Socialist- Secular: क्या है 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष का सही अर्थ? कांग्रेस और बीजेपी में कौन बोल रहा है सच?
Socialist and secular: आज सुबह लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने ये कहकर सबको चौंका दिया कि भारत के संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द हटा दिए गए हैं। जिसको लेकर राजनेताओं में बहस छिड़ गई और भाजपा को इस मामले में सफाई भी देने पड़ी।

दरअसल अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि 'संविधान की जो नई प्रतियां आज हमें दी गई हैं, उनमें 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द ही नहीं है, जो कि एक चिंताजनक विषय है, सरकार की मंशा संदिग्ध है।'
'जब संविधान बना था तो ऐसा ही था...'
इस मामले ने जब तूल पकड़ा तो सरकार ने इस पर जवाब दिया। बीजेपी नेता और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा है कि 'जब संविधान बना था तो ऐसा ही था, उसके बाद उसमें 42वां संशोधन हुआ, जो कॉपी दी गई है, वो मूल रूप से संविधान की प्रतियां हैं, जिसमें कोई हेर-फेर नहीं हुआ है। '
कांग्रेस पार्टी इतनी परेशान क्यों हो गई?
अब सवाल ये उठता है कि आखिर 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष' के संविधान के प्रस्तावना में होने के क्या मायने हैं और क्यों इसके ना होने से कांग्रेस पार्टी इतनी परेशान हो गई। चलिए इस बारे में जानते हैं विस्तार से।
क्या है संविधान की प्रस्तावना?
भारत के संविधान की प्रस्तावना संविधान के सिद्धांतों को और इसके अधिकारों के बारे में बताती है। स्वतन्त्र गणराज्य बनने के लिए 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा इसे अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था इसलिए हमारा गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाया जाता है।
42वें संशोधन में शामिल हुए नए तीन शब्द
संविधान की मूल प्रस्तावना ( 1949) में "समाजवाद" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द वाकई में नहीं थे, प्रस्तावना में ये दोनों शब्द 1976 में 42वें संशोधन के जरिए शामिल किए गए थे। आपातकाल के दौरान संविधान में संशोधन किया गया था, जिसके तहत तीन शब्द शामिल किए गए थे। 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष' के अलावा तीसरा शब्द था 'अखंडता।'
संविधान के मुताबिक 'समाजवाद' क्या है?
संविधान के मुताबिक समाजवाद का मूल अर्थ यही है कि समाज में ऐसी व्यवस्था हो, जिसका फायदा सभी वर्गों को बराबर मिले। पिछड़े वर्ग के लोगों को भी आगे बढ़ने के पर्याप्त मौके मिले। लोगों के बीच आर्थिक अंतर कम हो और किसी व्यक्ति या जाति का ही विकास ना हो बल्कि चौतरफा और समान विकास हो और लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण का शिकार ना होना पड़े।
संविधान के मुताबिक 'धर्मनिरपेक्ष' क्या है?
भारतीय संविधान के प्रस्तावना के मुताबिक भारत एक 'धर्मनिरपेक्ष' राष्ट्र है, जहां सभी धर्मों का सम्मान होता है और हर किसी को धर्म की स्वतंत्रता है।












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