1971 की लड़ाई में जब तालाब के नीचे पाइप से साँस लेकर बचे भारतीय पायलट
चार दिसंबर, 1971 की सुबह दमदम हवाई ठिकाने से उड़े 14 स्क्वॉर्डन के दो हंटर विमानों ने ढाका के तेज़गाँव एयरपोर्ट पर हमला किया.
एक हंटर विमान पर सवार थे- स्क्वॉर्डन लीडर कंवलदीप मेहरा और दूसरे हंटर को उड़ा रहे थे- उनके नंबर दो फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट संतोष मोने.
जब वो तेज़गाँव एयरपोर्ट के ऊपर से उड़े तो उन्हें पाकिस्तानी लड़ाकू विमान दिखाई नहीं दिए, क्योंकि पाकिस्तानियों ने उन्हें चारों तरफ़ छितरा रखा था. कुछ दूसरे ठिकानों पर बम गिराने के बाद जब मेहरा और मोने लौटने लगे तो एक दूसरे से अलग हो गए.
सबसे पहले मोने की नज़र कुछ दूरी पर पाकिस्तान के दो सेबर जेट विमानों पर पड़ी. कुछ ही सेकेंड के अंदर दो सेबर जेट विमान दोनों भारतीय हंटर विमानों के पीछे पड़ गए. अचानक मेहरा ने महसूस किया कि एक सेबर जेट विमान उनके पीछे आ रहा है.
मेहरा ने बाईं ओर मुड़कर मोने से उनकी पोज़ीशन के बारे में पूछा. मोने से उनको कोई जवाब नहीं मिला. सेबर ने मेहरा के हंटर पर लगातार कई फ़ायर किए. मेहरा ने मोने से कहा कि वो सेबर पर पीछे से फ़ायर करें ताकि उससे उनका पीछा छूटे. लेकिन मेहरा को इसका अंदाज़ा नहीं था कि मोने के हंटर के पीछे भी एक और सेबर लगा हुआ था.
कॉकपिट में धुआँ भरा
उस समय मोने के हंटर की गति थी 360 नॉट्स यानी 414 किलोमीटर प्रतिघंटा. मोने अपने विमान को बहुत नीचे ले आए और दमदम की ओर पूरी ताक़त से उड़ने लगे. पाकिस्तानी पायलट उन पर लगातार फ़ायर करता रहा, लेकिन उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाया.
हालांकि कंवलदीप मेहरा उतने भाग्यशाली नहीं थे. उनके हंटर पर फ़्लाइंग ऑफिसर शम्सुल हक़ की गोलियाँ लगातार लग रही थीं. वो 100 फ़ीट की ऊँचाई पर उड़ रहे थे और उनके जहाज़ में आग लग चुकी थी.
तभी पीछे आ रहा सेबर मेहरा के हंटर को ओवरशॉट करता हुआ आगे निकल गया. मेहरा उस पर निशाना चाहते थे, लेकिन लगा नहीं पाए, क्योंकि उनके कॉकपिट में धुआं भर चुका था और उन्हें साँस लेने में दिक्क़त हो रही थी. धीरे-धीरे आग उनके कॉकपिट तक पहुँचने लगी.
पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा अपनी किताब 'ईगल्स ओवर बांग्लादेश' में लिखते हैं, ''मेहरा ने बिना कोई देर किए अपने पैरों के बीच के इजेक्शन बटन को दबाया. लेकिन एक माइक्रोसेकेंड में खुलने वाला पैराशूट खुला ही नहीं. विमान के ऊपर लगने वाली केनॉपी ज़रूर अलग हो गई. नतीजा ये हुआ कि इतने वेग से हवा का तेज़ झोंका आया कि मेहरा के ग्लव्स और घड़ी टूटकर हवा में उड़ गए. यहीं नहीं, उनका दाहिना इतनी तेज़ी से पीछे मुड़ा कि उनका कंधा उखड़ गया.''
