PFI क्या है ? इस 'विवादित' संगठन के बारे में सबकुछ जानिए
नई दिल्ली, 22 सितंबर: भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हमेशा से पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की गतिविधियों पर संदेह जताते रहे हैं। सिर्फ बीजेपी ही नहीं, केरल में कई बार कांग्रेस और लेफ्ट की सरकारों ने भी पीएफआई के खिलाफ कानूनी मोर्चा खोला है। करीब डेढ़ दशक पुराना यह संगठन अपनी पैदाइश के बाद से ही गलत वजहों से चर्चा में आता रहा है। आज जब इस संगठन के खिलाफ देशभर में एक साथ व्यापक कार्रवाई की गई है और सौ से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं हैं, तो इसके बारे जानना और आवश्यक हो जाता है।

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के खिलाफ सबसे बड़ा ऐक्शन
एनआईए और ईडी ने गुरुवार को आतंकवाद-विरोधी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए देशभर के करीब 10 राज्यों में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के ठिकानों पर छापेमारी की है। इस कार्रवाई में सेंट्रल एजेंसियों ने पीएफआई से जुड़े 100 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी की हैं। इस ऑपरेशन को इन एजेंसियों की ओर से किया गया अब तक का 'सबसे बड़ा' ऑपरेशन बताया जा रहा है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक यह व्यापक कार्रवाई आतंकी फंडिंग, आतंकी ट्रेनिंग कैंप आयोजित करने और गैर-कानूनी संगठनों में शामिल कराने के इरादे से लोगों को कट्टरपंथी बनाने के इनके कथित कारनामों के खिलाफ हो रही है।

पीएफआई ने किया कार्रवाई का विरोध
केंद्रीय एजेंसियों ने जिन राज्यों में पीएफआई के खिलाफ यह बड़ी कार्रवाई की है, उनमें केरल, कर्नाटक,तमिलाडु, तेलंगाना, महाराष्ट्र और असम जैसे राज्य भी शामिल हैं। इस कार्रवाई के खिलाफ जारी एक बयान में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया की ओर से एक बयान में कहा गया है, 'हम फासीवादी सत्ता की ओर से विरोध की आवाज को दबाने के लिए एजेंसियों के इस्तेमाल का सख्त विरोध करते हैं।' पीएफआई ने अपने बयान में इस बात की भी पुष्टि की है कि 'छापेमारी इसके राष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय नेताओं के घरों पर भी चल रही है। प्रदेश कमिटी के दफ्तर पर भी छापे पड़े हैं।'

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) क्या है ?
पीएफआई का गठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) के आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाए जाने के बाद उसपर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद के दिनों में हुआ था। औपचारिक रूप से पीएफआई 2007 में दक्षिण भारत के तीन मुस्लिम संगठनों नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ केरल, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और मनिथा नीथि पासराई इन तमिलनाडु के विलय से बना था। पीएफआई वैसे खुद को अल्पसंख्यकों, दलितों और समाज के वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला संगठन बताता है। पीएफआई खुद से चुनावों में भाग नहीं लेता, लेकिन यह बैकडोर से इसमें सक्रिय रहता है।

पीएफआई का एसडीपीआई से क्या नाता है ?
पीएफआई वैसे तो खुद को सामाजिक संगठन के तौर पर पेश करता है, लेकिन मुसलमानों के बीच मुस्लिम धार्मिक एजेंडे के तौर पर उसके कार्य कभी किसी से छिपे नहीं रहे हैं। पीएफआई के गठन के ठीक दो साल बाद उसी से एक सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI)निकला जो कि एक राजनीतिक संगठन है। इसका काम कथित तौर पर मुसलमानों, दलितों और समाज के वंचित समुदायों से जुड़े राजनीतिक मुद्दों को उठाना है। औपचारिक तौर पर एसडीपीआई का लक्ष्य, 'मुस्लिमों, दलितों, पिछड़े वर्गों और आदिवासियों समेत सभी नागरिकों की उन्नति और समान विकास' पर ध्यान देना है और 'सभी नागरिकों के बीच में सत्ता को उचित तरीके से साझा करना है।' स्पष्ट रूप से कहें तो एसडीपीआई के राजनीतिक मंसूबों के लिए जमीनी कार्यकर्ता उपलब्ध करवाने का काम पीएफआई ही करती है। इस तरह से पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को एसडीपीआई का वैचारिक संगठन कह सकते हैं।

पीएफआई पर क्या आरोप लगते रहे हैं ?
केरल में पीएफआई की सबसे ज्यादा जमीन पर मौजूदगी देखी जा सकती है, जिसपर हत्या,सांप्रदायिक दंगे भड़काने, धमकाने से लेकर आतंकी संगठनों से संबंध रखने तक के आरोप लगते रहे हैं। 2012 में केरल हाई कोर्ट में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने आधिकारिक तौर पर कबूल किया था कि 'पीएफआई प्रतिबंधित स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया का ही अलग रूप में निकला हुआ संगठन है।' सरकार ने हलफनामे में कहा था कि पीएफआई के लोग कम से कम 27 लोगों की सांप्रादायिक इरादों से हत्याओं में शामिल हैं, जिनमें से ज्यादातर सीपीएम और आरएसएस के कैडर हैं। दो साल बाद केरल सरकार ने हाई कोर्ट से एक और हलफनामे में माना कि पीएफआई का एजेंडा, 'धर्म परिवर्तन के जरिए समाज का इस्लामीकरण करना है और मुस्लिम युवकों को इस्लाम के नाम पर कट्टर बनाना है और गैर-मुस्लिमों को उनकी नजर में इस्लाम का दुश्मन दिखाना है।' आगे के वर्षों में पीएफआई पर इसी तरह के और भी गंभीर आरोप लगते चले गए हैं।

पीएफआई पर भाजपा के आरोप
इसी साल अप्रैल में केरल बीजेपी ने प्रदेश में बढ़ते 'धार्मिक आतंकवाद' के खिलाफ अभियान शुरू करने का ऐलान किया था, जिसमें कथित तौर पर पीएफआई का हाथ बताया गया। 18 अप्रैल को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने कहा, 'पिछले 6 साल में केरल में 24 बीजेपी-आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं, जिनमें से सात पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के द्वारा हुए हैं।' हालांकि, पीएफआई की ओर से भी केरल में भाजपा-आरएसएस पर अपने कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने के भी आरोप लगाए जा चुके हैं। लेकिन, पीएफआई की सक्रियता सिर्फ केरल में ही सीमित नहीं है। पड़ोसी राज्य कर्नाटक में भी यह बहुत ज्यादा सक्रिय है और असम से लेकर महाराष्ट्र तक और उत्तर प्रदेश-बिहार से लेकर तमिलनाडु तक इसके कैडरों की सक्रिय उपस्थिति दिखती रही है।












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