बीजेपी बेबी रानी मौर्य की जातीय पहचान उभार कर क्या हासिल करेगी?
उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिशों को तेज़ कर दिया है.
इससे पहले भी केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार के ज़रिए बीजेपी दलित नेताओं को साधने की कोशिश कर चुकी है. लेकिन अब बीजेपी ने मायावती के कोर वोट बैंक माने जाने वाले जाटव समुदाय की ओर हाथ बढ़ाने शुरू कर दिए हैं.
उत्तर प्रदेश की आबादी में दलित मतदाताओं की संख्या लगभग 19 फ़ीसदी है, जिसमें से जाटव समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 50 फ़ीसदी है. और ये एकमात्र ऐसा दलित समुदाय है, जिसे बीजेपी अब तक अपने साथ लाने में कामयाब नहीं हुई है.
लेकिन इस चुनाव में बीजेपी जाटव समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. बीजेपी ने इस समुदाय को ध्यान में रखते हुए ही उत्तराखंड की पूर्व गवर्नर बेबी रानी मौर्य को मैदान में उतार दिया है.
लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या बेबी रानी मौर्य मायावती के किले में सेंध लगा पाएंगी?
कौन हैं बेबीरानी मौर्य?
नब्बे के दशक में आगरा की पहली महिला मेयर बनने वालीं बेबी रानी मौर्य ने बीजेपी के साथ लगभग तीन दशक लंबा राजनीतिक सफ़र तय किया है.
बेबी रानी मौर्य को एक ऐसी दलित नेता के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने एक कार्यकर्ता के रूप में अपना सफ़र शुरू किया था. और तमाम आयोगों और विभागों में काम करते हुए वह एक लंबे समय तक बीजेपी की दलित पॉलिटिक्स का हिस्सा रही.
इसके बाद बीजेपी ने साल 2018 में उन्हें उत्तराखंड का गवर्नर बनाया. लेकिन मात्र दो साल बाद बेबी रानी मौर्य को बीती सितंबर में इस्तीफ़ा देना पड़ा.
अब बीजेपी ने उन्हें अपना राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर एक नई ज़िम्मेदारी सौंपी है.
लेकिन सवाल ये है कि क्या बेबी रानी मौर्य इस चुनाव में मायावती को टक्कर देते हुए जाटव वोट बैंक में सेंध मार पाएंगी.
उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक लंबे समय से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान मानते हैं कि बेबी रानी मौर्य के लिए ये एक बड़ी ज़िम्मेदारी है.
वह कहते हैं, "बीजेपी चाहती है कि बेबी रानी मौर्य के रूप में मायावती के सामने एक चुनौती पेश की जा सके. लेकिन मुझे लगता है कि अब काफ़ी देर हो चुकी है. क्योंकि जाटव समुदाय से आने वाली इन दोनों नेताओं का राजनीतिक उदय नब्बे के दशक में हुआ. दोनों की उम्र भी समान है. लेकिन मायावती मुख्यमंत्री बन गईं. वो भी बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं. "
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर बीजेपी के तत्कालीन नेतृत्व को बेबी रानी मौर्य मायावती को चुनौती देने में सक्षम नज़र आती हैं तो वह मायावती का समर्थन क्यों करता. समर्थन ही नहीं, बीजेपी ने मायावती को चार में से तीन बार यूपी का सीएम बनने में मदद की है. शायद उन्हें लगता नहीं था कि ये भी एक नेता बन सकती हैं.
अब जब मायावती का दौर ख़त्म हो रहा है तब बीजेपी इन्हें उभारने की कोशिश कर रही है. लेकिन ये काफ़ी मुश्किल होगा कि वह उस तरह की नेता के रूप में उभर पाएं जैसा बीजेपी उन्हें बनाने की कोशिश कर रही है."
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कितनी बड़ी चुनौती है जाटव वोट बैंक?
उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव में बीजेपी ही नहीं सपा और कांग्रेस भी मायावती के दलित वोट बैंक में सेंधमारी करने की कोशिश कर रही हैं.
बीजेपी इससे पहले 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में दलितों को अपनी ओर लाने में सफल हुई है. लेकिन मायावती के प्रति समर्पित माना जाने वाला जाटव वोट बैंक अभी भी बसपा के साथ ही है.
बीजेपी बेबी रानी मौर्य को जाटव समुदाय से आने वाली नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है.
इसका प्रमाण बीजेपी की प्रचार सामग्री और बैनर एवं होर्डिंग में मिलता है, जहाँ बेबी रानी मौर्य के नाम के साथ जाटव उपनाम जोड़ा गया है. इसके साथ ही ट्विटर पर बीजेपी कार्यकर्ता भी उनका ज़िक्र करते हुए नाम के साथ जाटव उपनाम लिख रहे हैं.
बीते सितंबर तक उनके नाम के साथ जाटव उपनाम नहीं जोड़ा जाता था. वह अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर भी जाटव उपनाम नहीं लिखती हैं.
