कौन हैं ये सांसद? केतन अग्रवाल मर्डर केस के बाद राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनाने की कर दी मांग
Who is MP Ashok Mittal: पुणे के बिजनेसमैन केतन अग्रवाल की रहस्यमयी मौत का यह मामला अब केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर न्याय की मांग के साथ शुरू हुई यह आवाज अब संसद की दहलीज तक पहुंच चुकी है। मंगेतर सिया गोयल द्वारा खौफनाक साजिश रचकर केतन अग्रवाल की हत्या के मामले के बाद पुरुष भयभीत हैं।
पुरुषों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर ये बेहद संवेदनशील मुद्दा संसद के उच्च सदन राज्यसभा में उठाया गया। राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल ने देश में 'राष्ट्रीय पुरुष आयोग' के गठन की जोरदार वकालत की। उन्होंने इस मांग के पीछे मानसिक प्रताड़ना का शिकार हुए केतन अग्रवाल की दुखद मौत का प्रमुख रूप से हवाला दिया।

संसद में गूंजी केतन अग्रवाल की व्यथा
सांसद अशोक मित्तल ने शून्यकाल में ये मुद्दा उठाया। इसके बाद इन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की जिसमें उन्होंने लिखा, पुणे का केतन अग्रवाल मामला बहुत परेशान करने वाला है। केतन और उनके परिवार को निष्पक्ष, पूरी और बिना किसी भेदभाव के जांच मिलनी चाहिए, और सबसे बढ़कर, उन्हें न्याय मिलना चाहिए।
मैंने संसद में 'नेशनल कमीशन फॉर मेन बिल' पेश किया था। हर पीड़ित को न्याय, मदद और कानून के तहत समान सुरक्षा मिलनी चाहिए। केतन का मामला यह याद दिलाता है कि पुरुष भी पीड़ित हो सकते हैं। उन्हें संस्थागत मदद, कानूनी सुरक्षा और एक ऐसा मंच मिलना चाहिए जहां उनकी बात सुनी जा सके। लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना, न्याय सभी के लिए समान होना चाहिए।
कौन हैं सांसद अशोक मित्तल?
अशोक मित्तल राज्यसभा सांसद हैं। अप्रैल 2022 से आम आदमी पार्टी से सांसद बने थे लेकिन 24 अप्रैल 2026 को डॉ. अशोक मित्तल ने राघव चड्ढ़ा और संदीप पाठक के साथ एक प्रेस कान्फ्रेंस कर आप से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद भाजपा में शामिल हो गए हैं। मशहूर बिजनेसमैन डॉ अशोक मित्तल पंजाब के जालंधर स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के फाउंडर और चांसलर भी हैं। राज्यसभा सांसद बनने के बाद वे विभिन्न संसदीय समितियों से जुड़े रहे हैं और नीति-निर्माण से संबंधित चर्चाओं में भाग लेते रहे हैं। मित्तल का नाम उन प्रमुख उद्योगपतियों में आता है जिन्होंने शिक्षा क्षेत्र में निजी निवेश और संस्थागत विकास को बढ़ावा दिया है।
क्यों आवश्यक है राष्ट्रीय पुरुष आयोग?
भारत में पुरुषों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का लंबे समय से आरोप रहा है कि दहेज विरोधी कानूनों का इस्तेमाल कई बार हथियार के रूप में किया जाता है। इन मामलों में बिना किसी प्राथमिक जांच के ही पुरुष के पूरे परिवार को आरोपी बना दिया जाता है। इस सामाजिक बदनामी और कानूनी प्रताड़ना के डर से पुरुष अक्सर गंभीर अवसाद में चले जाते हैं।
विवाहित पुरूष कर रहे आत्महत्या
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के सालाना आंकड़े भी इस भयावह सच्चाई की पुष्टि करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, देश में प्रतिवर्ष आत्महत्या करने वाले विवाहित पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में दोगुनी से भी अधिक है। इनमें से अधिकांश आत्महत्याओं के पीछे पारिवारिक कलह, वैवाहिक अनबन और बेवजह के मुकदमों में फंसाए जाने का डर एक मुख्य कारण बनकर उभरता है। यही वजह है कि अब देश के विभिन्न हिस्सों से 'राष्ट्रीय पुरुष आयोग' के गठन की मांग तेज होने लगी है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
इस पूरे मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू लिंग-तटस्थ कानूनों की आवश्यकता का भी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खण्डपीठ के एडवोकेट शांतनु शुक्ला का कहना है कि एक ऐसा निष्पक्ष आयोग होना चाहिए जहां पीड़ित पुरुष बेझिझक अपनी शिकायतों को दर्ज करा सकें। यह आयोग गंभीर आरोपों की प्रारंभिक जांच कर यह सुनिश्चित कर सकता है कि किसी भी निर्दोष पुरुष या उसके वृद्ध माता-पिता को झूठे मामलों में न घसीटा जाए।
इनके अनुसार न्याय की अवधारणा तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक कि वह सबके लिए समान न हो। यदि कोई महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती है, तो उसे त्वरित सहायता मिलती है, लेकिन जब वही स्थिति किसी पुरुष के साथ होती है, तो समाज और कानून दोनों ही उसकी पीड़ा के प्रति उदासीन नजर आते हैं।
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