पति को खोजने की उर्वशी की लड़ाई: 'रोज़ थानों के चक्कर, सैकड़ों फ़ोन कॉल, धरना और 84 दिनों का इंतज़ार'

महीनों के इंतज़ार और दिनों तक , काफ़ी भटकने और प्रशासन से गुहार लगाने के बाद पति का शव मिला, लेकिन उर्वशी की लड़ाई अभी बाकी है.

प्रांजल मोरान
Dilip Sharma/BBC
प्रांजल मोरान

84 दिनों का इंतज़ार, सैकड़ों फ़ोन कॉल, रोज़ पुलिस थानों के चक्कर, फिर अपने तीन साल के बेटे के साथ गांव से क़रीब 500 किलोमीटर दूर गुवाहाटी जाकर धरना- तब जा कर अपने लापता पति का इंतज़ार कर रही उर्वशी की उम्मीद मिली.

अपने लापता पति की तलाश करने वाली असम की इस महिला ने कभी नहीं सोचा था कि उनका 1764 घंटों का इंतज़ार ऐसी मायूसी के साथ ख़त्म होगा.

उर्वशी के धरने के बाद पुलिस और आपदा प्रबंधन के जवानों ने उनके लापता पति की तलाश के लिए खनन क्षेत्र में व्यापक अभियान चलाया.

उर्वशी ने बताया, "मैंने उनसे प्यार किया था, फिर शादी की थी. उनके लापता होने की बात को ऐसे कैसे जाने देती. मैं अपने बेटे को क्या जवाब देती. मैंने ठान लिया था कि पति के शव को खोजने के लिए जितना भी संघर्ष करना पड़े, मैं करूंगी."

बीबीसी से बातचीत के दौरान 24 साल की उर्वशी मोरान बेबसी के उन पलों को याद करते हुए ये बातें कहती हैं.

प्रांजल मोरान
Dilip Sharma/BBC
प्रांजल मोरान

जनवरी 2023: इंतज़ार का महीना और आख़िरी कॉल

असम के तिनसुकिया ज़िले के लीडो शहर के पास एक अवैध कोयला खदान में मज़दूरी करने गए उर्वशी के पति प्रांजल मोरान इसी साल जनवरी महीने में अचानक लापता हो गए थे. उर्वशी का कहना है कि उन्होंने आख़िरी बार अपने पति के साथ 12 जनवरी को फ़ोन पर बात की थी.

वह कहती हैं, "उन्होंने किसी व्यक्ति के एक नए नंबर से सुबह क़रीब आठ बजे फ़ोन किया था. मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह हमारी अंतिम बातचीत होगी. वह अगले 48 घंटे में हमारे पास आने वाले थे."

28 साल के प्रांजल ने 14 जनवरी को माघ बिहू उत्सव के दौरान घर लौटने की बात कही थी. लेकिन उसके बाद अपने पति को खोजने के लिए उर्वशी को क़रीब तीन महीने तक लंबा संघर्ष करना पड़ा.

पुलिस ने सात अप्रैल यानी बीते शुक्रवार को लीडो की एक कोयला खदान से प्रांजल का शव बरामद किया. शव की हालत बहुत ही ख़राब थी.

जब कई दिनों तक प्रांजल की कोई ख़बर नहीं मिली तो अपने पति की तलाश में उर्वशी ने पुलिस थानों के अनगिनत चक्कर लगाए. इसके बाद वो तिनसुकिया ज़िला उपायुक्त कार्यालय के सामने धरने पर बैठीं. यहां तक कि उन्होंने अपने तीन साल के बेटे को साथ लेकर क़रीब 500 किलोमीटर दूर गुवाहाटी जाकर धरना दिया. अपने पति के शव को खोजने के लिए उन्होंने कई स्थानीय संगठनों से मदद ली.

प्रांजल मोरान
Dilip Sharma/BBC
प्रांजल मोरान

तिनसुकिया शहर से महज़ 18 किलोमीटर दूरी पर बसे हुकानी गांव में जब मैं प्रांजल के घर पहुंचा तो गांव के लोग उनके दाह संस्कार के बाद तीसरे दिन का नियम करवा रहे थे. घर के आंगन में एक मेज़ के ऊपर प्रांजल की तस्वीर रखी गई थी जिसके सामने एक दीपक जल रहा था.

उस तस्वीर के पास बैठी उर्वशी ने कहा, "12 जनवरी को जब उन्होंने फ़ोन पर घर आने की बात कही तो मैं उनका इंतज़ार कर रही थी. उन्होंने मुझसे बेटे का ध्यान रखने और उनकी चिंता न करने के लिए कहा था."

"उस फ़ोन कॉल के बाद उनका कोई पता नहीं चला. मैं कई दिनों तक इंतज़ार करती रही. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें ढूंढने कहां जाऊं. जिस नए नंबर से उनका आख़िरी बार फ़ोन आया था उस पर सैकड़ों बार फ़ोन किया लेकिन किसी ने रिसीव नहीं किया."

