंपस डेवलपमेंट कमेटी, ऑर्डिनेंस कमेटी, एंटी रैगिंग कमेटी, MACP कमेटी और लाइब्रेरी कमेटी शामिल हैं।

WHO IS Professor Dinesh Prasad Saklani

क्या है 'करप्शन इन ज्यूडीशियरी' विवाद? (Judicial Corruption Chapter Controversy)

NCERT ने 23 फरवरी को कक्षा 8 के लिए 'एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट 2' नामक नई सोशल साइंस पुस्तक जारी की थी। इसी में 'द रोल ऑफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी' अध्याय के भीतर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, केस बैकलॉग और जजों की कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया गया।

किताब में बताया गया कि जज आचार संहिता से बंधे होते हैं और आंतरिक जवाबदेही तंत्र मौजूद है। CPGRAMS के जरिए शिकायतों की प्रक्रिया और 2017 से 2021 के बीच मिली शिकायतों का उल्लेख भी किया गया। साथ ही संविधान में जजों को हटाने की प्रक्रिया, यानी महाभियोग का जिक्र भी शामिल है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार का मुद्दा शामिल करना था तो शासन के तीनों अंगों को समान रूप से जोड़ा जाना चाहिए था। उनका यह भी दावा है कि संबंधित आंकड़ों के क्रॉस वेरिफिकेशन के लिए केंद्र से परामर्श नहीं लिया गया।

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सुप्रीम कोर्ट के 4 सख्त आदेश

1️⃣केंद्र और राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग यह सुनिश्चित करें कि संबंधित किताब स्कूलों, लाइब्रेरी, बुक स्टॉल या किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध न रहे। सभी कॉपियां तुरंत सार्वजनिक पहुंच से हटाई जाएं।

2️⃣किताब की छपी हुई या डिजिटल प्रति का वितरण करना अदालत के आदेश की जानबूझकर अवहेलना माना जाएगा और इस पर कड़ी कार्रवाई हो सकती है।

3️⃣सभी राज्यों के शिक्षा विभागों के मुख्य सचिव दो सप्ताह के भीतर उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करें।

4️⃣राज्यों से रिपोर्ट मिलने के बाद अदालत एक विशेष कमेटी गठित करेगी, जो पूरे प्रकरण की गहराई से जांच कर जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करेगी।

नई किताब में न्यायपालिका से जुड़े मुख्य बिंदु (NCERT Judiciary Chapter Highlights)

🔹अध्याय में अदालतों की संरचना और न्याय तक पहुंच की प्रक्रिया समझाने के साथ-साथ न्यायिक व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों, जैसे भ्रष्टाचार और लंबित मामलों के बोझ, पर ज्यादा फोकस किया गया है।

🔹भ्रष्टाचार वाले हिस्से में बताया गया है कि जज आचार संहिता के दायरे में काम करते हैं। यह संहिता उनके कोर्ट के भीतर ही नहीं, बल्कि बाहर के आचरण को भी नियंत्रित करती है।

🔹न्यायपालिका के अंदर मौजूद जवाबदेही तंत्र की जानकारी दी गई है, ताकि छात्र समझ सकें कि सिस्टम में निगरानी और नियंत्रण के क्या उपाय हैं।

🔹सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम यानी CPGRAMS के माध्यम से शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया समझाई गई है।

🔹 पुस्तक के मुताबिक 2017 से 2021 के बीच CPGRAMS के जरिए 1,600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं।

🔹गंभीर आरोपों की स्थिति में जजों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लेख है, जिसमें संसद द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पारित करने का प्रावधान बताया गया है।

🔹यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी जज के खिलाफ प्रस्ताव पर विचार से पहले उचित जांच होती है और संबंधित जज को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है।

🔹अध्याय में कहा गया है कि न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती हैं, जिससे खासकर गरीब और जरूरतमंद लोगों की न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।

🔹 साथ ही यह भी बताया गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें पारदर्शिता बढ़ाने और जनविश्वास मजबूत करने के लिए तकनीक का उपयोग तथा भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई जैसे कदम उठा रही हैं।

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