प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन दौरे से भारत को क्या हासिल हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दो दिवसीय चीन दौरा समाप्त हो गया है. इस बैठक में दोनों देशों के बीच पिछले साल सीमा पर हुई तनातनी की स्थिति से लेकर कई मुद्दों पर बातचीत हुई. मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन के वुहान शहर में मुलाकात की और इस दौरान नाव की सवारी भी की.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इस मुलाकात की तस्वीरें और बातचीत का ब्यौरा अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर भी किया. उन्होंने लिखा, "राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत का फोकस भारत-चीन सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों पर था. हमने अपने आर्थिक सहयोग को गति देने के तरीकों पर बात की साथ ही लोगों के बीच रिश्तों को लेकर चर्चा हुई. दूसरे क्षेत्र जिन पर हमने बात की उनमें कृषि, तकनीक, ऊर्जा और पर्यटन शामिल हैं."

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नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग
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अपनी सेनाओं को निर्देश देंगे दोनों देश

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद गंभीर मुद्दा रहा है. 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध भी हो चुका है. इन सब के बीच 'हिंदी चीनी भाई भाई' के 'जुमले' भी गढ़े गए, लेकिन साथ ही आपस में अविश्वास भी बरकरार रहा. अभी पिछले साल ही भारत-चीन सीमा पर भूटान के डोकलाम में दोनों देशों की सेनाओं के बीच 73 दिनों तक गतिरोध बना रहा.

मोदी और जिनपिंग के बीच बातचीत में भी लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद का मसला सामने आया और इस पर शीर्ष नेतृत्व ने अपनी-अपनी सेनाओं को रणनीतिक मागदर्शन देने का फ़ैसला किया ताकि 2017 में डोकलाम में उत्पन्न हुई सैन्य गतिरोध जैसी स्थिति को रोका जा सके.

नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग
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समाचार एजेंसी पीटीआई ने विदेश सचिव विजय गोखले के हवाले से बताया है कि दोनों नेताओं ने माना कि भारत-चीन सीमा पर अमन और शांति बनाए रखना महत्वपूर्ण है. दोनों ने यह फ़ैसला लिया कि वो अपनी अपनी सेनाओं को सामरिक महत्व के लिहाज से निर्देश देंगे जिससे विश्वास बहाली की दिशा में उनके बीच भरोसा और तालमेल बनाने के लिए संवाद बढ़ाया जाए.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत कहते हैं, "भारत और चीन के बीच बातचीत होना ज़रूरी था. विदेश नीति में रणनीतिक समीक्षा के लिहाज से और दोनों देशों के बीच पिछले एक साल से जो संबंध चल रहा था उसमें ये ज़रूरी था कि दोनों देश एक ऐसे माहौल में अपनी बात रख सकें जहां नतीजे का कोई दबाव न हो. इस अनौपचारिक बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग यह संकेत देना चाह रहे थे कि दोनों देशों का शीर्ष नेतृत्व इस संबंध को आगे ले जाना चाहता है और डोकलाम विवाद के बाद भी इसे आगे ले जाने में सक्षम है. यह संकेत बहुत महत्वपूर्ण है."

वरिष्ठ पत्रकार अतुल अनेजा कहते हैं, "दोनों नेताओं ने यह तय किया है कि सीमा विवाद को सुलझाने के लिए तेज़ी लाई जाएगी. एक तरह से मैनेजमेंट ऑफ़ द बॉर्डर यानी जो युद्ध की स्थिति पैदा हुई थी उस ओर नहीं जा कर सीमा विवाद को कैसे सुलझाया जाए, बातचीत इस ओर जा रही है."

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नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग
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भारत-चीन संयुक्त आर्थिक परियोजना पर सहमति

रणनीति के लिहाज से दोनों देशों के बीच एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने के संकेत मिले हैं. दोनों देशों के बीच एक तीसरे देश अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त परियोजना पर सहमति जताई गई है. रणनीति के लिहाज से यह संयुक्त आर्थिक परियोजना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस कदम से बीजिंग का हमेशा के सहयोगी और भारत का धुर विरोधी पाकिस्तान परेशान हो सकता है.

लेकिन हर्ष पंत कहते हैं, "अगर चीन किसी प्रोजेक्ट को आगे ले जाना चाह रहा हो तो पाकिस्तान उसमें बाधा बने, ऐसी उसकी स्थिति नहीं है. लेकिन चीन और पाकिस्तान के बीच जो ऐतिहासिक संबंध रहे हैं उसको देखते हुए जल्दबाज़ी में किसी तरह का परिणाम देख पाना भी अनिश्चित है."

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नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग
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चीन ने बनाया पाकिस्तान पर दबाव

हालांकि वो कहते हैं कि यह संकेत देना भी चीन के लिए ज़रूरी था.

