ओडिशा की नायाब पहल- रेशम के कीड़ों को मारे बिना तैयार किया जा रहा सिल्‍क उत्पादन, नाम दिया गया 'करुणा सिल्क'

ओडिशा ने ऐसी नायाब पहल की है जिसने दिल्‍ली के प्रगति में आयोजित भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले (आईआईटीएफ) प्रगमें आगंतुकों का ध्यान आकर्षित किया है। ये पहल ओडिशा सरकार की है, जिसके अंतर्गत कारीगर सिल्‍क का कीड़ा मारे हुए ही सिल्‍क के प्रोडक्‍ट तैयार कर रहे हैं।

disha without killing silkworms

हथकरघा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ओडिशा सरकार की इस नायाब पहल के बारे में बात करते हुए कहा कि राज्‍य ने एक नई विधि अपनाई है जहां पारंपरिक 'पट्टा' साड़ियां बनाने के लिए रेशम के कीड़ों को मारे बिना रेशम निकाला जाता है। इस नए रेशम का नाम 'करुणा सिल्क' रखा गया है क्योंकि इस प्रक्रिया में रेशम के कीड़ों को मारने के बजाय करुणा बरते जाना शामिल है।

हथकरघा विभाग निर्देशक ने दावा किया कि 'करुणा सिल्क' परंपरा के साथ प्रौद्योगिकी के साथ-साथ करुणा को बढ़ावा देने के साथ, ओडिशा टिकाऊ फैशन में एक नया मानदंड स्थापित कर रहा है। उन्‍होंने कहा कि रेशम के कीड़ों को बचाने के लिए हमारी ये पहल है।

राज्य सरकार के मार्गदर्शन में दिल्‍ली में आयोजित ट्रेड फेयर में खुर्दा जिले के राउतपाड़ा के कुशल बुनकर आईआईटीएफ में अपनी कलात्मकता का लाइव प्रदर्शन कर रहे हैं। ये वो कारीगर है, जो यहां पुरी में पीढ़ियों से भगवान जगन्नाथ के लिए पवित्र 'खंडुआ पत्ता' बनाते हैं, और अब 'करुणा सिल्क' से इसकी बुनाई कर रहे हैं।

प्रधान सचिव सूचना संजय कुमार सिंह ने कहा क्रूरता मुक्त 'करुणा सिल्क' ओडिशा का एक नया उद्यम, इस साल ओडिशा मंडप में यूएसपी बन गया है। उन्‍होंने बताय ट्रेड फेयर में इस काल को जानने में यहां वाले विटिटर बहुत पसंद कर रहे हैं।

गौरतलब है कि ओडिशा में शहतूत, तसर और एरी नामक तीन प्रकार के रेशम उगाए जाते हैं। इनमें से एरी रेशमकीटों को 'करुणा सिल्क' के ब्रांड नाम से इस नई और दयालु पद्धति से पाला जाता है।

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