जगनमोहन और चोपड़ा अपनी किताब में आगे लिखते हैं, ''किसी तरह मेहरा ने अपने बाएं हाथ से पैराशूट का लीवर फिर दबाया. इस बार पैराशूट खुल गया और मेहरा हवा में उड़ते चले गए. मेहरा के नीचे गिरते ही बंगाली ग्रामीणों ने उन्हें लाठी और डंडों से पीटना शुरू कर दिया. शुक्र ये रहा कि दो लोगों ने भीड़ को रोककर मेहरा से उनकी पहचान पूछी. मेहरा की सिगरेट और पहचान पत्र से पता चला कि वो भारतीय हैं. मेहरा भाग्यशाली थे कि वो मुक्ति बाहिनी के लड़ाकों के बीच गिरे थे.''
मेहरा 'मिसिंग इन एक्शन' घोषित
गाँव वालों ने मेहरा को उठाया. उनके कपड़े बदलकर उन्हें लुंगी पहनने को दी. एक मुक्ति वाहिनी योद्धा ने उनकी पिस्टल उनसे ले ली. उसका संभवत: कहीं बाद में इस्तेमाल किया गया. मेहरा इतना घायल हो चुके थे कि वो अपने पैरों पर चल नहीं सकते थे. उनको स्ट्रेचर पर लिटाकर पास के एक गाँव ले जाया गया. लेकिन रास्ते में ही मेहरा फिर बेहोश हो गए.
गाँव पहुंचकर गाँव वालों ने मेहरा को नाश्ता दिया. ये उनका दिन का पहला खाना था, क्योंकि मेहरा सुबह-सुबह ही अपने विमान से हमला करने के लिए निकल चुके थे. जब कुछ दिनों तक भारतीय वायुसेना को मेहरा की ख़बर नहीं मिली, तो उन्हें 'मिसिंग इन एक्शन' घोषित कर दिया गया.
बाद में पाकिस्तानी फ़्लाइंग ऑफ़िसर शम्सुल हक़ ने इस लड़ाई का विवरण देते हुए पाकिस्तानी वायुसेना की पत्रिका शाहीन में 'एन अनमैच्ड फ़ीट इन द एयर' शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने ही स्क्वार्डन लीडर केडी मेहरा का हंटर गिराया था. ढाका के पास ही वो अपने विमान से इजेक्ट हुए थे. उन्हें मुक्ति वाहिनी की मदद मिलने के चलते पाकिस्तानी सैनिक उन्हें पकड़ नहीं पाए और वो बाद में सुरक्षित भारत लौट आए.
घायल मेहरा अगरतला के पास भारतीय हैलिपैड तक पहुंचे
इस घटना के नौ दिन बाद अगरतला क्षेत्र के सीमांत इलाके के एक हैलिपैड पर एक भारतीय हैलिकॉप्टर ने लैंड किया. उस हैलिकॉप्टर में भारतीय सेना के एक जनरल बैठे हुए थे. जनरल के हैलिकॉप्टर से उतरने के बाद स्थानीय एयरमैन उस हैलिकॉप्टर की सर्विस कर रहे थे, जबकि उसके पायलट आपस में बात कर रहे थे.
वहां किसी का ध्यान उस ओर नहीं गया कि वहाँ एक कमीज़ और लुंगी पहने एक दुबला-पतला व्यक्ति प्रकट हुआ है. उनका दाहिना हाथ एक स्लिंग में बँधा हुआ था. उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और उनके पूरे चेहरे पर चोट के निशान थे. उनकी बाँह नीली पड़ चुकी थी और उसमें गैंगरीन की शुरुआत हो चुकी थी. एक नज़र में वो शख़्स उन शरणार्थियों जैसा दिखाई देता था, जो उन दिनों पूरे अगरतला में फैले हुए थे.
एयरफ़ोर्स के पायलटों को उस समय बहुत अचंभा हुआ, जब उस शख़्स ने ज़ोर से पुकारा 'मामा'. उनमें से एक का निकनेम वाकई 'मामा' था. लेकिन भारत के कई इलाकों में लोग इस शब्द का संबोधन के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने सोचा कि शायद कोई उसी अंदाज़ में उन्हें पुकार रहा है. वैसे भी वो नहीं चाहते थे कि युद्ध के दौरान कोई भिखारी उन्हें तंग करे. इसलिए उनसे पिंड छुड़ाने के लिए उसने बहुत रुखेपन से पूछा, 'क्या है?'
