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जी-20 बैठकों से भारत की उम्मीदों पर यूक्रेन युद्ध का साया

मोदी वैश्विक नेताओं के साथ
Reuters
मोदी वैश्विक नेताओं के साथ

भारत पिछले कुछ सालों से खुद को 'ग्लोबल साउथ' यानी विकासशील देशों की उभरती हुई आवाज़ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.

इस दिशा में भारत को जी-20 सम्मेलन की अध्यक्षता करने से बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था.

दुनिया के 19 सबसे अमीर देश और यूरोपीय संघ की वैश्विक आर्थिक उत्पादन में हिस्सेदारी 85 फीसद है जबकि इन देशों में दुनिया की लगभग 66 फीसद आबादी रहती है.

इनमें से कई देशों के विदेश मंत्री भारत की राजधानी नई दिल्ली में एक दूसरे से मुलाक़ात कर रहे हैं. आज भारतीय विदेश मंत्री ने ब्रिटेन समेत कई जी-20 देशों के कई मंत्रियों से मुलाक़ात की है.

यूक्रेन युद्ध का साया

लेकिन इन मुलाक़ातों में भारत को जिस तरह के समझौते होने की उम्मीद है, उन पर यूक्रेन युद्ध का साया साफ़ दिख रहा है.

पिछले साल इंडोनेशिया के बाली में जी-20 देशों के नेताओं की मुलाक़ात के दौरान ही रूस ने यूक्रेन के मुख्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ मिसाइल हमले किए थे.

इसके बाद जारी किए गए साझा बयान में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया था कि भारत, रूस और चीन इस आक्रमण की खुलकर स्पष्ट शब्दों में निंदा करने पर सहमत नहीं थे.

इस मामले में अब तक कुछ भी नहीं बदला है. युद्ध अभी भी जारी है. और शांति वार्ता शुरू होने के संकेत अब भी नहीं मिल रहे हैं. दुनिया अभी भी इस मुद्दे पर बंटी हुई है.

और कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अभी भी इस युद्ध की चपेट में हैं.

यूक्रेन युद्ध
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यूक्रेन युद्ध

चुनौतियों भरी वार्ताएं

इस पृष्ठभूमि में देखें तो ये चौंकाने वाला नहीं था कि जी-20 देशों के वित्त मंत्री पिछले हफ़्ते बंगलुरु में मिलने के बाद एक साझा बयान जारी नहीं कर सके.

रूस और चीन ने इस साझा बयान के उन हिस्सों पर आपत्ति जताई जिनमें रूसी आक्रमण की कड़े शब्दों में निंदा की गयी थी.

आख़िर में भारत को बैठक के अध्यक्ष होने के नाते अध्यक्षीय सारांश जारी करना पड़ा जिसमें उसने यूक्रेन के मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच मतभेद सामने आने की बात दर्ज की.

इस बुधवार और गुरुवार को होने जा रही विदेश मंत्री स्तर की वार्ताओं को भी इन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

विल्सन सेंटर थिंक टैंक के उप-निदेशक माइकल कुगेलमन कहते हैं, "भारत जी-20 सम्मेलन की अध्यक्षता को बेहद गंभीरता से ले रहा है. ऐसे में यह वह सारे प्रयास कर रहा है जिनके ज़रिए इस बैठक को सफल बनाया जा सके. लेकिन यूक्रेन का मुद्दा इन तमाम प्रयासों पर हावी रहेगा."

भारत उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है जो विकासशील देशों के लिए ज़्यादा तात्कालिक और अहम हैं.

भारत ने एजेंडे में जलवायु परिवर्तन, विकासशील देशों पर बढ़ते कर्ज, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, बढ़ती महंगाई और खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा को शामिल किया है.

कई अर्थव्यवस्थाएं अभी भी महामारी और युद्ध की वजह से बढ़ी महंगाई से निपटने के लिए संघर्ष कर रही हैं.

पुतिन, मोदी
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पुतिन, मोदी

पीएम मोदी को चलाना होगा जादू

विशेषज्ञ मानते हैं कि दिल्ली को इतनी शानदार कूटनीतिक रणनीति को इस्तेमाल में लाना होगा कि जी-20 देशों का समूह यूक्रेन युद्ध से आगे देख सके.

लेकिन उन मुद्दों पर समझौते होना संभव है जिन पर मतभेद ज़्यादा नहीं है.

इस लिहाज़ से भारत इस हफ़्ते होने वाली वार्ताओं के ज़रिए सितंबर में होने जा रही शीर्ष नेताओं की बैठक के लिए माहौल तैयार करने की दिशा में काम शुरू करेगा.

