West Bengal News:क्या नंदीग्राम में ISF ने ममता बनर्जी के लिए खेल कर दिया है ?

कोलकाता: अब यह खुलकर जाहिर हो चुका है कि इसबार नंदीग्राम की लड़ाई ममता बनर्जी के नरम हिंदुत्व और सुवेंदु अधिकारी के आक्रामक हिंदुत्व के बीच हो रही है। बीजेपी यहां के 70 फीसदी हिंदू आबादी पर ताल ठोक रही है, लेकिन टीएमसी सुप्रीमो ने उसमें सेंध लगाने के लिए अपना हिंदू और ब्राह्मण कार्ड चलने की कोशिश की है। टीएमसी चीफ को कहीं ना कहीं लग गया है कि सिर्फ 30 फीसदी ठोस मुस्लिम आबादी के दम पर ही वो अपने पूर्व सहयोगी सुवेंदु को उनके गढ़ में जाकर ललकारेंगी तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल साबित हो सकती है। इसलिए उन्हें यह बताना पड़ रहा है कि वो भी हिंदू परिवार की बेटी हैं, वो भी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई हैं।

दो दिनों में 12 मंदिर और एक मजार पर पहुंचीं ममता

दो दिनों में 12 मंदिर और एक मजार पर पहुंचीं ममता

अपने नामांकन के लिए पर्चा भरने नंदीग्राम पहुंचीं टीएमसी अध्यक्ष सिर्फ दो दिनों में ही 12 मंदिर हो आईं। मंच पर चढ़कर चंडी पाठ सुना डाला। अगर उनके साथ वह दुर्घटना न हुई होती, जिसे टीएमसी उनकी 'हत्या की साजिश' और भाजपा 'पूर्व-नियोजित ड्रामा' बता रही है तो निश्चित रूप से दर्शनों का सिलसिला आगे भी जारी रहने वाला था। यहां यह गौर करने वाली बात है कि जिस मुख्यमंत्री पर भाजपा के लोग मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाते नहीं थकते हैं, उन्हे अपने चुनाव क्षेत्र में इसबार सिर्फ एक मजार पर जाने का समय मिल पाया। 12 मंदिर और 1 मजार, यह तो बहुत बड़ा 'चुनावी असंतुलन' लगता है। लेकिन, फिर भी भाजपा उन्हें बख्शने के लिए तैयार नहीं है। उनके प्रतिद्वंद्वी सुवेंदु अधिकारी का आरोप है कि उन्होंने गलत चंडी पाठ किया और उनके बारे में कहा कि वो 'मिलावटी हिंदू हैं, जो तुष्टिकरण की राजनीति के अपने पापों को नहीं धो सकती हैं।'

ममता के नरम और सुवेंदु के आक्रामक हिंदुत्व की लड़ाई

ममता के नरम और सुवेंदु के आक्रामक हिंदुत्व की लड़ाई

सीएम बनर्जी का मंदिर-मंदिर जाना और चुनावी मंचों से मंत्रोच्चार सुनाना, निश्चित तौर पर बीजेपी के आक्रामक हिंदुत्व की काट के तौर पर देखा जा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव का परिणाम देखने के बाद मुसलमानों के लिए भेदभाव करने के आरोपों से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें अब कोई चारा भी नजर नहीं आ रहा है। उनका डर कहिए या उनकी चुनावी भावना, यह उनकी जुबान पर भी आ रहा है। मंगलवार को एक रैली में उन्होंने बीजेपी से कहा- 'मेरे साथ हिंदू कार्ड मत खेलो।' इस विधानसभा क्षेत्र में 30 प्रतिशत मुसलमान हैं, जो पिछले दो विधानसभा चुनावों से पूरी तरह तृणमूल के साथ डटे रहे हैं। अधिकारी को बहुसंख्यक 70 फीसदी हिंदू वोटों पर पूरा भरोसा है। कुछ रैली में उन्होंने इसका जिक्र भी किया है कि उन्हें 70 फीसदी मतदाताओं पर पूरा यकीन है और 30 फीसदी को लेकर भी उन्हें चिंता नहीं है। हालांकि, टीएमसी नेताओं का दावा है कि चुनाव में मंदिरों में जाना उसकी समावेशी राजनीति की पहचान है।

'सुवेंदु ने हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर लिया तो बहुत ही मुश्किल हो जाएगी'

'सुवेंदु ने हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर लिया तो बहुत ही मुश्किल हो जाएगी'