मेहरा ने 100 मील का रास्ता पार किया
पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा लिखते हैं, ''उस शख़्स ने पायलट का हाथ पकड़कर कहा, 'अरे कुछ तो पहचानो.' पायलट ने अशिष्टतापूर्वक अपना हाथ खींच कर कहा 'मुझे मत छुओ.' तब उस अजनबी ने पूछा 'क्या तुम्हारा केडी नाम का कोई दोस्त है?' पायलट ने जवाब दिया 'हाँ स्क्वार्डन लीडर केडी मेहरा. लेकिन वो तो मर गये.' उस शख़्स ने जवाब दिया, 'नहीं वो मैं हूँ.' तब जाकर पायलट को अहसास हुआ कि उनके सामने भिखारी जैसा दीखने वाला शख़्स और कोई नहीं स्क्वार्डन लीडर केडी मेहरा ही हैं, जिनके विमान को आठ दिन पहले ढाका के पास मार गिराया गया था. केडी मेहरा 'मिसिंग इन एक्शन' थे और उन्हें मरा हुआ मान लिया गया था. मुक्ति वाहिनी की मदद से मेहरा करीब 100 मील का रास्ता चलते हुए उस जगह पहुंचे थे.''
4 दिसंबर को मेहरा का विमान गिरने के बाद मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों ने उनकी देखभाल की थी. उन्होंने उन्हें खाना दिया था. उनकी चोट पर पट्टी बाँधी और उनकी पूरी तीमारदारी की थी. मुक्ति बाहिनी के एक युवा सैनिक शुएब ने मेहरा को लुंगी और कमीज़ पहनाकर भारतीय ठिकाने तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया था. इससे पहले उन्होंने उनके फ़्लाइंग सूट और भारतीय वायुसेना के पहचानपत्र को जलाकर नष्ट कर दिया था.
मेहरा को तालाब के पानी के नीचे रखा गया
विंग कमांडर एमएल बाला अपनी किताब 'इलेक्ट्रोनिक वारफ़ेयर ऑफ़ द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ 1971' में लिखते हैं, ''मुक्ति वाहिनी के साथ मेहरा के रहने की ख़बर भारतीय सेना तक पहुंचा दी गई थी, लेकिन इस डर से इसका बहुत प्रचार नहीं किया गया कि कहीं पाकिस्तानी उनकी खोज न शुरू कर दें. मेहरा की 14 स्क्वार्डन को दो दिन बाद पता चला कि बचाए गए पायलट संभवत: केडी मेहरा हैं.''
एमएल बाला लिखते हैं, ''मेहरा को उस गाँव में थोड़ी ही देर रखा गया, जहाँ उनका विमान गिरा था. फिर उन्हें झोपड़ी से निकाल कर एक तालाब में पानी के नीचे छिपा दिया गया. उन्हें एक पाइप दिया गया, जिससे कि वो साँस ले सकें. मेहरा ने पूरी दोपहर तालाब के नीचे पानी में बिताई. शाम को जब अँधेरा हो गया तो गाँव वालों ने आकर उन्हें पानी से बाहर निकाला. मेहरा को ढ़ूंढ़ने निकले पाकिस्तानी सैनिकों ने उस पूरे गाँव को जला दिया, लेकिन किसी भी व्यक्ति ने मेहरा की मुखबिरी नहीं की. पाकिस्तानी सैनिकों के अत्याचार को सहते हुए गाँव वालों ने मेहरा को अपने पास पाँच दिनों तक सुरक्षित रखा.''
भारतीय विमानों ने पाकिस्तानी गनबोट से बचाया
केडी मेहरा ने ढाका के पश्चिम में पैराशूट से छलाँग लगाई थी. मुक्ति बाहिनी ने उन्हें सलाह दी कि उनके लिए सबसे अच्छा यही होगा कि वो पूर्व में अगरतला की तरफ़ चले जाएं.
पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा लिखते हैं, ''शुएब को साथ लिए मेहरा ने एक मछुआरे की नौका से मेघना नदी पार की. तभी उनके साथ मुक्ति वाहिनी का एक और योद्धा सरवर भी आ गया. नदी पार करने के दौरान एक समय बड़ा ख़तरा तब आया, जब पाकिस्तान का एक गनबोट काफ़िला उन्हें आता दिखाई दिया. मेहरा और उनके रक्षकों की पूरी कोशिश थी कि वो पाकिस्तानी गन बोट्स से दूर रहें. यदि पाकिस्तानी बोट उन्हें पकड़ लेती तो उनकी मौत निश्चित थी.''