वो कहते हैं, "अफगानिस्तान में संयुक्त आर्थिक परियोजना पर सहमति जता कर चीन ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने का काम किया है और उसे यह संकेत दिया है कि अगर पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता है तो चीन के पास और भी विकल्प हैं. अब चीन इसे लेकर आगे बढ़ता है तो भारत के लिए अच्छा होगा."

अतुल अनेजा कहते हैं, "यह माना जा रहा था कि चीन और पाकिस्तान के संबंध घनिष्ठ हैं और भारत का झुकाव अमरीका की तरफ़ है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त आर्थिक परियोजना पर सहमति जताने से राजनीतिक भौगोलिक स्थिति और अमरीका के रवैये में फ़र्क़ पड़ेगा."

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क्या होगा बेल् ऐंड रोड परियोजना पर असर?

अब जबकि भारत और चीन अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त आर्थिक परियोजना पर काम करने की बात कर रहे हैं तो इससे चीन और पाकिस्तान के बीच रिश्ते पर क्या असर पड़ेगा? क्या चीन-पाकिस्तान आर्थिक परियोजना और बेल्ड ऐंड रोड परियोजना पर भी इसका कोई असर पड़ेगा?

हर्ष पंत कहते हैं, "चीन ने पाकिस्तान के साथ अपनी आर्थिक परियोजना और बेल्ड ऐंड रोड परियोजना पर कुछ नहीं कहा है. लेकिन अगर पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते को लेकर संतुलन के लिहाज से चीन अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त परियोजना की बात कह रहा है तो भारत को इसका स्वागत करना चाहिए."

अतुल अनेजा कहते हैं, "भारत और पाकिस्तान के बीच अगर रिश्ते में सुधार नहीं हुआ तो चीन की बेल्ट ऐंड रोड परियोजना, जिसमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा एक हिस्सा है, उसमें रुकावट आएगी. हम एक नई दिशा में जा रहे हैं क्योंकि शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन की बैठक में भारत, चीन और पाकिस्तान रहेगा और रूस भी इसका हिस्सा होगा. यह चीन के हित में है कि भारत-पाकिस्तान आर्थिक मामले में सहयोग करें. तो संभव है चीन की तरफ़ से यह कोशिश हो कि भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू हो."

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भारत-चीन की नज़दीकी और अमरीका

चीन और भारत के बीच कुछ समय पहले टकराव की स्थिति दिख रही थी, लेकिन अब एकाएक इसमें गर्माहट दिख रही है. आखिर अचानक से ऐसा क्या हुआ कि चीन ने भारत के साथ संबंध में सुधार की कोशिश की है.

हर्ष पंत कहते हैं, "ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह से आर्थिक मामलों में दरें बढ़ा कर चीन पर दबाव बनाया है उसके बाद चीन के पास यही विकल्प है कि वो भारत से अपने संबंधों को सुधारे."

वो कहते हैं, "भारत की नीति बेल्ड ऐंड रोड, व्यापार असमानता और सीमा पर एकदम स्पष्ट है. भारत के साथ संबंध सुधारना चीन के हित में है. जिस तरह से अमरीका के साथ उसके संबंध आर्थिक युद्ध की स्थिति में उतर आए हैं. वहां पर चीन अगर भारत जैसे देशों को अपने साथ नहीं लाता है तो अमरीका के साथ परेशानी में पड़ेगा. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो एक ग्लोबल गवर्नेंस का ढांचा खड़ा किया गया है वो भी ख़तरे में आएगा. यह तय है कि चीन के पास विकल्पों की कमी है. चीन के साथ संबंध में भारत कहीं से कमज़ोर नहीं हैं. भारत के संबंध अमरीका के साथ अच्छे हैं और अगर चीन चाहता है कि उसे भारत से अपने संबंध सुधारने हैं, तो चीन को समझौता करना ही होगा."

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क्यों हुई अनौपचारिक बातचीत?

दोनों देशों के बीच हुई इस अनौपचारिक बातचीत पर पहली बार देश के राजनीतिक हलकों में सहमति नहीं बनी थी और विपक्ष प्रधानमंत्री को विश्वास में नहीं लिए जाने पर सवाल उठा रहा था. बातचीत अनौपचारिक हो रही है, इसे लेकर कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ट्वीट कर प्रधानमंत्री से सवाल भी पूछा था.

हर्ष पंत कहते हैं, "इस तरह की अनौपचारिक बैठक चीन सभी देशों के साथ नहीं करता है. इससे पहले उसने ओबामा और ट्रंप के साथ ही ऐसी बातचीत की है और अब मोदी के साथ. तो कहीं न कहीं वो यह संकेत दे रहा है कि वो भारत के नेतृत्व को गंभीरता से लेता है और भारत की बढ़ती छवि को स्वीकार करता है."

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