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Telangana Election: देश के चुनावी इतिहास में पहली बार, मुस्लिम वोट क्यों हो सकता है दो फाड़?

तेलंगाना विधानसभा चुनावों के लिए 30 नवंबर को वोट डाले जाने हैं। लेकिन, अभी तक मुस्लिम वोट बैंक के बीच असमंजस की स्थिति देखी जा रही है। इस बार उनका वोट बैंक पूरी तरह से विभाजित नजर आ रहा है।

देश के चुनावी व्यवस्था में यह एक तरह से आम धारणा है कि मुस्लिम वोट आमतौर पर एकजुटता के साथ किसी पार्टी के पक्ष में या किसी को हराने के लिए पड़ता है। तेलंगाना में मुस्लिम वोट बैंक के लिए इस बार कांग्रेस और बीआरएस में लड़ाई बराबर की लग रही है।

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तीन घटनाओं से विभाजित हुई मुसलमानों की राय!
तेलंगाना में मुसलमानों का वोट 12.7% अनुमानित है। पिछले मई महीने तक राज्य के मुसलमानों का एकतरफा झुकाव सत्ताधारी बीआरएस के पक्ष में नजर आता था। लेकिन, इस बीच की तीन घटनाक्रमों ने इनकी एकजुटता पर सवालिया निशान लगा दिया है।

कर्नाटक में कांग्रेस की शानदारी जीत, दिल्ली शराब घोटाले में बीआरएस नेताओं से ईडी की पूछताछ के बावजूद उनकी गिरफ्तारी नहीं होने और बीआरएस-बीजेपी नेताओं के चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में जाने से राज्य के मुसलमानों के चुनावी राय में बदलाव हुआ है।

कांग्रेस लगातार प्रचार कर रही है कि बीआरएस और बीजेपी में अंदरूनी तालमेल है और एआईएमआईएम को भी वह भाजपा के इशारे पर चलने वाली पार्टी होने का आरोप लगाती है। जबकि, बीआरएस और एआईएमआईएम उसपर पलटवार कर रहे हैं।

29 सीटों पर नतीजा तय करेंगे मुसलमान!
ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक तेलंगाना में अल्पसंख्यकों को लगता है कि राज्य की 119 विधानसभा सीटों में से लगभग 29 सीटों पर उनका वोट परिणामों को प्रभावित कर सकता है। क्योंकि, कुछ क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 15% से भी ज्यादा है।

इनमें से पुराने हैदराबाद इलाके की सात सीटों पर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम का दबदबा है। क्योंकि, यहां 50% से लेकर 90% तक मुस्लिम वोटर हैं। इनके अलावा अन्य 22 सीटें भी ग्रेटर हैदराबाद और आसपास के इलाकों की हैं।

इसी तरह से निजामाबाद, जाहिराबाद, करीमनगर, सांगारेड्डी और आदिलाबाद में भी मुसलमानों के वोट अच्छी संख्या में हैं और कुल मिलाकर 35 से 40 सीटें ऐसी हैं, जहां इनका वोट किसी की हार-जीत के लिए मायने रख सकता है।

मुसलमान बीआरएस और कांग्रेस के बीच बंटे हुए हैं- मुस्लिम वोटर
निजामाबाद के रहने वाले सैयद माजी कामारेड्डी के पुराने बस स्टैंड में फूल बेचते हैं। उनका कहना है, 'मेरे समुदाय के लोग यहां और निजामाबाद में भी इस बार बीआरएस और कांग्रेस के बीच बंटे हुए हैं। बीआरएस के खिलाफ शिकायत करने के लिए हमारे पास खास कुछ भी नहीं है, फिर भी हममें से कई लोग सोचते हैं कि देश में जो हालात हैं, उसमें कांग्रेस ही बीजेपी का सीधा सामना कर रही है।'

लेकिन, सिरसिला के पास एक होटल में काम करने वाले मोहम्मद परशा की सोच पूरी तरह से स्पष्ट है। उनका कहना है, 'केसीआर सरकार में हम सुरक्षित और लाभांवित महसूस करते हैं और हम बीआरएस को ही वोट देते रहेंगे।'

केसीआर सरकार ने राज्य के अल्पसंख्यक समुदायों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई हैं। उन्हें हर तरह की सहायता और सुविधाएं दी जा रही हैं। इसके जवाब में कांग्रेस ने भी 'माइनोरिटी डिक्लेरेशन' के नाम पर मुसलमानों के लिए वादों का पिटारा खोल दिया है।

तेलंगाना विधानसभा में सिर्फ 8 मुस्लिम विधायक, 7 एआईएमआईएम के
लेकिन, हकीकत ये है कि पुराने हैदराबाद के बाहर बीआरएस ने सिर्फ एक और कांग्रेस ने दो ही मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। 2014 और 2018 दोनों ही बार तेलंगाना में 8 मुस्लिम एमएलए चुने गए और दोनों ही बार इनमें से 7 एआईएमआईएम और 1 बीआरएस के विधायक थे।

मुस्लिम संगठनों में भी दो फाड़
राज्य में बीआरएस सरकार की ओर से मुसलमानों के हित में कई कदम उठाए जाने के बावजूद इस बार स्थिति ये है कि चुनावों में समर्थन को लेकर कई मुस्लिम संगठन पूरी तरह से बंटे हुए नजर आ रहे हैं। मसलन, यूनाइटेड मुस्लिम फोरम अधिकतर सीटों पर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) का समर्थन कर रहा है तो तहरीक मुस्लिम शब्बान कांग्रेस के पक्ष में खड़ा है।

इसी तरह से जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दो धड़ों में से एक बीआरएस का समर्थन कर रहा है, तो दूसरा कांग्रेस के साथ है। लेकिन, जमात-ए-इस्लामी तेलंगाना चैप्टर ने तो मुस्लिम मतदाताओं का कंफ्यूजन और बढ़ा दिया है।

इस मुस्लिम संगठन ने राज्य की 69 सीटों पर कांग्रेस को, 41 पर बीआरएस को, 7 पर एआईएमआईएम को, 1-1 पर सीपीआई और बीएसपी को समर्थन देने की घोषणा की है।

निश्चित तौर पर मुसलमान वोट बैंक में इस तरह का विभाजन अजूबा ही लग रहा है। ऐसे में तेलंगाना का चुनाव परिणाम क्या होगा, यह जानना और भी दिलचस्प हो गया है।

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