भाजपा में लगातार हाशिये पर जा रहे हैं वरुण और मेनका गांधी, आगे क्या विकल्प हो सकते हैं ?
नई दिल्ली, 8 सितंबर: लखीमपुर खीरी हिंसा को लेकर विपक्ष के निशाने रही भारतीय जनता पार्टी के लिए उसके अपने सांसद वरुण गांधी बहुत बड़ी चुनौती बने हुए हैं। विपक्ष के हमलों को तो शायद वह झेल भी जाती, लेकिन वरुण के चुभते सवालों ने उसे अंदर से हिलाया है। ऐसे वक्त में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की टीम के लिए जो पहली बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की लिस्ट जारी हुई है, उसमें वरुण गांधी और मेनका गांधी को बाहर रखने से यही संकेत गया है कि उन्हें उनके तेवरों की ही सजा मिली है। असल में दोनों मां-बेटे मोदी-2.0 में लगातार हाशिये पर जा रहे हैं। लेकिन, पार्टी का ताजा ऐक्शन और वरुण का विद्रोही अंदाज कई सवालों को जन्म दे रहा है। सबसे बड़ा सवाल है कि उनकी आगे की राजनीति क्या होगी ?

बीजेपी में कैसे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं वरुण ?
बीजेपी ने अपने 80 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पीलीभीत से पार्टी सांसद वरुण गांधी और सुल्तानपुर से सांसद मेनका गांधी को अलग किया है, उसका तात्कालिक कारण लखीमपुर खीरी हिंसा को लेकर वरुण का विद्रोही रवैया बता जा रहा है। वैसे मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 17 साल से पार्टी से जुड़े वरुण ने कहा है कि उन्होंने पिछले 5 साल से एक भी राष्ट्रीय कार्यसमिति में हिस्सा नहीं लिया था और इसलिए उन्हें लगता है कि वह इसमें थे ही नहीं। तथ्य ये कि राजीव गांधी और सोनिया गांधी के सुपुत्र राहुल गांधी और सुपुत्री प्रियंका गांधी ने इस मुद्दे पर यूपी में जमीन पर उतर कर जिस तरह से मोदी-योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है, मेनका और संजय गांधी के बेटे वरुण ने ट्विटर पर ही वैसा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। तथ्य ये भी है कि कार्यसमिति से सिर्फ वरुण ही नहीं उनकी मां मेनका की भी छुट्टी की गई है।

भाजपा नेतृत्व से कैसे बनने लगी दूरी ?
2014 के चुनाव से पहले जब बीजेपी की कमान राजनाथ सिंह के हाथों में थी तो वरुण पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हुआ करते थे। जब अमित शाह ने यह जिम्मेदारी संभाली तो वरुण को किनारे कर दिया गया। कहते हैं कि 2014 में वरुण से जब अमेठी और रायबरेली में प्रचार करने के लिए कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया और इसी के बाद से पार्टी में उनका वह रुतबा नहीं रह गया। हालांकि, नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में मेनका गांधी को मंत्रिमंडल में जगह मिली। 2019 के चुनाव से पहले वरुण ने पीएम मोदी को अपनी दादी से बेहतर प्रशासक बताने की कोशिश भी की, लेकिन उनकी मां कैबिनेट में शामिल नहीं हो पाईं। पिछले जुलाई में जब प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का विस्तार करने वाले थे तो लगा था कि इस बार वरुण की एंट्री तय है। ट्विटर पर उनके सुर भी बदले हुए थे। लेकिन,ऐसा नहीं हुआ।

क्या वरुण गांधी कांग्रेस में जाने की तैयारी कर रहे हैं ?
भाजपा सूत्र वरुण गांधी के अगले कदम को लेकर कई तरह की बातें कर रहे हैं। पार्टी के एक सूत्र ने वनइंडिया से बातचीत में कहा है कि "चर्चा सिर्फ वरुण और मेनका पर ही क्यों हो रही है और भी तो कई बड़े नामों को हटाया गया है। दूसरों को भी तो मौका देना है। ऊपर से यूपी चुनाव में स्थानीय समीकरणों को भी तो देखना होता है।" इनका इशारा नई राष्ट्रीय कार्यसमिति में यूपी से गैर-यादव ओबीसी चेहरों जैसे कि बेबी रानी मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान को जगह दिए जाने की ओर था। वहीं, बीजेपी में कुछ और सूत्रों का कहना है "लगता है कि वे कांग्रेस में जाने की तैयारी कर रहे हैं।" इस सूत्र ने तो भारी मन से यहां तक संभावना जताई कि "हो सकता है कि उन्हें कांग्रेस से सीएम के चेहरे के तौर पर पेश करने की बात हो रही हो।"

प्रियंका करवाएंगी कांग्रेस में एंट्री ?
कांग्रेस 'परिवार' के तीनों प्रमुख सदस्यों में वरुण गांधी को प्रियंका गांधी का सबसे करीबी माना जाता है। उनका रवैया उनके प्रति पहले से नरम बताया जाता है। लेकिन, सवाल है कि अकेले प्रियंका के प्रभाव से उनकी उस घर में वापसी हो सकती है, जिससे कभी उनकी मां को वंचित रखा गया था। अगर ऐसा होता है तो यह भारतीय राजनीति का एक दिलचस्प मोड़ हो सकता है। लेकिन, इसमें कई सवाल हैं। क्या प्रियंका और वरुण मिलकर भी सोनिया और मेनका की दशकों पुरानी अदावत दूर कर सकते हैं? यही नहीं, जिस सोनिया पर राहुल गांधी को चेहरा प्रोजेक्ट करने के लिए कांग्रेस को कमजोर करने के आरोप पार्टी के भीतर के लोग ही लगाते रहे हैं, वह घर में ही एक तेज-तर्रार राजनेता को स्वीकार करने के लिए तैयार होंगी? राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं है! लेकिन, क्या इतना बड़ा बदलाव भी हो सकता है, यह बहुत बड़ा सवाल है?

तो सबसे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है ?
यह सही है कि वरुण सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि अगर उनके नाम में 'गांधी' नहीं होता तो वे 29 साल की उम्र में सांसद नहीं बनते। ये भी सही है कि राजनीति उनके खून में है। इसलिए उन्हें यह भी पता है कि अब यूपी में सिर्फ 'गांधी' नाम से चुनाव जीतना बच्चों का खेल नहीं रह गया है। अगर ऐसा होता तो उनके बड़े भैइया राहुल की अमेठी में स्मृति ईरानी से हार नहीं होती और उन्हें वायनाड नहीं जाना पड़ता। पिछले दो लोकसभा चुनावों में उनका खुद का भी अनुभव है कि संसद पहुंचने में उनके लिए 'गांधी' नहीं, 'मोदी' नाम काम आया है। ऐसे में वह भाजपा छोड़कर अपनी संसद सदस्यता को जोखिम में डालना चाहेंगे? अगर वह निजी तौर पर मान भी लें तो घोर हिंदुत्व वाले उनके पहले के नजरिए को राहुल गांधी स्वीकार करने के लिए तैयार हो पाएंगे ? और सबसे बड़ी बात क्या मेनका गांधी इसके लिए राजी हो पाएंगी ?












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