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UGC New Rules 2026 के सेक्शन 3 C में क्या है, जिस पर पहली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक?

Section 3C UGC Equity Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए इक्विटी रूल्स 2026 को लेकर पिछले कई दिनों से देशभर में घमासान मचा हुआ है। छात्रों, शिक्षकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है।

इसी विवाद के केंद्र में है नया नियम Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026, खासकर इसका सेक्शन 3(C)।

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इस नियम को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने पहली ही सुनवाई में UGC के 2026 के नए इक्विटी नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई तक 2012 के पुराने यूजीसी नियम ही लागू रहेंगे।

क्या है UGC Equity Rules 2026?

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को अधिसूचित किया था, जिसे 15 जनवरी से देशभर के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किया गया।

इन नियमों का उद्देश्य कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकना, पिछड़े वर्गों को संरक्षण देना और उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का माहौल बनाना बताया गया। याचिका कर्ताओं ने मुख्य रूप से नए नियम के सेक्शन 3 (C) को चुनौती दी है, जिसमें 'जाति-आधारित भेदभाव' की परिभाषा दी गई है।

What is Section 3C: क्या है सेक्शन 3 (C)?

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से नए नियम के सेक्शन 3 (C) को चुनौती दी है, जिसमें 'जाति-आधारित भेदभाव' की परिभाषा दी गई है।

सेक्शन 3 (C) की परिभाषा: इस प्रावधान के अनुसार, "जाति-आधारित भेदभाव का अर्थ केवल अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के सदस्यों के विरुद्ध उनकी जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव है।"

आपत्ति का कारण: याचिकाकर्ताओं की दलील है कि यह परिभाषा "गैर-समावेशी" है। इसका मतलब यह निकलता है कि यदि किसी सामान्य वर्ग (General Category) के छात्र के साथ उसकी जाति के कारण दुर्व्यवहार होता है, तो वह इस कानून के तहत सुरक्षा का हकदार नहीं होगा। UGC के नए नियमों का सेक्शन 3(C) जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा तय करता है। यही परिभाषा विवाद की जड़ बन गई।

याचिका में क्या कहा गया?

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि सेक्शन 3(C) मनमाना और भेदभावपूर्ण है। यह केवल SC/ST/OBC को ही संरक्षण देता है सामान्य वर्ग (सवर्ण) के छात्रों को शिकायत का अधिकार नहीं देता है।

यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह नियम UGC Act, 1956 के भी खिलाफ है और उच्च शिक्षा में समान अवसर के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है।

सुप्रीम कोर्ट की 3 बड़ी आपत्तियां

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कई गंभीर सवाल उठाए:

असमान सुरक्षा: कोर्ट ने कहा कि जब सेक्शन 3 (E) में भेदभाव की व्यापक परिभाषा (धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म-स्थान आदि के आधार पर) पहले से मौजूद है, तो 3 (C) को केवल विशिष्ट वर्गों तक सीमित रखने की क्या आवश्यकता थी?

दुरुपयोग का डर: पीठ ने मौखिक टिप्पणी की कि इस नियम की भाषा इतनी अस्पष्ट है कि इसका इस्तेमाल 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' (विपरीत भेदभाव) के लिए किया जा सकता है, जो समाज में विभाजन पैदा करेगा।

संवैधानिक उल्लंघन: कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के विरुद्ध हो सकता है क्योंकि यह बिना किसी तार्किक आधार के छात्रों के बीच एक 'पदानुक्रम' (Hierarchy) बनाता है।

सवर्ण संगठनों की आपत्तियां क्या हैं?

सामान्य वर्ग से जुड़े कई संगठनों ने इन नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि SC/ST/OBC को तो सुरक्षा दी गई, लेकिन सवर्ण छात्रों के लिए कोई व्यवस्था नहीं। यदि कोई झूठी शिकायत करता है तो उसके खिलाफ कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है। इससे कैंपस में फर्जी मामलों की बाढ़ आ सकती है। सामान्य वर्ग के छात्रों को मानसिक और शैक्षणिक रूप से परेशान किए जाने की आशंका इसके अलावा यह सवाल भी उठाया गया है कि विश्वविद्यालय परिसरों में पुलिस की एंट्री कैसे और किन परिस्थितियों में होगी।

क्या सवर्ण छात्रों को भी मिलेगा संरक्षण?

सवर्ण संगठनों की मांग है कि भेदभाव की परिभाषा को जाति-तटस्थ (caste-neutral) बनाया जाए। सामान्य वर्ग के छात्रों को भी शिकायत का समान अधिकार मिले। झूठी शिकायत करने वालों पर जुर्माना या सख्त कार्रवाई का प्रावधान जोड़ा जाए। अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में विस्तृत सुनवाई करेगा और यह तय करेगा कि क्या सेक्शन 3(C) संविधान सम्मत है।

क्या भेदभाव विरोधी कानून सभी वर्गों के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए या फिर UGC को नियमों में संशोधन करना होगा। फिलहाल, अदालत के आदेश के बाद UGC के 2026 के नए इक्विटी नियमों पर रोक लगी हुई है, और देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे।

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