Chabahar Port: अमेरिका ने चाबहार पोर्ट पर भारत को दी राहत, कैसे मिलेगा मिडिल ईस्ट तक नया व्यापारिक रास्ता?
US sanctions Relief Chabahar Port: भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में अमेरिका ने ईरान के चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) पर लागू अपने प्रतिबंधों से 6 महीने की छूट (six-month exemption) दी है।
यह बंदरगाह भारत द्वारा पिछले एक दशक से विकसित किया जा रहा है और इसे मध्य एशिया,अफगानिस्तान और यूरोप तक व्यापार और संपर्क बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार माना जाता है। यह छूट ऐसे समय में आई है जब अमेरिका ने हाल ही में ईरान पर अपने "अधिकतम दबाव नीति" (maximum pressure policy) के तहत कई छूटों को समाप्त कर दिया था।

भारत को मिली बड़ी कूटनीतिक राहत
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने गुरुवार, 30 अक्टूबर को मीडिया से कहा, "मैं पुष्टि कर सकता हूं कि हमें चाबहार बंदरगाह पर लागू अमेरिकी प्रतिबंधों से 6 महीने की छूट मिली है। यह छूट बुधवार से प्रभावी हो गई है।"
सूत्रों के मुताबिक, पहले भारत की पहल पर अमेरिका ने लगभग एक महीने की अस्थायी छूट दी थी, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 6 महीने की औपचारिक छूट में बदल दिया गया।
चाबहार पोर्ट: भारत का रणनीतिक 'गेटवे टू सेंट्रल एशिया'
चाबहार बंदरगाह, ईरान के ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) के तट पर स्थित है और भारत के लिए भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह बंदरगाह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत, ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बीच वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग प्रदान करता है।
भारत ने इस पोर्ट के शहीद बेहेश्ती टर्मिनल (Shahid Beheshti Terminal) का विकास किया है, जिसकी संचालन ज़िम्मेदारी 2018 में इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने संभाली थी। भारत और ईरान के बीच पिछले साल 10 साल की लंबी अवधि का समझौता हुआ था, जिसके तहत भारत चाबहार पोर्ट पर संचालन जारी रखेगा।
इस समझौते के अंतर्गत -
- IPGL लगभग $120 मिलियन (₹1,000 करोड़) का निवेश करेगा,
- आधुनिक बंदरगाह उपकरण जैसे मोबाइल हार्बर क्रेन, रेल माउंटेड क्वे क्रेन, फोर्कलिफ्ट और पन्युमैटिक अनलोडर खरीदे जाएंगे,
- और भारत ने ईरान को $250 मिलियन का क्रेडिट लाइन भी ऑफर की है ताकि पोर्ट से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा सके।
अमेरिका का पुराना रुख और अब आया बदलाव
2018 में अमेरिकी विदेश विभाग ने चाबहार पोर्ट को लेकर प्रतिबंधों से छूट दी थी, ताकि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और व्यापारिक विकास में मदद मिल सके। लेकिन सितंबर 2025 में, ट्रंप प्रशासन ने यह छूट रद्द कर दी थी, यह कहते हुए कि यह कदम उनकी "maximum pressure policy" का हिस्सा है, जिसका मकसद ईरानी शासन को अलग-थलग करना है।
उस समय अमेरिकी बयान में कहा गया था कि, चाबहार पोर्ट के संचालन या इससे संबंधित गतिविधियों में शामिल लोग, ईरान फ्रीडम एंड काउंटर प्रोलिफरेशन एक्ट (IFCA) के तहत प्रतिबंधों के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, भारत के साथ हुए हालिया राजनयिक संवाद के बाद वाशिंगटन ने अपने फैसले पर पुनर्विचार किया और 6 महीने की नई छूट प्रदान की है।
2026 तक रेल नेटवर्क से जुड़ेगा चाबहार पोर्ट
भारत का लक्ष्य है कि 2026 के मध्य तक चाबहार पोर्ट को ईरान के रेल नेटवर्क से जोड़ा जाए, जिससे भारत-ईरान-अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बीच सप्लाई चेन और व्यापारिक ट्रांजिट को और गति मिलेगी। यह बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी अहम हिस्सा है, जो भारत को रूस और यूरोप से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह छूट?
चाबहार पोर्ट भारत के भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पाकिस्तान पर निर्भरता कम करता है और अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच सुनिश्चित करता है। अमेरिकी छूट मिलने से अब भारत को बंदरगाह पर उपकरणों की खरीद, निवेश और संचालन में किसी प्रकार की बाधा नहीं होगी।
अमेरिका की इस छह महीने की छूट को भारत की कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। यह कदम न केवल भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक हितों के लिए सकारात्मक है, बल्कि दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच संपर्क और सहयोग के नए अवसर भी खोलेगा। अगर आगे यह छूट स्थायी रूप से बढ़ाई जाती है, तो चाबहार पोर्ट भारत की रणनीतिक विदेश नीति की धुरी बन सकता है जो "एक्ट वेस्ट" नीति (Act West Policy) का केंद्रबिंदु भी है।
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