तिनसुकिया में एक लोहे की फ़ैक्ट्री में काम करने वाले प्रांजल ने अधिक मज़दूरी कमाने के चक्कर में बीते साल नवंबर से लीडो की एक अवैध कोयला खदान में काम करना शुरू किया था.

उर्वशी बताती हैं, "कोयला खदान में उन्हें कई बार एक दिन की मज़दूरी एक हज़ार रुपए से भी ज़्यादा मिल जाती थी. लेकिन वह बताते थे कि वहां बहुत जोख़िम है. उन्होंने बताया था कि कई मज़दूर उन कोयला खदानों में मारे गए हैं."

उर्वशी ने 27 जनवरी को लोकल न्यूज़ में लीडो कोयला खदान में दो श्रमिकों की मौत की ख़बर सुनी थी. उनका कहना था, "दो मज़दूरों की मौत की ख़बर के बाद मुझे बहुत चिंता होने लगी. मेरे पति के बड़े भाई और कुछ स्थानीय लोग उनकी तस्वीर लेकर उन्हें कोयला खदान में ढूंढने गए. लेकिन वहां काम करने वाले कुछ लोगों ने बताया कि प्रांजल 11 जनवरी को मज़दूरी लेने के बाद कहां गया वो नहीं जानते."

कई दिन बीत जाने के बाद कुछ लोगों ने उर्वशी को समझाया कि कोयला खनन वाले पहाड़ी क्षेत्र में किसी को तलाशना मुश्किल होता है. इसलिए अब वो इस बात को यहीं ख़त्म कर दें.

उर्वशी कहती हैं, "मैंने किसी की बात नहीं मानी और ठाना कि कुछ भी करना पड़े लेकिन मैं अपने पति को खोज कर ही रहूंगी."

उर्वशी के चचेरे भाई उमानंद मुदोई मोरान
Dilip Sharma/BBC
उर्वशी के चचेरे भाई उमानंद मुदोई मोरान

फ़रवरी 2023: जब पति से मिलने की उम्मीद टूटी

प्रांजल के बारे में पहली बार परिवार वालों को तब पता चला जब खनन मालिक की तरफ़ से दो फ़रवरी को हिरेन गोगोई नामक एक व्यक्ति उनके घर पहुंचा.

उर्वशी के चचेरे भाई उमानंद मुदोई मोरान बताते हैं, "प्रांजल के बड़े भाई रुनाल तथा गांव के कुछ लोग जब कोयला खदान में प्रांजल को तलाशने गए थे तो उस खनन इलाक़े में यह ख़बर फैल गई. उसके दूसरे दिन दो फ़रवरी को हिरेन गोगोई नामक एक व्यक्ति उर्वशी के घर आया. उसने कहा कि लीडो की कोयला खदानों में मज़दूरों के साथ ऐसी दुर्घटनाएं होती रहती हैं. प्रांजल स्थानीय युवक था इसलिए उनके खदान मालिक ने पाँच लाख रुपए परिवार को देने की बात कही है."

उस रोज़ (दो फ़रवरी) उर्वशी की पति से मिलने की उम्मीद टूट गई थी.

वह कहती हैं, "जब उस व्यक्ति ने मुआवज़ा देने की बात कही तब मैं निश्चित हो गई थी कि मेरे पति अब ज़िंदा नहीं हैं. अब मेरे लिए मृत पति का शव हासिल करना बेहद आवश्यक था. गांव के लोग उस व्यक्ति के साथ कोयला खदान में शव तलाशने गए थे. लेकिन वह खनन इलाक़े में पहुंचने से पहले ही फ़रार हो गया."

तिनसुकिया ज़िले के लीडो-मार्गेरिटा में तिलक और तिराप नामक दो मुख्य कोयला उत्पादक खदानें हैं. वैसे तो ये कोयला खदानें सरकार के स्वामित्व वाली कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनी नॉर्थ ईस्टर्न कोलफ़ील्ड्स (एनईसी) को लीज़ पर दी हुई हैं लेकिन इस क्षेत्र के आसपास व्यापक स्तर पर अवैध कोयला खनन की रिपोर्ट लगातार सामने आती रही है. जिस कोयला खदान में 84 दिन बाद प्रांजल का शव मिला था वह एनईसी का ही हिस्सा बताया जा रहा है.

उर्वशी
Dilip Sharma/BBC
उर्वशी

थानों के चक्कर लगाए और धरने पर बैठी

उर्वशी पहली बार तीन फ़रवरी को लांगकाशी पुलिस चौकी में पति के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराने गई थी.

वह कहती हैं, "पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया और कहा कि जिस इलाक़े में घटना हुई है वहां के थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाएं."

