एग्जिट पोल के नतीजों से सहमे मुस्लिम परिवार, बोले भाजपा के सत्ता में आने से बढ़ेगा तनाव
नई दिल्ली। देश के उत्तरी राज्य उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में स्थित नया बांस गांव के लोगों की जिंदगी पिछले दो सालों में काफी बदल सी गई है। नया बांस गांव में रहने वाले मुस्लिम परिवारों का कहना है कि उन्हें याद है जब उनके बच्चे भी हिंदू बच्चों के साथ खेलने जाते थे। दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे के साथ खुलकर बातें करते थे, दुकानों और त्योहारों में साथ जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स में छपी एक खबर के मुताबिक, गांव के कुछ लोग भयभीत है तो कुछ गांव छोड़कर जाने की सोच रहे हैं। क्योंकि पिछले दो वर्षों में दोनों समुदाय ध्रुवीकृत हो गए हैं।

पीएम मोदी दोबारा सत्ता में फिर आते हैं तो परेशानी और बढ़ सकती हैं
गांव मे रहने वाले चिंतित मुस्लिम परिवारों का कहना है कि अगर पीएम मोदी की हिंदू राष्ट्रीय पार्टी बीजेपी दोबारा सत्ता में आती है तो परेशानी और ज्यादा बढ़ सकती हैं। हाल ही में आए एग्जिट पोल के नतीजों से एनडीए को बहुमत मिलने के संकेत मिल रहे हैं और मोदी सरकार फिर से पांच साल के लिए सत्ता में आ जाएगी। गांव के लोगों का कहना है कि, पहले चीजें बेहतर थी। रोटी और तम्बाकू बेचने वाली एक छोटी सी दुकान चलाने वाले गुलफ़ाम अली का कहना है कि, हिंदू मुस्लिम बुरे और अच्छे वक्त में एक दूसरे के साथ रहते थे। फिर चाहे किसी की शादी हो या किसी का मातम। अब हम उसी गाँव में रहने के बावजूद अपने अलग तरीके से रहते हैं।

'मोदी और योगी ने सब कुछ बर्बाद कर दिया'
2014 में मोदी सत्ता में आए और भाजपा ने उत्तर प्रदेश राज्य को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिसमें 2017 में नायबंस भी शामिल हैं। राज्य के मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ, एक हिंदू पुजारी और वरिष्ठ भाजपा व्यक्ति हैं। एक अन्य ग्रामीण अली ने कहा, मोदी और योगी ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। उनका असली मकसद हिंदू-मुस्लिम को अलग करना है। ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ। हम इस जगह को छोड़ना चाहते हैं, लेकिन असल में ऐसा नहीं कर सकते हैं।अली ने बताया कि पिछले दो सालों में उसके चाचा सहित दर्जनों परिवार गांव छोड़कर जा चुके हैं। लेकिन भाजपा इस तरह की खबरों से इंकार करती रही है।

उनके घाव अभी तक नहीं भर पाए हैं, यहां अभी भी हालात सुधरे नहीं हैं
पिछले साल तक जहां नयाबांस में गेंहू के खेत, संकरे रास्ते और उनमें घूमती बैलगाड़ियां और गाय दिखती थीं, वही अब यहां एक अलग तरह का माहौल देखने को मिल रहा है। अब यहीं चीजें भारत के गहरे विभाजन का प्रतीक बन गई हैं क्योंकि इलाके के कुछ हिंदू पुरुषों ने शिकायत की थी कि उन्होंने मुसलमानों के एक समूह को गायों को मारते देखा है, जिसे हिंदू पवित्र मानते हैं। जिसके बाद माहौल काफी बिगड़ता चला गया। हाईवे को रोक दिया गया, गाड़ियां जलाई गईं और एक पुलिस अधिकारी सहित दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। बुलंदशहर में हुई इस हिंसा के लगभग पांच महीने बाद 4 हजार की जनसंख्या वाले इस गांव के लगभग 400 मुस्लिमों का कहना है कि उनके घाव अभी तक नहीं भर पाए हैं, यहां अभी भी हालात सुधरे नहीं हैं। इस घटना ने सब कुछ बदलकर रख दिया। एक ऐसे देश में जहां 14 फीसदी आबादी मुस्लिम और 80 फीसदी हिंदू हैं। नयाबांस उन जगहों के तनाव को दर्शाता है जहां मुस्लिम निवासी के अधिकतर पड़ोसी हिंदू होते हैं। भाजपा के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि इस सरकार के अधीन देश में कोई दंगे नहीं हुए हैं। क्या आपराधिक घटनाओं पर रोक लगाना गलत है, जिसे हम हिंदू-मुस्लिम मुद्दे कहते हैं। विपक्ष सांप्रदायिक राजनीति खेल रहा है लेकिन हम शासन की निष्पक्षता में विश्वास करते हैं। न किसी का तुष्टिकरण, न किसी की निंदा।

