VP Singh: 'गुमनामी' के बाद अचानक क्यों याद आए 'सामाजिक न्याय के संरक्षक'

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सोमवार 27, नवंबर 2023 को15वीं पुण्यतिथि मनाई गई। 1889 में उनकी सरकार ने केंद्रीय नौकरियों में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लागू किया था, जिससे देश की राजनीति की दिशा बदल गई थी।

वीपी सिंह सरकार के उस ऐतिहासिक फैसले की राजनीतिक फसलें कुछ पार्टियां आजतक काट रही हैं। लेकिन, हकीकत ये है कि उन्हीं दलों ने डेढ़ दशकों या उनकी सरकार गिरने के बाद से ही उनके नाम को लगभग 'गुमनामी' में ही छोड़े रखने में भलाई समझी थी।

vp singh statue at chennai presidency college

सीएम स्टालिन ने वीपी सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया
लेकिन, वीपी सिंह की 15वीं पुण्यतिथि अचानक सुर्खियों में आई है। इसकी वजह ये है कि तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई स्थित प्रेसीडेंसी कॉलेज में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने उनकी आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया है।

सपा नेता अखिलेश यादव भी कार्यक्रम में मौजूद
इस मौके पर यूपी के पूर्व सीएम और सपा नेता अखिलेश यादव भी वहां मौजूद थे। तमिलनाडु सरकार की ओर से जारी बयान के मुताबिक वीपी सिंह की प्रतिमा राज्य सरकार ने 52.2 लाख रुपए खर्च करके बनवाई है।

इस अवसर पर तमिलनाडु के सीएम स्टालिन बोले कि 'यह प्रतिमा उस महान नेता के सम्मान में तमिल समुदाय की ओर से आभार के तौर पर बनाई गई है।' उन्होंने ये भी कहा कि अगर उत्तर प्रदेश वीपी सिंह की 'मातृभूमि' है तो तमिलनाडु उनकी 'पितृभूमि' है।

तो अब तक क्यों 'गुमनाम' रहे 'सामाजिक न्याय के संरक्षक'?
उन्होंने कहा कि 'वे (वीपी सिंह) अपने भाषणों में थानथाई पेरियार का जिक्र करना कभी नहीं भूलते थे और इसी वजह से पेरियार के सामाजिक न्याय की भूमि में, पहली बार उनके लिए एक प्रतिमा स्थापित की गई है।'

तमिलनाडु के सीएम ने वीपी सिंह के प्रधानमंत्री के तौर पर 11 महीने के कार्यकाल की सराहना करते हुए कहा, 'यह (वीपी सिंह) सामाजिक न्याय के संरक्षक थे, जिन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में मंडल आयोग की सिफारिश के आधार पर 27 फीसदी आरक्षण लागू किया था.....'

मंडल पार्ट-2 की राजनीति का असर?
बिहार में सीएम नीतीश कुमार की अगुवाई वाली महागठबंधन सरकार ने इस साल 2 अक्टूबर को जो जातीय जनगणना के आंकड़े जारी किए हैं, उसके बाद देशभर में ऐसी जनगणना कराए जाने की मांग जोर पकड़ रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी को तो इस मुद्दे में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने का रास्ता नजर आ रहा है।

बिहार सरकार ने तो जातीय जनगणना के आंकड़े जारी करने के बाद आरक्षण का कुल कोटा सुप्रीम कोर्ट के तय मानक को भी दरकिनार कते हुए 75% तक बढ़ा दिया है। कई राजनीतिक विश्लेषक तो जातीय जनगणना पर हो रही मौजूदा राजनीति को मंडल पार्ट-2 का नाम दे रहे हैं।

तथ्य यह है कि वीपी सिंह का निधन 27 नवंबर, 2008 को हुआ था। यह वो दिन था, जब मुंबई में हुए पाकिस्तानी आतंकियों के हमले (26 नवंबर, 2008) से पूरी दुनिया सन्न थी। हो सकता है कि इस वजह से तब वीपी सिंह के निधन की खबर भी लोगों तक समय पर नहीं पहुंच सकी थी।

लेकिन, यह भी तथ्य है कि जब 10 नवंबर, 1990 को उनकी सरकार गिरी, उसके बाद से उस जनता दल परिवार के नेताओं ने ही उन्हें भुलाए रखा, जिससे निकले नेता कम से कम बिहार में अबतक लगातार कुर्सी पर काबिज बने बैठे हैं।

यूपी में भी सपा को बीच-बीच में मौका मिला। लेकिन, वीपी सिंह को सत्ता जाने के बाद जनता दल परिवार से वह सम्मान कभी नहीं मिल पाया था, जैसा अचानक तमिलनाडु में अब दिखाई पड़ रहा है।

आरक्षण की राजनीति के लिए याद आए वीपी सिंह?
अगर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के भाषण पर गौर करें तो विश्वनाथ प्रताप सिंह को अचानक से याद किए जाने का कारण मालूम हो सकता है। उन्होंने कहा, 'वीपी सिंह पिछड़े समुदाय से नहीं थे और न ही वह गरीब परिवार से थे, लेकिन उन्होंने गरीबों, दबे-कुचले और उत्पीड़ित लोगों को आरक्षण दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी।'

इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार के सामने यह मांग भी रख दिया कि राष्ट्रीय जनगणना के साथ ही जातीय जनगणना भी करवाए और सही तरीके से आरक्षण लागू करे।

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मुद्दे की बात ये है कि राहुल गांधी ने 'जितनी आबादी, उतना हक' का मुद्दा उठाया है और 'मंडल' आधारित राजनीतिक दलों ने उसे कसकर लपक लिया है। शायद यही वजह है कि पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह आरक्षण आधारित राजनीति करने वाले दलों के लिए एक बार फिर से प्रासंगिक हो गए लगते हैं।

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