डॉक्टर ने 13 टन चिप्स के पैकेट और शैम्पू की बोतलों से क्यों बनाया ये प्लास्टिक का घर? वजह हैरान करने वाली
Plastic home: प्लास्टिक पर्यावरण के लिए कितना खतरनाख ये तो हम सभी जानते हैं लेकिन कई लोग इस प्लास्टिक का उपयोग से अनोखा काम भी कर रहे हैं। ऐसे ही एक महाराष्ट्र के डॉक्टर हैं डॉ. डॉ. बालमुकुंद पालीवाल, जिन्होंने 13 टन चिप्स के पैकेट और शैम्पू की बोतलों और प्लास्टिक की अन्य चीजों का इस्तेमाल कर एक अनोखा प्लास्टिक का घर बनाया है।
डॉ. बालमुकुंद पालीवाल ने महाराष्ट्र के चंद्रपुर में रिसाइकिल प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल करके दो मंजिला घर बनाया और 13 टन प्लास्टिक को लैंडफिल में जाने से रोका है। आइये जानते हैं उन्होंने यह कैसे किया।

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जानें प्लास्टिक के दो मंजिले घर में क्या-क्या है खास?
डॉ. बालमुकुंद पालीवाल का यह अनोखा घर महाराष्ट्र के चंद्रपुर के वनस्पति उद्यान में स्थित है। इस दो मंजिले घर में एक बड़ा हॉल, एक बेडरूम और एक सीढ़ी ओर खुलता है जो पहली मंजिल तक जाती है, जहां बच्चों के खेलने के लिए एक छोटा कमरा है और एक बरामदा है, जहां से वनस्पति उद्यान का सुंदर नजारा दिखता है।
इस घर को पूरी तरह से प्लास्टिक का उपयोग करके बनाया गया है! फर्श की टाइलों, दरवाजों और दीवारों से लेकर सीढ़ियों और छत तक...सबकुछ प्लास्टिक का बना हुआ है।
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डॉ. बालमुकुंद पालीवाल ने 13 टन प्लास्टिक से बना है ये घर
डॉ. बालमुकुंद पालीवाल द्वारा निर्मित यह घर 625 वर्ग फीट में फैला हुआ है, जिसकी ऊंचाई 18 फीट और चौड़ाई 10 फीट है। डॉ. बालमुकुंद पालीवाल ने कहा, ''हमने घर का हर हिस्सा प्लास्टिक से बनाया है। इसके लिए हमने सभी तरह के प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल किया है, जिसमें आलू के चिप्स के पैकेट, पानी की बोतलें, दवाइयों के रैपर, कॉस्मेटिक्स की बोतलें और दूध के पाउच शामिल हैं।''
डॉ. बालमुकुंद पालीवाल ने कहा है कि जिला परिषद चंद्रपुर के मार्गदर्शन में निर्मित इस घर ने 13 टन प्लास्टिक को लैंडफिल में जाने से बचाया है।
डॉ. बालमुकुंद पालीवाल ने बताया कि यह प्लास्टिक का घर पोर्टेबल भी है। वे कहते हैं, "हम इसे सिर्फ स्क्रू चलाकर दो से पांच घंटे के भीतर खोल और जोड़ सकते हैं।" उन्होंने आगे बताया कि इस घर का इस्तेमाल वर्तमान में बगीचे में आने वाले पर्यटक और स्तनपान कराने वाली मां कर रही हैं।
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क्यों प्लास्टिक के कचरे से परेशान हैं डॉ. बालमुकुंद पालीवाल?
पेशे से एनेस्थिसियोलॉजिस्ट डॉ. बालमुकुंद हमेशा लैंडफिल में बढ़ते प्लास्टिक कचरे से परेशान रहते थे। वह पहले भी प्लास्टिक का इस्तेलाम कर कई चीजें बना चुके हैं। उनका कहना है कि उन्हें प्लास्टिक के इस्तेमाल की प्रेरणा अपनी मां से मिली है। डॉ. बालमुकुंद कहते हैं कि 2014 में जब स्वच्छता भारत अभियान शुरू किया गया था, तब उन्हें प्लास्टिक कचरे से निपटने की प्रेरणा मिली थी।
डॉ. बालमुकुंद पालीवाल कहते हैं, ''यह प्लास्टिक कचरा न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। दिल्ली जैसे शहरों में, आप कचरे के पहाड़ देख सकते हैं। जबकि सरकार कचरा प्रबंधन पर करोड़ों खर्च करती है, प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर लोगों में आक्रोश है। हमें इस कचरे को हटाने के लिए तत्काल समाधान की आवश्यकता है।''

डॉ. बालमुकुंद कहते हैं, "मुझे अपनी मां से भी प्रेरणा मिली। 60 के दशक में वे पॉलिएस्टर की साड़ियां पहनती थीं। वे पुरानी साड़ियों को जला देती थीं। जब पॉलिएस्टर जलता है, तो उसमें से प्लास्टिक जैसी गंध आती है और कपड़ा पिघल जाता है। वह चूल्हे की राख के साथ पिघले हुए कपड़े को मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनाती थी। वह अर्ध-ठोस पदार्थ को बांस के सूप (पारंपरिक ट्रे) पर लगाकर उसे सख्त बनाती थी। इससे इसकी टिकाऊपन एक साल से बढ़कर चार साल हो जाती थी। बाद में, उसने इसका इस्तेमाल टूटे हुए पैन और ड्रम को ठीक करने के लिए करना शुरू कर दिया। वह कभी स्कूल नहीं गई, लेकिन मैंने उससे बहुत कुछ सीखा है।''












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