यूपी में अगर गरमाया हिंदुत्व का मुद्दा, तो मायावती और ओवैसी की बढ़ेगी टेंशन, जानिए क्यों
अगर 2022 के यूपी चुनाव में ध्रुवीकरण हावी हुआ, तो मायावती और ओवैसी के सियासी सपनों पर पानी फिर सकता है।
नई दिल्ली, 15 नवंबर: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, सियासी दलों के बीच बयानों के तीर भी तेज होते जा रहे हैं। हाल ही में यूपी का सियासी पारा उस वक्त चढ़ गया, जब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपने एक बयान में 'जिन्ना' का जिक्र किया। इसके बाद कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की किताब और राशिद अल्वी के बयानों ने यूपी की राजनीति को एक बार फिर से हिंदुत्व के मुद्दे की तरफ मोड़ दिया। हिंदुत्व को लेकर जहां भाजपा विपक्ष पर हमलावर नजर आ रही है, वहीं इस मुद्दे ने बीएसपी की मुखिया मायावती और एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की टेंशन बढ़ा दी है।

अचानक क्यों तेज हुई हिदुत्व के मुद्दे पर बहस?
हाल ही में सरदार पटेल की जयंती पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने एक बयान में मोहम्मद अली जिन्ना की तुलना महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और पटेल से की। इसके बाद भाजपा ने पलटवार करने में देर नहीं की और जिन्ना को लेकर अखिलेश यादव पर निशाना साधा। जिन्ना को लेकर भाजपा और सपा के बीच अभी बयानों के तीर चल ही रहे थे कि कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की एक किताब को लेकर बवाल मच गया, जिसमें हिंदू संगठनों के लिए विवादित टिप्पणी थी। इसके बाद रही-सही कसर हिंदुओं को लेकर राशिद अल्वी के विवादित बयान ने पूरी कर दी। सियासी जानकारों की मानें तो इन तीनों मुद्दों ने भाजपा को यूपी चुनाव में 'बूस्टर डोज' दे दी है, जिसके बाद पार्टी के नेता विपक्ष की घेराबंदी में जुट गए हैं।

ध्रुवीकरण हुआ तो मुख्य मुकाबले में कौन-कौन होगा?
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा बाकी दलों में सबसे मुखर और आगे है। ऐसे में अगर यूपी चुनाव के बीच हिंदुत्व का मुद्दा उभरा तो ध्रुवीकरण की पिच पर मुख्य खिलाड़ी के तौर पर भाजपा और सपा ही आमने-सामने होंगे। अखिलेश यादव जहां यूपी में सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर चलते हुए अपना खेमा मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं भाजपा भी हिंदुत्व को लेकर खुलकर मैदान में उतर आई है। कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर तो है, लेकिन उनके अपने ही नेता इस राह में कांटे बिछा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ी टेंशन मायावती और असदुद्दीन ओवैसी के लिए है, क्योंकि अगर 2022 के चुनाव में ध्रुवीकरण हावी हुआ, तो इन दोनों ही नेताओं के सियासी सपनों पर पानी फिर सकता है।

मायावती और ओवैसी के लिए क्यों है टेंशन की बात?
हाल ही में आए चुनावी सर्वे के नतीजों को देखें तो भाजपा के बाद समाजवादी पार्टी यूपी में दूसरे सबसे बड़े दल के तौर पर उभर रही है। ध्रुवीकरण की स्थिति में माना जा रहा है कि यूपी की 21 फीसदी मुस्लिम आबादी, भाजपा के मुकाबले में उस दल की और अपना रूझान दिखा सकती है, जो भगवा पार्टी को हराने की स्थिति में हो। अभी तक के सर्वे के नतीजों पर नजर डालें तो 403 सीटों वाली यूपी विधानसभा में बीएसपी 20 सीटों के आस-पास ही नजर आ रही है। वहीं, पूरे दम-खम के साथ यूपी चुनाव की तैयारियों में जुटे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को भी सियासी जानकार मुख्य मुकाबले में नहीं गिन रहे हैं। संकेत साफ हैं कि हिंदुत्व का मुद्दा उभरने पर सबसे ज्यादा घाटे में यही दो दल रह सकते हैं।

2017 में मायावती और ओवैसी को कितनी-कितनी सीटें मिलीं?
बात अगर पिछले विधानसभा चुनाव की करें तो बहुजन समाज पार्टी ने सभी 403 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 2017 के यूपी चुनाव में बीएसपी को केवल 19 सीटों पर जीत मिली और पार्टी तीसरे स्थान पर खिसक गई। इस चुनाव में बीएसपी को मिलने वाला वोट शेयर 22.23 फीसदी था। वहीं असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम यूपी की 38 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। 2017 के यूपी चुनाव में एआईएमआईएम के हिस्से में महज 0.24 फीसदी वोट शेयर गया।
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