पूर्व भारतीय राजनयिक जितेंद्र नाथ मिश्र कहते हैं, "भारत एक ऐसा बयान तैयार कराने की कोशिश करेगा जो किसी को पूरी तरह संतुष्ट न करे लेकिन सभी को स्वीकार हो. लेकिन ऐसा करना आसान नहीं होगा. क्योंकि इस युद्ध के दोनों ओर खड़े देशों के समूह का रुख पिछले कुछ महीनों में पहले से सख़्त ही हुआ है."

इस मामले में भारत के रुख की भी आलोचना की गयी है. भारत ने सीधे तौर पर रूस की निंदा करने से परहेज़ किया है. भारत और रूस के संबंध काफ़ी पुराने हैं. और यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने आलोचनाओं के बीच रूसी तेल खरीदना जारी रखा है.

शुरुआत में पश्चिमी देशों को भारत की गुट-निरपेक्ष नीति पसंद नहीं आई थी. लेकिन अब ऐसा लगता है कि इसे लेकर एक तरह की समझ बनती दिख रही है.

भारत ने सीधे तौर पर भले ही रूस की निंदा न की हो लेकिन यूक्रेन पर दिए बयानों में भारत ने यूएन चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून, और राज्यों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही है.

पीएम नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन के दौरान जो बयान दिया था, उसे रूस की परोक्ष निंदा के रूप में देखा गया था.

पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी में कहा था - 'ये युद्ध करने का दौर नहीं है.'

पुतिन
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पुतिन

रूस पर भारत के रुख में परिवर्तन?

कुगेलमन मानते हैं कि इस बात की संभावनाएं कम हैं कि भारत जी-20 बैठकों के दौरान दबाव में आकर रूस को लेकर अपने रुख में सख़्ती लाएगा.

वह कहते हैं कि चीन और भारत के आपसी रिश्तों में बर्फ़ जमने की वजह सीमा विवाद है. वहीं, अमेरिका और चीन के बीच स्पाई बैलून विवाद के चलते नये स्तर का तनाव देखने को मिल रहा है. और रूस और पश्चिमी देशों के बीच संबंध पहले जितने ही ख़राब हैं.

ऐसे में जब दिल्ली में विरोधी पक्षों के शीर्ष राजनयिक मिलेंगे तो माहौल तनावपूर्ण रहने वाला है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि पीएम मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर को अपने राजनयिक कौशल और निजी रिश्तों के दम पर इस सम्मेलन के उद्देश्यों को समूह देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता से बचाना होगा.

कुगेलमन कहते हैं, "भारत प्रतिद्वंद्वियों के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखने की क्षमता पर गर्व करता. लेकिन जी-20 देशों के बीच इस समय जिस स्तर की कड़वाहट और भू-राजनीतिक तनाव है, उस लिहाज़ से भारत को काफ़ी मेहनत करनी होगी. लेकिन भारत ने पहले भी दिखाया है कि वह एक साथ कई भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के साथ तालमेल बिठाने में सक्षम है."

मोदी, जयशंकर
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मोदी, जयशंकर

पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ये बताने पर काफ़ी निवेश कर रही है कि जी-20 सम्मेलन लोकतंत्र को जन्म देने वाले देश में हो रहा है.

वह ये दिखाने की कोशिश करेंगे कि वह दुनिया में भारत की स्थिति को मजबूत करने में सक्षम हुए हैं, विशेष रूप से तब जब अगले साल भारत में आम चुनाव होने जा रहे हैं.

मिश्र कहते हैं, "भारत सरकार अपनी पूरी कोशिश कर रही है कि जी-20 देशों की बैठकें पूरे देश में हों ताकि लोगों को जी-20 सम्मेलन के बारे में पता चल सके. ये सारे प्रयास अच्छे हैं. लेकिन इन प्रयासों से भारत की मूल समस्या हल नहीं हो जाती जो अपनी महत्वाकांक्षाओं को युद्ध के असर से बचाना है."

कुगेलमन के मुताबिक़, भारत खुद को विकसित और विकासशील देशों के बीच की कड़ी के रूप में देखता है और जी-20 सम्मेलन की अध्यक्षता के ज़रिए एक मिडिल पावर की भूमिका निभाना चाहता है.

वह कहते हैं, "अब हमारे पास एक ऐसा नेता है जो भारत को दुनिया के मानचित्र पर वैश्विक नेता के रूप में स्थापित कर सकता है. और वे जी-20 को इससे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं."

लेकिन वह कहते हैं कि भारत के सामने एक बड़ी और स्पष्ट चुनौती है कि वह कैसे ज्वलनशील मसलों को उन मुद्दों से दूर कैसे रखे जिन पर समझौते होना संभव है.

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