प्रधान बताते हैं, "ये बात मान लीजिए कि जाटव वोट बैंक आसानी से मायावती को छोड़ेगा नहीं. लेकिन बेबी रानी मौर्य कुछ न कुछ तो हासिल कर पाएंगी. क्योंकि कई जगह लोग ये सोच रहे होंगे कि मायावती अब सत्ता में नहीं आ पाएंगी.''
इस तरह की सोच से बड़ा फ़र्क़ पड़ता है क्योंकि ऐसे नेता की ओर लोगों का रुझान कम होता जाता है. अपनी जाति वाले मतदाताओं का रुझान भी कम होता जाता है."
बताया जाता है कि मायावती ने अपने मुख्यमंत्री काल के दौरान प्रदेश भर में आंबेडकर गाँवों से लेकर तमाम ऐसी योजनाएं लागू कीं जिनसे उनके प्रति दलित वोट बैंक मज़बूती से जुड़ गया.
लेकिन बीते दस सालों में दलित मतदाताओं की एक नई पीढ़ी सामने आई है जिसने मायावती के दौर को अनुभव नहीं किया है. बल्कि इस बारे में अपने बड़े - बूढ़ों से इस बारे में सुना भर है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बेबी रानी मौर्य युवा जाटव मतदाताओं को अपनी ओर ला पाएंगी.
इस सवाल के जवाब में प्रधान कहते हैं, "युवा मतदाताओं के मामले में जो बात मोदी और योगी पर लागू होती है. वही बात बेबी रानी मौर्य पर भी लागू होती है. युवाओं को नौकरियां और अवसर चाहिए जो देना मोदी और योगी के लिए मुश्किल रहा है तो बेबी रानी मौर्य के लिए संभव कैसे हो सकता है..."
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बीजेपी क्या चाहती है?
लेकिन सवाल ये उठता है कि चुनाव से ठीक पहले बेबीरानी मौर्य को एक जाटव नेता के रूप में पेश करके बीजेपी क्या हासिल करना चाहती है. ये स्पष्ट है कि किसी को भी चुनाव से कुछ महीने पहले मायावती के विकल्प के रूप में खड़ा करना आसान नहीं है.
इस सवाल का जवाब बीजेपी की राजनीति को क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र देते हैं.
मिश्र बताते हैं, "बीजेपी इस समय जो कुछ कर रही है, वो किसी विपक्षी दल को करना चाहिए. सत्तापक्ष को नहीं करना चाहिए. बेबी रानी मौर्य को इन्हें जाटव नेता के रूप में प्रचारित करना पड़ रहा है. उन्हें आज जाटव नेता लिखा जा रहा है, तो क्या वह मायावती की जगह ले पाएंगी, मायावती को नुकसान पहुंचा पाएंगी? मुझे ऐसा नहीं लगता है कि ये संभव है.''
मिश्र कहते हैं, ''आज के समय में बीजेपी बेबी रानी मौर्य को एक जाटव नेता के रूप में स्थापित करना चाहती है. उन्हें आगरा के बाहर कोई नहीं जानता. तो आप उन्हें कैसे प्रदेश स्तर का नेता बना लेंगे. उन्होंने लोगों के बीच काम नहीं किया है. हालांकि, उन्होंने सामाजिक कार्य किए हैं. मगर मुझे नहीं लगता कि वह मायावती जैसी शख़्सियत का मुक़ाबला कर पाएंगी."
https://twitter.com/babyranimaurya/status/1440179964880429081
लेकिन सवाल ये उठता है कि बीजेपी ये सब जानते हुए भी इतनी जल्दबाजी में ये कदम क्यों उठा रही है.
मिश्र इसके जवाब में कहते हैं, "इस समय बीजेपी को ये करना चाहिए था कि वह ये बताए कि उसने जाटव समुदाय के लिए क्या किया, उनके सम्मान की रक्षा करने के लिए क्या कदम उठाए, वह पिछले पाँच सालों में किए गए अपने काम गिनाए लेकिन वह जातियों के सम्मेलन कर रही है.''
''और बीजेपी ने ध्रुवीकरण की राजनीति करते हुए बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की राजनीति की है. ऐसे में क्या होता है कि अगर चार सौ जातियों में से प्रत्येक जाति का न्यूनतम 0.1 फीसदी वोट भी मिलता है तब भी आपको चालीस फीसदी वोट शेयर मिल जाता है. लेकिन अगर आप बहुसंख्यक में भी जाति की राजनीति करेंगे तो इसमें नुकसान आपका होगा.''
''इसके साथ ही राजनीतिक हथकंडे के रूप में बेबी रानी मौर्य को एक जाटव नेता के रूप में लॉन्च करना ठीक है. क्योंकि आपको कवरेज़ मिल रहा है. लेकिन राजनीतिक समझ के लिहाज़ से ये ठीक नहीं है."
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