पहले भी संप्रदायिक संघर्ष देख चुका है नयाबांस
गांव के लोगों का कहना है कि, नयाबांस गांव का इस तरह के संघर्ष से पुराना रिश्ता रहा है। 1977 में एक मस्जिद बनाने के प्रयासों के चलते यहां सांप्रदायिक दंगे हो गए थे जिसमें दो लोग मारे गए थे। लेकिन उसके बाद 40 वर्षों तक गांव के साथ मुलजुल कर रहे। कुछ मुस्लिम निवासियों ने कहा कि मार्च 2017 में योगी के पदभार संभालने के बाद हिंदू कट्टरपंथियों ने खुद को गाँव में और बढ़ाना शुरू कर दिया। 2017 में मुस्लिम पवित्र महीने रमजान के आसपास इस गांव का माहौल खराब हो गया। हिंदू कार्यकर्ताओं ने मुसलमानों से उनके मदरसे में लगे लाउडस्पीकर का उपयोग बंद करने की मांग की। ये मदरसा एक मस्जिद के तौर पर भी काम करता है। इन लोगों का कहना था कि, इससे उन्हें परेशानी होती है।

'हम यहां किसी भी तरह से अपने धर्म को व्यक्त नहीं कर सकते हैं'
वहीं एक 63 वर्षीय दर्जी हिंदू बुजुर्ग ओम प्रकाश ने कहा, यहां शांति है, लेकिन हम वहां किसी भी माइक को बर्दाश्त नहीं करेंगे। वह मदरसा है, मस्जिद नहीं। कानून की पढ़ाई कर रही मस्लिम छात्रा आएशा ने कहा कि, हम यहां किसी भी तरह से अपने धर्म को व्यक्त नहीं कर सकते हैं, लेकिन वे जो भी करना चाहते हैं करने के लिए स्वतंत्र हैं। आएशा ने कहा कि त्योहार के जुलूस के दौरान गाँव के हिंदू पुरुष अक्सर मुस्लिम विरोधी नारे लगाते हैं। वहीं गाँव के कम से कम एक दर्जन हिंदुओं ने इस बात का खंडन किया। गांव के पुराने माहौल को याद करते हुए आएशा कहती हैं कि, पहले वे हमसे बहुत अच्छी तरह से बात करते थे, लेकिन अब वे नहीं करते। अगर कोई समस्या थी, या परिवार में कोई बीमार होता था तो सभी पड़ोसी आकर मदद करते थे, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान लेकिन अब ऐसा नहीं होता है।पास के बाजार में कपड़े की दुकान चलाने वाले 38 वर्षीय शर्फुद्दीन सैफी का नाम पिछले साल गौ हत्या के मामले में पुलिस में दर्ज करा दिया था। लेकिन जेल में 16 दिनों तक रहने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया क्योंकि पुलिस ने पाया कि उसका संदिग्ध कत्ल से कोई लेना-देना नहीं था।

वह अपने नए घर में ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं
इसी गांव के रहने वाले एक कारपेंटर जब्बार अली गांव छोड़कर दिल्ली के पास एक मुस्लिम बाहुल इलाके में रहने के लिए चले गए हैं, जहां पर उन्होंने अपना नया घर खरीदा है। जो पैसा उन्होंने साऊदी अरब में रहकर कमाया था। दिसंबर की घटना को याद करते हुए अली ने कहा कि, अगर हिंदू एक पुलिस चौकी के सामने, एक हिंदू इंस्पेक्टर की हत्या कर सकते हैं, जब उनके साथ सशस्त्र गार्ड थे, तो हम मुसलमान कौन हैं? इनका नयाबांस में अभी भी घर है, और कभी-कभार आते हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि वह अपने नए घर में ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं, जहां उनके अधिकतक पड़ोसी मुस्लिम हैं। मैं भयभीत हूं। अगर मोदी को एक और कार्यकाल मिलता है तो मुस्लिमों को इस जगह को खाली करना पड़ सकता है।
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