DUSU के छात्र चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ का सच

DUSU छात्र संघ चुनाव
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दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ का मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है.

छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सह-सचिव के पद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने जीत दर्ज की है. जबकि सचिव पद पर कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) ने कब्ज़ा किया है.

लेकिन एनयूएसआई समेत लेफ्ट और आप की छात्र इकाईयों ने ईवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाया है.

इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग की एक प्रेस रिलीज़ ट्वीट कर आरोप लगाया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय वाले कैसे किसी प्राइवेट पार्टी से ईवीएम मशीन खरीद सकते हैं? क्या चुनाव आयोग की अनुमति के बिना ईवीएम रखना अपराध नहीं है?

चुनाव आयोग के इस प्रेस रिलीज़ के मुताबिक मशीने किसी प्राइवेट कंपनी से खरीदी गई हो सकती हैं.

चुनाव आयोग के बयान के बाद से दिल्ली विश्वविद्यालय में इस्तेमाल की गई ईवीएम पर राजनीति गरमा गई है.

https://twitter.com/ArvindKejriwal/status/1040483057608929281

दिल्ली विश्वविद्यालय का पक्ष

आख़िर दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में इस्तेमाल की गई ईवीएम कहां से आई?

इस पर बीबीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनावों की रिटर्निंग ऑफिसर पिंकी शर्मा से बात की.

उन्होंने साफ किया कि ईवीएम मशीने किसी प्राइवेट कंपनी से नहीं बल्कि सरकारी संस्था ईसीआईएल से ली गई थीं.

ईसीआईएल यानी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड.

ये भारत सरकार का ही उद्यम है, जो परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत आता है. ईसीआईएल की वेबसाइट के मुताबिक वो भारतीय चुनाव आयोग के लिए भी ईवीएम बनाती है.

पिंकी शर्मी ने कहा, "सभी ईवीएम ईसीआईएल के कंट्रोल में ही होती है. ईवीएम लगाना, उसका रख-रखाव और रिपेयर, सब काम ईसीआईएल के कर्मचारी ही आकर करते हैं."

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ईसीआईएल का पक्ष

बीबीसी ने इस बारे में ईसीआईएल के एडिशनल जनरल मैनेजर राजीव माथुर से बात की.

उन्होंने इस बात को स्वीकारा कि दस साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय ने ये ईवीएम मशीने उनसे खरीदी थीं.

लेकिन क्या दस साल तक ईवीएम सही सलामत काम कर सकती हैं?

इस सवाल के जवाब पर राजीव माथुर ने बीबीसी को बताया कि दस साल तक ईवीएम मशीन सही सलामत रहती हैं और रख-रखाव ठीक हो तो कोई परेशानी नहीं आती है.

डीयू प्रशासन का दावा है कि ये ईवीएम चुनाव आयोग के ईवीएम की तरह ही काम करती हैं और डीयू के हर छात्र चुनाव में यही ईवीएम लगाई जाती है.

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ईवीएम में छेड़छाड़ के दावे का सच?

एनएसयूआई ने चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाया है. उसका आरोप है कि एक ईवीएम पर 08 उम्मीदवारों के नाम थे और एक 9वां नोटा था, लेकिन 10वें नबंर पर 40 वोट पड़े. जबकि कोई 10वां उम्मीदवार है ही नहीं.

हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने राजधानी कॉलेज में हुई ईवीएम की गड़बड़ी को स्वीकार किया है. हालांकि उसने इसे एक तकनीकी खराबी बताया.

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर पिंकी शर्मा ने कहा, "उस ईवीएम में गलती से 09 के बजाए 10 बटन थे. राजधानी कॉलेज प्रशासन को इस बारे में हमें तुरंत जानकारी देनी चाहिए थी, ताकि हम चुनाव शुरू होने से पहले ही उसे बदल देते.

"लेकिन कॉलेज ने इस पर ध्यान नहीं दिया. बाद में जब इस बात को लेकर विवाद हुआ तो सभी दलों के उम्मीदवारों ने सहमति जताई कि इस ईवीएम की वोटों की गिनती को मतगणना में शामिल ना किया जाए. सभी पार्टी के उम्मीदवारों ने हस्ताक्षर करके लिखित में दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन को दिया था, जिसके बाद उन वोटों को शामिल नहीं किया गया. ऐसे में चुनाव परिणामों में गड़बड़ी की बात ही नहीं आती."

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पिंकी शर्मा ने बीबीसी को ये भी बताया कि एक और ईवीएम में तकनीकी खराबी आ गई थी. "ईवीएम लगाते ही उसकी कंट्रोल यूनिट का डिसप्ले खराब हो गया था, लेकिन उसी वक़्त अधिकारियों ने हमारे पास रखी अतिरिक्त कंट्रोल यूनिट के डिसप्ले को उससे कनेक्ट कर दिया. वो समस्या वहीं खत्म हो गई थी."

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र चुनावों में 725 बैलेट यूनिट लगाई गई थी, इसके साथ 285 कंट्रोल यूनिट लगी थी. 25 बैलेट यूनिट अतिरिक्त थीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर इसे खराब वाली से बदला जा सके.

अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने वाले एबीवीपी के अंकिव बसोया का कहना है कि हार से बौखलाया एनएसयूआई बेबुनियाद आरोप लगा रहा है. वहीं एनएसयूआई अपने आरोपों पर कायम है.

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दिल्ली विश्वविद्यालय में बुधवार यानी 12 सितंबर को चुनाव हुए थे. चुनाव के नतीजे अगले दिन यानी 13 सितंबर को जारी कर दिए गए.

इसमें अध्यक्ष समेत तीन पदों पर एबीवीपी के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है. अध्यक्ष पद पर अंकिव बसोया, उपाध्यक्ष पद पर शक्ति सिंह और संयुक्त सचिव पद पर ज्योति चौधरी ने जीत हासिल है.

जबकि सचिव का पद एनएसयूआई के खाते में गया. इसपर आकाश चौधरी ने जीत हासिल की.

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति इसलिए भी अहम मानी जाती है, क्योंकि कहा जाता है कि ये राष्ट्रीय राजनीति में घुसने का आसान रास्ता है.


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