सोशल मीडिया में पॉपुलर जंग 'भक्त बनाम आपिये'

26 मई 2014 को पीएम नरेंद्र मोदी के द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ पीएम नरेंद्र मोदी की खातिर सियासी दल सवाल तैयार करने में जुट गए। हालांकि सवालों की इस लंबी फेहरिस्त से देश के विकास, विकास के माध्यम, आम आदमी के लिए योजनाएं आदि तमाम बातें नदारत थीं। सवाल निजी जिंदगी से थे कि जशोदाबेन के बारे में पीएम ने क्यों सही जानकारी नहीं दी। डिग्रियों को सार्वजनिक करें। पीएम ने सूट कैसे सिलवाया। इतना महंगा सूट कहां से लिया। स्मृति ईरानी कितना पढ़ी लिखी हैं। आदि आदि।

Modi, Kejriwal

अलग-अलग विचारधाराओं से ग्रसित लोगों, कथित पत्रकारों ने एक नया नाम चलन में लाने की कोशिश की। जी हां ''भक्त''...लेकिन ये भक्त शब्द पलटवार करते हुए विचारधाराओं के लबादे से ढ़के लोगों पर ही हावी हो गया। दरअसल कहीं न कहीं इस बात के पीछे वजह ये थी कि पार्टी, नेता विशेष का समर्थन करने वालों की पॉपुलरटी पर शायद सवालिया निशान हर वक्त मुंह बाए हुए खड़ा रहता था। जिसके जवाब में वे भक्त की टैगलाइन को ईजाद कर सभी को एक कैटेगरी में लाने का प्रयास कर रहे थे। बहरहाल जो भी हो ये भक्त और विचारधाराओं से चिपके हुए लोगों के बीच की बात है।

सोशल मीडिया पर पीएम नरेंद्र मोदी के समर्थकों के लिए भक्त नामकरण किया गया तो आम पार्टी के समर्थकों को आपिया कह कर कटाक्ष करने का प्रयास जारी है। हां आपको बताता चलूं कि न तो यहां पर किसी व्यक्ति विशेष की मुखालिफत करने की कोशिश की जा रही है न ही हिमायत करने का ही प्रयास किया जा रहा है। पर, सवाल उठाए जा रहे हैं। क्योंकि भारत में अनपढ़ नेताओं की संख्या किसी से छिपी या दबी हुई नहीं है। लेकिन इस बीच महज प्रधानमंत्री मोदी की शिक्षा पर सवाल उठाने का प्रयास क्या वाकई सही है।

हो सकता है कि इस पर जवाब ये हो कि इतने बड़े औदे पर बैठने पर यह सवाल तो लाजमी है। लेकिन अन्य नेताओं को भी जिम्मेवारी तो सौंपी ही गई है। जो कि जनता से जुड़ी है। पर, सोशल मीडिया पर इस जंग को फोटोशॉप, जुमलेबाजी आदि तरीकों से उछाला जा रहा है। माध्यम कई हैं, विवाद भी कई। लेकिन पूरी की पूरी जंग भक्त बनाम आपियों की है। कोई भी मुद्दा हो, उदाहरण के तौर पर ऑगस्टावेस्टलैंड घोटाला या फिर ऑड-ईवन का विफल होना जमकर एक दूसरे पर वार किये जाते हैं। जबकि सरकार समेत समर्थकों के लिए इस बात को जानना बेहद जरूरी है।

इनके पास तो जांच के लिए डिग्री ही नहीं

1- बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकीं राबड़ी देवी की शादी महज 14 साल की उम्र में हो गई थी। उन्होंने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। ना शादी से पहले और ना ही बाद में। आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से शादी के बाद वो उनकी पत्नी और उनके बच्चों की मां की भूमिका में ही रहीं। कोई अनुभव ना होने और अनपढ़ होने के बावजूद 1997 में लालू उन्हें राजनीति में लेकर आए। इसके बाद राबड़ी देवी ना सिर्फ बिहार की मुख्यमंत्री बनीं।

2- फिल्मों से राजनीति में पलायन करने वाली जयललिता भी इसी सूची में आती हैं। जानकारी की मानें तो कभी अभिनेत्री रहीं जयललिता एक होनहार छात्रा रही हैं, और यहां तक कि मैट्रिक करने के बाद उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए स्कॉलरशिप भी हासिल की थी। पर, फिल्मों में करियर शुरू करने की वजह से उन्होंने पढ़ाई को वहीं पर छोड़ दिया।