वो आगे लिखते हैं, ''पाकिस्तानी बोट पास आती ही चली जा रही थी और मेहरा और उनके साथियों ने बुरी से बुरी परिस्थितियों को लिए अपने आप को तैयार कर लिया था. तभी अचानक भारतीय वायुसेना के चार विमानों ने नीचे आकर पाकिस्तानी गनबोट पर हमला कर दिया और उनके द्वारा गिराए बमों से बोट में आग लग गई. मेहरा और उनके साथियों की जान में जान आई और उन्होंने पूर्व की ओर बढ़ना जारी रखा. थोड़ी देर बाद उन्हें एक और पाकिस्तानी बोट दिखाई दी. लेकिन इन लोगों ने तुरंत किनारे पहुंच कर लंबी घास की आड़ ले ली, जिससे पाकिस्तानियों को उनका पता नहीं चल पाया.''
वायुसेना मुख्यालय को संदेश
मेघना के पूर्वी किनारे पर उतरने के बाद उन्होंने अगरतला तक तीस मील का रास्ता पैदल ही तय किया. चोट और दर्द के बावजूद मेहरा घंटों लगातार चलते रहे.
आख़िर में वो उस सड़क तक पहुंच गए, जिस पर भारतीय सेना के वाहन चल रहे थे. उन्होंने हाथ देकर एक जीप को रोका. मेहरा भारतीय सैनिकों को अपनी आपबीती बताने में सफल हो गए.
उन तीनों को एक सैनिक जीप में लाद कर सैनिक कैंप में ले जाया गया, जहाँ उनसे गहन पूछताछ हुई. मेहरा के ज़ोर देने पर वायुसेना मुख्यालय को एक संदेश भेजा गया और तब वहाँ से सूचना आई कि मेहरा को लेने के लिए एक हैलिकॉप्टर भेजा जा रहा है. इस बीच भारतीय सेना के एक डॉक्टर ने मेहरा को कुछ पेनकिलर दवा खाने को दी.
बाद में मेहरा ने एक इंटरव्यू में कहा, ''उस रात मैं पहली बार शांति से सो पाया, क्योंकि बीते आठ दिनों में मैंने पहली बार अपने आप को सुरक्षित महसूस किया. इतने दिनों तक मैं कभी भी सहज नहीं रह सका, क्योंकि मैं उस क्षेत्र में रह रहा था, जहां अभी भी पाकिस्तान का नियंत्रण था.''
12 दिसंबर को सेना के कमांडिंग अफ़सर ने मेहरा को बताया कि एक जनरल को लेकर एक हैलिकॉप्टर वहाँ पहुंचने वाला है. मेहरा मुक्ति वाहिनी के सैनिक शुएब के साथ एक स्कूटर पर सवार होकर उस हैलिपैड तक पहुंचे. जब मेहरा ने हैलिकॉप्टर और पायलटों को देखा तो उन्होंने अपने जूनियर 'मामा' निकनेम वाले पायलट को तुरंत पहचान लिया.
मेहरा ने समय से पहले लिया वायुसेना से अवकाश
केडी मेहरा को उस हैलिपैड से पहले अगरतला ले जाया गया और फिर वहाँ से शिलॉन्ग पहुंचाया गया, जहाँ उन्हें सैनिक अस्पताल में भर्ती कर उनका इलाज किया गया. शुरुआती इलाज के बाद उन्हें एक डकोटा विमान में बैठा कर दिल्ली लाया गया. कई महीनों तक मेहरा का इलाज चलता रहा. एक समय तो उनका हाथ काटने तक की नौबत आ गई. बाद में उनका हाथ तो बच गया लेकिन दूसरी स्वास्थ्य दिक्कतों के चलते उनके उड़ान भरने पर रोक लगा दी गई.
युद्ध समाप्त होने के पाँच साल बाद उन्होंने वायुसेना से समय से पहले ही अवकाश ग्रहण कर लिया. 4 सिंतबर, 2012 को स्क्वार्डन लीडर कंवलदीप मेहरा ने 73 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
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