जबकि, विपक्षी बीजेपी का कहना है कि उन्हें पता चल गया है कि सिर्फ मुस्लिम वोट से अब बात नहीं बनने वाली, इसलिए वह हिंदुओं पर डोरे डालने की ताक में हैं। सीएम के मंदिर पहुंचने पर अधिकारी बोले, 'उन्होंने यह सोचकर इस सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया, क्योंकि यहां 30 फीसदी आबादी एक खास समुदाय की है। आप देखिए न कि नंदीग्राम में उनके साथ कौन नेता घूम रहे हैं और सबकुछ समझ जाएंगे।' उन्होंने कहा कि, 'मैं एक हिंदू हूं और मैं समुदायों को विभाजित नहीं करना चाहता। ऐसा विभाजन टीएमसी पैदा कर रही है, अपनी तुष्टिकरण की नीति से।' जिले के एक वरिष्ठ टीएमसी नेता ने भी यह माना है कि सिर्फ मुस्लिम वोटों के दम पर इस सीट पर पार्टी की जीत सुनिश्चित नहीं हो सकती। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि 'नंदीग्राम में जिस तरह का सांप्रदायिक माहौल है और अगर सुवेंदु ने हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर लिया तो बहुत ही मुश्किल (टीएमसी के लिए) हो जाएगी।'

2013 से ही नंदीग्राम में शुरू हो चुका है ध्रुवीकरण

2013 से ही नंदीग्राम में शुरू हो चुका है ध्रुवीकरण

आज की हकीकत ये है कि टीएमसी और बीजेपी दोनों के नेता मान रहे हैं कि नंदीग्राम में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थिति है। ऐसे हालात एक दिन में नहीं बनी है। इसका सिलसिला 2013 के पंचायत चुनावों से ही शुरू हो चुका है। इन लोगों कहना है कि जीते हुए मुस्लिम नेताओं को जिला परिषद में महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया। सत्ताधारी दल की जिला इकाई में भी उनका बोलवाला रहा। इसके बाद 2016 में वहां निकली विशाल राम नवमी शोभा यात्रा ने दोनों के बीच खाई और बढ़ा दी। क्योंकि, उसमें बड़ी संख्या में टीएमसी कार्यकर्ता भी शामिल हो गए थे। जिस इलाके में बीजेपी को कोई नहीं जानता था, वहां 2016 में हुए तामलुक लोकसभा (नंदीग्राम सीट इसी का हिस्सा है) के उपचुनाव में पार्टी को 1.96 लाख वोट मिल गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट बढ़कर 5.34 लाख तक पहुंच गया।

बीजेपी जीते या हारे, लेकिन.....

बीजेपी जीते या हारे, लेकिन.....

एक स्थानीय बीजेपी नेता सबुज प्रधान ने दावा किया है कि, 'नंदीग्राम इस समय एक विस्फोटक पर बैठा हुआ है और इसके लिए सिर्फ टीएमसी की तुष्टिकरण की राजनीति जिम्मेदार है। अगर आप बहुसंख्यक समुदाय को उसके अधिकारों से वंचित करेंगे तो आपको उसके नतीजे भुगतने ही होंगे।' हालांकि, जिला परिषद के उपाध्यक्ष और ममता के इलेक्शन एजेंट शेख सुफियान भाजपा के आरोपों को नकार रहे हैं और उसपर गलत जानकारी फैलाने के आरोप लगा रहे हैं। टीएमसी के एक और नेता स्वदेश दास का दावा है कि यहां भाजपा को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा दिया जाएगा। उनके मुताबिक, 'यदि बीजेपी सोचती है कि वह यहां पर सारा हिंदू वोट ले लेगी तो वह बेवकूफों की दुनिया में जी रही है।' वहीं राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती को लगता है कि अपने पिच पर टीएमसी को बैटिंग के लिए मजबूर करके बीजेपी पहले ही सफल हो चुकी है। उन्होंने कहा है, 'नंदीग्राम में बीजेपी जीते या हार जाए, लेकिन उसने सत्ताधारी टीएमसी को वोट के लिए हिंदुत्व की लाइन पकड़ने के लिए मजबूर कर दिया है।'

आईएसएफ ने ममता के पक्ष में कर दिया खेल!

आईएसएफ ने ममता के पक्ष में कर दिया खेल!

शुरू में कांग्रेस-लेफ्ट फ्रंट गठबंधन की ओर से यह सीट फुरफुरा शरीफ के मौलवी अब्बास सिद्दीकी के आईएसएफ को मिलने वाली थी। निश्चित तौर पर अगर ऐसा होता तो यहां पर गठबंधन मुस्लिम वोटों का एक बहुत बड़ा हिस्सा काट लेता। लेकिन, अंतिम समय में इस सीट पर आईएसएफ के उम्मीदवार की जगह सीपीएम के उम्मीदवार उतारने का फैसला किया गया, जिसने अपनी युवा इकाई डीवाईएफआई की प्रदेश अध्यक्ष मीनाक्षी मुखर्जी को टिकट दे दिया है। यानी टीएमसी एक बहुत बड़ी लड़ाई तो यहां चुनाव शुरू होने से पहले ही जीत गई है! क्योंकि, अगर सिद्दीकी की पार्टी यहां पर कोई मुस्लिम उम्मीदवार देती तो मामला पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में एकतरफा भी हो सकता था।

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