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तो फरवरी में हुआ था मसरत आलम की रिहाई का फैसला

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) को क्या मसरत आलम को छोड़ने का फैसला पहले हो गया था...अब अचानक 4 फरवरी का एक पत्र जम्मू कश्मीर के गृह सचिव का निकला गया है जिसमें कहा जा रहा है कि मसरत आलम को छोड़ने का फैसला तो पहले ही हो गया था।

चुनाव और रिहाई

दावा यह भी हो रहा है कि चुनाव के चलते रुक गया था फैसला। कहा यह जा रहा है कि कई ऐसे अलगाववादियों एवं अन्य करीब 800 को छोड़ने का फैसला राज्यपाल शासन के समय ही हो गया था।

किसके हमदर्द

वरिष्ठ लेखक अवधेश कुमार कहते हैं कि जम्मू कश्मीर प्रशासन में, पुलिस में, राजनीति में..... और वहां मजहबी संगठनों में ऐसे लोगों की संख्या क्या कम है जो अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, उनसे हमदर्दी रखते हैं, उनकी आवाज को उचित मानते हैं! जाहिर है, फैसले के पीछे जो भी कानूनी तर्क हों, मानसिकता तो वही है। बहरहाल, एक बात साफ है कि कश्मीर में आजादी या पाकिस्तान जिन्दाबाद, भारत विरोध, सेना सुरक्षा बलों को खलनायक बनाने का सिलसिला थमने वाला नहीं है।

अफजल का शव

आज अफजल गुरु का शव मांगा जा रहा है, उसके सामान मांगे जा रहे हैं, किसी समय मकबूल बट्ट के संदर्भ में यही था। कुछ आतंकवादियों को रिहा कराने के लिये रुबिया सईद का अपहरण हुआ।

अवधेश कुमार ठीक ही कहते हैं कि पहले के आतंकवादी आज अहिंसक अलगाववादी हैं। कुछ सामने हैं, कुछ नकाब के पीछे हैं। उनमें वो लोग हैं जो सरकारी दफ्तर में बैठकर ऐसे पत्र बनाते हैं, पत्र के लिए आधार बनाते हैं।

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