Wayanad Landslide: तबाही का वो मंजर, जब बिलख रहे थे अनाथ बच्चे... कैसे ढाल बन खड़ी हुईं महिलाएं?
Wayanad Landslide: वायनाड से 30 जुलाई सुबह जो तस्वीरें सामने आईं वो वाकई रोंगटे खड़े कर देने वाली थीं। एक पल में तबाह हुए गांवों में फिर से जिंदगी शुरू करने के लिए जारी संघर्ष में महिलाएं बढ़ चढ़कर सहयोग कर रही हैं। कुछ ऐसी तस्वीरें हैं, जो चकाचौंध से बिल्कुल दूर हैं, लेकिन इस बात की पुष्टि करती हैं, ऐसे प्रयासों से लैंडस्लाइड के दौरान गर्त में पहुंच चुकी जिंदगी को फिर से मजबूती के साथ शुरू किया जा सकता है।

वायनाड में भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों चूरलमाला और मुंडक्कई में सेना का राहत व बचाव कार्य जारी है। सेना के अलावा, केरल की एक महिला लगातार घायलों की मदद कर रही है। इस भयावह आपदा की यादें अभी भी इस महिला को परेशान कर रही हैं। इस बीच जनजीवन सामान्य करने की कोशिशें भी जारी हैं। प्रभावित क्षेत्रों में डॉ. लोवेना, शायजा, दीपा और नयना जैसी महिलाएं एक बार फिर क्षेत्र में जीवन को बहाल करने की कोशिशों के बीच अथक प्रयास में जुटी हैं।
दीपा जोसेफ
केरल में पहली महिला एंबुलेंस चालक दीपा जोसेफ ने इस अभियान में बड़ी भूमिका निभाई। हालांकि बेटी की ब्लड कैंसर के कारण जान जाने के बाद दीपा जोसेफ का मानसिक तनाव बढ़ गया और उन्होंने ऐसी हालत में ड्राइविंग की नौकरी से ब्रेक लेना पड़ा था। लेकिन त्रासदी के चलते उन्होंने एक भार फिर ने ड्यूटी ज्वॉइन की। उन्होंने सुना कि वायनाड में एंबुलेंस की जरूरत है तो वह तुरंत कोझिकोड से वायनाड आ गईं। भूस्खलन के बाद पांच दिनों तक चले तलाशी अभियान का हिस्सा बनीं।
मीडिया से बातचीत में दीपा ने कहा कि एक और उनकी बेटी की मौत का सदमा था, और दूसरी और तबाही का मंजर, ऐसा में खुद को संभालना एक बड़ी चुनौती थी। दीपा ने कहा, "मैं मंगलवार, 30 जुलाई की रात को वायनाड पहुंचा। मैं अब अपने बेटे को देखने के लिए घर लौट आई...इन दिनों में, मेरी परी की यादों के ज्यादा तबाही का मंजर ही मेरे दिमाग में आईं, हालांकि बार- बार उस पल की याद आ रही थी जब मेरी बेटी ने अंतिम बार मुझे लगे लगाया था।
मेजर सीता शेल्के
वायनाड में तबाही के बीच मेजर सीता अशोक शेल्के के प्रयास भी कुछ कम नहीं है। ब्रिटिश काल में बना पुल बेली ब्रिज धंस जाने के बाद उनके नेतृत्व में महज 31 घंटे में इसे बहाल किया गया। बता दें कि इरुवंचिपुझास में स्थित ये पुल मिट्टी, पत्थर के मलबे में दब गया था। यह स्थिति भूस्खलन के चलते बनी थी। मीडिया को दिए एक बयान में मेजर शेल्के ने कहा, "सेना में महिलाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है। मैं जमीन पर तैनात सिपाही हूं...भारतीय सेना के एक हिस्से के रूप में मुझे सौंपा गया कार्य कर रही हूं।"