3- शायद आप इस बात पर यकीन न करें कि तमिलनाडु के सबसे धनी नेता माने जाने वाले करूणानिधि कभी कॉलेज नहीं गए। जबकि उन्होंने कई सुपरहिट मूवीज के लिए स्क्रिप्ट पर अपनी कलम चलाई है।

4- क्या आप जानते हैं कि पूर्व मं रेल मंत्री रह चुके जाफर शरीफ ने सिर्फ मैट्रिक किया है। दरअसल उन्होंने अपने करियर की शुरूआत एस निजलिंगप्पा के बतौर ड्राइवर के रूप में की थी। उनके कदमों को अनुसरण करते हुए जाफर ने राजनीति में शामिल हो गए।

5- लोगों के दिलों में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की डिग्री को लेकर भी सवाल चर्चा के दौरान उठते रहते हैं लेकिन इस मामले में आम आदमी पार्टी सवाल नहीं उठाती है। हां इसके लिए वाजिब वजह भी है क्योंकि कांग्रेस फिलहाल बेदम है। तो उससे मुकाबला ''आप'' नहीं समझ रही।

इन नेताओं समेत कई अन्य नेता भी हैं जिनकी शिक्षा खुद ब खुद प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ खबरों में बतौर रिपोर्ट बनकर सजाई गई हैं। लेकिन सियासत के लगातार पीएम मोदी पर हमले क्या वाकई इस बात का गवाह हैं कि सभी सियासी दलों को 2019 की चिंता सताने लगी है।

हाल ही में दिल्ली में ऑड ईवन के दूसरे ट्रायल के दौरान पाया गया कि प्रदूषण रोकने में केजरीवाल सरकार पूरी तरह से विफल साबित हुई है, लेकिन इस नियम से लोगों के लिए केजरीवाल सरकार ने अच्छी खासी समस्याएं खड़ी कर रखी थीं। जबकि इस पूरे नाट्य के बाद खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री ने माना कि ऑड ईवन समस्या का स्थाई हल नहीं है। जिसे लेकर लोगों ने सोशल मीडिया पर तरह तरह के कमेंट्स के जरिए दिल्ली के मुखिया का खूब मजाक उड़ाया।

दिल है कि मानता नहीं

जी हां भारतीय जनता पार्टी के द्वारा पीएम मोदी की डिग्री क सार्वजनिक किए जाने के बावजूद आप के भीतरी खेमे से आवाज आ रही है कि.....दिल है कि मानता नहीं। दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में आप नेता अाशुतोष ने कहा कि प्रधानमंत्री की बीए और एमए की डिग्रियों में दर्ज नाम में अंतर है। उन्होंने कहा कि बीए की डिग्री में नाम नरेंद्र कुमार दामोदर दास मोदी दर्ज है, जबकि एमए की डिग्री पर नाम नरेंद्र दामोदर दास मोदी दर्ज है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के बीए के अंकपत्र और डिग्री में परीक्षा का साल अलग-अलग है। उन्होंने कहा कि अंकपत्र में साल 1977 और डिग्री में 1978 दर्ज है।

कब होगी देश के विकास की बात?

लोगों का मानना है कि केजरीवाल भले ही राजनीति में एक लंबे अनुभव के साथ न हों लेकिन फिलहाल मुद्दों को देखकर लग रहा है कि वे विशुद्ध राजनेता हैं। जो कि सियासत का मतलब महज निजी फायदे के लिए कर रहे हैं। देश के विकास की बात की बजाए बेफजूल के सवालों पर वक्त जाया किया जा रहा है। क्यों इससे पहले उन्होंने राबड़ी देवी पर सवाल नहीं उठाया। क्यों तेज प्रताप यादव के साथ उनके सवाल नहीं उठे। क्योंकि उस राज्य से मतलब नहीं है।

केजरीवाल देश के विकास की तो बात करते हैं इस नाते तो उन्हें सवालों को महज व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं करना चाहिए। दिल्ली की जनता की ही मानें तो अब तक केजरीवाल के सभी प्लान फ्लॉप साबित हुए हैं। विकास की रफ्तार शीला दीक्षित के शासन समय से भी धीमी पड़ गई है।

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