वो आगे कहती हैं, "मैं अगले दिन फिर लीडो थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने गई. पुलिस ने हमारी लिखित शिकायत के दो दिन बाद मामला दर्ज किया. यह मामला अब स्थानीय मीडिया में आने लगा था. इस बीच असम मोरान सभा के नेतृत्व में कुछ स्थानीय संगठनों ने 17 फ़रवरी से कोयले से लदे ट्रकों की आवाजाही रोक दी और तीन दिन का आंदोलन किया."

उर्वशी तिनसुकिया ज़िला प्रशासन पर आरोप लगाती हुई कहती हैं, "ज़िला उपायुक्त के साथ एक बैठक के दौरान मुझे एक राशन कार्ड, अरुणोदय योजना के तहत मासिक 1230 रुपए और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर देने की बात कहकर मेरे आंदोलन को ख़त्म करने की कोशिश की गई थी."

हालांकि तिनसुकिया ज़िला प्रशासन इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए इसे पीड़िता को थोड़ी राहत पहुंचाने का प्रयास बताता है.

प्रांजल मोरान
Dilip Sharma/BBC
प्रांजल मोरान

पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने और ज़िला प्रशासन के अधिकारियों के साथ बैठक के बाद भी जब उर्वशी के पति का कोई पता नहीं चला तो उन्होंने गुवाहाटी जाकर धरना देने का फ़ैसला किया.

गांव से गुवाहाटी तक के सफ़र के बारे में वह बताती हैं, "मैं 12 मार्च को अपने बेटे के साथ ट्रेन के जनरल डिब्बे में बैठकर गुवाहाटी पहुंची थी. इस यात्रा के दौरान बेटे की तबीयत बिगड़ गई. वह लगातार उल्टी कर रहा था. लेकिन फिर भी मैं अपने भाई उमानंद और परिवार के कुछ लोगों के साथ गुवाहाटी में धरने पर बैठी थी."

"इससे पहले असम सरकार के मंत्री तथा स्थानीय विधायक संजय किशन मुख्यमंत्री राहत कोष से चार लाख रुपए का एक चेक देने हमारे घर आए थे. मैंने उनसे भी कहा कि मुझे मेरे पति का शव खोज कर दें."

अभिजीत गुरव
Dilip Sharma/BBC
अभिजीत गुरव

मार्च 2023: डीजीपी के साथ बैठक के बाद एनडीआरएफ़ ने चलाया अभियान

उर्वशी ने मार्च महीने में कई बार गुवाहाटी के चक्कर लगाए. उन्होंने असम पुलिस के महानिदेशक से मुलाक़ात करने का प्रयास किया. उमानंद की मानें तो पति को खोजने की उर्वशी की दृढ़ स्थिति और लगातार संघर्ष के कारण प्रशासन को बाध्य होकर प्रांजल की खोज शुरू करनी पड़ी.

दरअसल दो अप्रैल को असम के डीजीपी जीपी सिंह के साथ उर्वशी की मुलाक़ात के बाद शव को खोजने के अभियान में तेज़ी आई.

डीजीपी ने अपने एक आईजीपी (एनईआर) जीतमल डोले को जांच का नेतृत्व करने का निर्देश देते हुए अगले सात दिन के भीतर शव खोज निकालने का आदेश दिया.

तिनसुकिया ज़िले के पुलिस अधीक्षक अभिजीत गुरव ने बीबीसी से कहा, "पुलिस शुरू से ही इस मामले में एक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रही थी. हमने एक गुप्त सूचना के आधार पर लीडो कोयला खदान वाले इलाक़े में एक अभियान चलाया. हमने उन दो लोगों को पकड़ा जिन्होंने प्रांजल के शव को कोयला खदान में छिपाकर रखा था. उसके बाद पुलिस ने एनडीआरएफ़ और एसडीआरएफ़ की टीम के साथ मिलकर शव को निकालने के लिए अभियान चलाया. इसके लिए कोल इंडिया के विशेषज्ञों और मशीनरी की मदद ली गई."

पति के शव को खोजने के लिए उर्वशी ने जिस तरह से संघर्ष किया उसकी चर्चा गांव में हर किसी के ज़ुबान पर सुनने को मिल जाती है.

प्रांजल के पिता देबेन मोरान भी अपनी बहू के इस प्रयास की सराहना करते हैं. वो कहते हैं, "स्थानीय संगठन, पुलिस सबके पास जाकर जब कोई समाधान नहीं निकला तो उर्वशी ने गुवाहाटी जाकर आंदोलन करने का साहस दिखाया. बेटे का शव मिला इसलिए हम आज रीति रिवाज़ के हिसाब से उसका अंतिम संस्कार कर पा रहे हैं."

पुलिस ने अब तक इस मामले में कुल 18 लोगों को गिरफ़्तार किया है.

पुलिस जांच में अभी तक कोयला खदान में हुई एक दुर्घटना माना जा रहा है. लेकिन उर्वशी अब भी अपना संघर्ष जारी रखना चाहती हैं ताकि वह अपने पति की मौत का सही कारण मालूम कर सकें.

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