शेल्के के अलावा डॉ लोवेना मुहम्मद ने भी वायनाड में राहत बचाव कार्य के दौरान समर्पित रहीं। हालांकि लेवेना एक्रोफोबिक हैं, लेकिन केरल के हालात ऐसे हुए कि वे भी राहत बचाव अभियान में शामिल होने के खुद को रोक नहीं पाईं। मंजर देख उन्होंने खुद पर विजय पा ली।
कोझिकोड के एस्टर एमआईएमएस अस्पताल में आपातकालीन चिकित्सा वरिष्ठ विशेषज्ञ, डॉ. मुहम्मद मैसूर अपने साथ अपनी बेटी को भी वायनाड वापस बुलाया और आपातकालीन चिकित्सा कार्य में मदद की। इसके इसके लिए उन्होंने अपनी बेटी को मैसूर यात्रा रद्द करवा दी। मीडिया के साथ बातचीच में डॉक्टर बानो ने कहा कि उन्हें अपने बेटी का लोगों को बचाने के प्रति जुनून देख गर्व हुआ। उन्होंने बताया कि जब टीवी पर उन्होंने अपनी बेटी को रस्सी से लटकते और तेज नदी पार करते हुए देखा। डॉ. मुहम्मद ने कहा, "बेटी पर मुझे बहुत गर्व है।"
शायजा बेबी
मुंडक्कई की एक आशा कार्यकर्ता शायजा बेबी ने लगभग 100 की पहचान की। शायजा बेबी मुंडक्कई पंचायत की पूर्व वार्ड सदस्य हैं। वे मेप्पडी स्वास्थ्य केंद्र पर ड्यूटी दे रही थीं। जहां मृतकों के शव पहुंच रहे थे। इनमें से कई ऐसे परिवार थे, जो कि पूरे के पूरे तबाही में खत्म गए। ये मंजर शायजा बेबी ने खुद अपनी आंखों से देखा। कई मासूम बच्चे भी अनाथ हो गए। अपने जीवन संघर्ष के बारे में जिक्र करते हुए एक बयान में शायजा बेबी ने कहा, "मैं 25 साल की उम्र में विधवा हो गई जब मेरे पति ने कर्ज के कारण अपनी जान ले ली। उस समय मेरे बच्चे क्रमशः केवल 4 और 2 वर्ष के थे। मैंने चाइल्डलाइन के साथ काम करना शुरू किया और बाद में स्वास्थ्य विभाग में आशा कार्यकर्ता बन गई।"
स्कारिया
वहीं ह्यूमेन सोसाइटी इंटरनेशनल इंडिया (एचएसआई-इंडिया) की राज्य समन्वयक, स्कारिया, अपनी टीम के साथ, भूस्खलन से अनाथ हुए जानवरों की देखभाल कर रही हैं। तबाही के बीच से रेस्क्यू किए गए जीव वे घायल, भूखे, थके हुए और डरे हुए थे। वे प्रत्येक राहगीर की ओर इस आशा से देखते थे कि उन्हें किसी प्रिय चेहरे की एक झलक मिल जाए या उन लोगों की गंध का अहसास हो जाए जो उनके अपने थे। दरअसल, स्कारिया ने अनाथ जानवरों की देखभाल के लिए 24/7 पशु बचाव नियंत्रण कक्ष खोला है। जिसमें 20 कुत्तों, सात बिल्लियों और 22 मवेशियों की देखभाल की जा रही है।
इसकी एक टीम है, जिसमें दो पशु चिकित्सक शामिल हैं। पालतू जानवरों की देखभाल के अलावा ये टीम प्रभावित क्षेत्रों की खोज करती है और राहत शिविर के निवासियों के साथ-साथ एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना, अन्य बचाव टीमों और समाचार चैनलों से सूचनाएं प्राप्त करती है।
त्रासदी के दौरान जानवरों में डर का जिक्र करते हुए स्कारिया ने एक बयान में कहा, "ज्यादातर जानवर गंभीर रूप से निर्जलित, एनीमिया से पीड़ित, भूखे, घायल या कुछ संक्रमण वाले थे...हमने खून की कमी वाले एक कुत्ते को खाना खिलाया था, जिसे बाद में गोद ले लिया गया। अपने हमेशा के लिए घर के लिए निकलते समय, उसने अपनी चमकती आंखों से मेरी ओर देखा।"
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