अमृतसर रेल हादसा: अपने बच्चों के शवों का इंतजार कर रही माएं, दिल दहला देने वाली 5 कहानियां...

अमृतसर। पंजाब के अमृतसर में जोड़ा फाटक के पास हुए दिल दहलाने वाले रेल हादसे में अब तक 60 से ज्‍यादा की जान जा चुकी है। बड़ी संख्‍या में लोग घायल हुए हैं, जिनका अस्‍पताल में इलाज चल रहा है। इस हादसे में गए लोगों का सिविल हॉस्पिटल में पोस्टमार्टम किया जा रहा है। अमृतसर के सिविल अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ संदीप अग्रवाल ने बताया कि, पोस्टमार्टम के लिए दिन का समय सबसे ठीक होता है लेकिन ऐसी स्थिति को देखते हुए हमें रात के समय शवों का पोस्टमार्टम करना प़ड़ा। क्योंकि उन्हें बच्चों के शवों को उनके परिजनों को सौंपना था।

मैंने अपनी लाइफ में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा

मैंने अपनी लाइफ में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा

अस्पताल प्रशासन ने बताया कि, शनिवार सुबह तक केवल 24 की पहचान की गई थी क्योंकि अधिकतर शव ट्रेन की चपेट में आने के बाद बुरी तरह के क्षतविक्षत हो गए हैं। डॉ संदीप अग्रवाल कहते हैं कि, उन्होंने अपने कैरियर में इस तरह का दृश्य कभी नहीं देखा है। मैंने शुक्रवार को चार बच्चों को मृत घोषित कर दिया। वहीं कुछ बच्चों की जान बचाई। मैंने भगदड़ के शिकार हुए कई लोगों की जान बचाई लेकिन मैं उनकी जान नहीं बचा पाया जो ट्रेन की चपेट में आ गए थे। अधिकतर लोगों को पेट, चेहरे और सिर में चोट आई है। अग्रवाल बताते हैं कि, सामान्यता एक शव के पोस्टमार्टम में आधा से एक घंटे का समय लगता है। हम लोग रात से लगातार पोस्टमार्टम कर रहे हैं।

'मेरा भाई मर चुका था और मेरा भतीजा पटरियों पर पड़ा तड़फ रहा था'

'मेरा भाई मर चुका था और मेरा भतीजा पटरियों पर पड़ा तड़फ रहा था'

डॉ अग्रवाल ने बताया कि, पांच डॉक्टरों की टीम पोस्टमार्टम कर रही है। अस्पताल हादसे के शिकार हुए लोगों के परिजनों से भरा हुआ है। स्टेचर्स पर सफेद कपड़ों में छोटे-छोटे बच्चों के शव पड़े हुए हैं। खून की वजह से इन शवों की चादरें लाल हो गई हैं। इस हादसे में अपना भतीजा और भाई खो चुकीं सुमन देवी कहती हैं कि, हम पूरी जिंदगी दशहरा से डरेंगे। यह हमारे लिए काला त्यौहार हो गया है। एंबुलेंस का दरवाजा पकड़े खड़ी सुमन देवी अपने तीन साल के भतीजे सार्थक के शव को उतरे देख रो पड़ती हैं। सुमन देवी का छोटा 22 साल का भाई प्रदीप सार्थक को रावण दहन दिखाने ले गया था। उसकी भी इस हादसे में मौत हो गई है।

मैं सार्थक की मां को क्या कहूंगा ... वह कहाँ है

मैं सार्थक की मां को क्या कहूंगा ... वह कहाँ है

सुमन देवी बताती हैं कि, जब हम लोग घटनास्थल पर पहुंचे तो मेरा भाई मर चुका था। लेकिन सार्थक की सांसे चल रही थी। हमल उसे लेकर एक के बाद एक तीन अस्पताल गए लेकिन हम उसकी भी जान नहीं बचा पाए। सार्थक के पिता राम विलास ने रोते हुए कहते हैं कि, मैं सार्थक की मां को क्या कहूंगा ... वह कहाँ है ...बच्चों और उनकी खुशी के बिना त्यौहारों का क्या अर्थ है? हमारा बच्चा हमेशा के लिए चला गया है। दशहरे का त्यौहार के अब हमारे लिए है ही नहीं। मेरे भाई और बेटे दोनों चले गए हैं।

 वह अंतिम चीज थी जो मेरे बच्चे ने मुझसे मांगी थी

वह अंतिम चीज थी जो मेरे बच्चे ने मुझसे मांगी थी

परमजीत कौर जिनके 16 साल के बेटे सचिन की इस हादसे में मौत हो गई है। वह रोते हुए कहती हैं कि, मुझे पता भी नहीं था कि वह किसके साथ रावण दहन देखने आाया था। उसने मुझसे 10 रुपए मांगे थे, मैंने उसे देने से इंकार कर दिया। मुझे जिंदगी भर इस बात का पछतावा रहेगा कि, मैंने उसे 10 रुपए देने से मना कर दिया था। वह अंतिम चीज थी जो मेरे बच्चे ने मुझसे मांगी थी और मैंने वह भी नहीं दी। कौर कहती हैं कि, जब हम मौके पर पहुंचे, तो यह एक भयावह दृश्य था। शव पटरियों में पर बिखरे हुए थे। हम अपने बेटे को नहीं ढूंढ सके। बाद में हमें अस्पताल में उसका शरीर मिला।

यह ट्रेन रावण की तरह आई और मेरे बेटे को ले गई

यह ट्रेन रावण की तरह आई और मेरे बेटे को ले गई

शव कक्ष के बाहर सिर झुकाए बैठे, मेहतो और उनके बेटा अनिल कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे। उनका रोना वहां की हवा को गमगीन कर रहा था। वहीं दूसरी ओर मेहतो की पत्नी चुपचाप एक कोने में बैठी हुई थीं। इस दुर्घटना में उनके 10 वर्षीय छोटे बेटे सतीश की मौत हो गई थी। मेहतो दीवार पर अपने सिर को टक्कर मारते हुए कह रहे थे कि, यह ट्रेन रावण की तरह आई और मेरे बेटे को ले गई।

मैंने उसे कहा था कि मत जाओ

मैंने उसे कहा था कि मत जाओ

अपने 19 साल के बेटे नीरज की लाश का इंतजार कर रहे 54 साल के मुकेश कुमार उसकी बात करते हुए फफक पड़े। मुकेश ने कहा, मैंने उसे कहा था कि मत जाओ। मैंने उसे मना किया था कि रेलवे ट्रैक के नजदीक न जाओ। ये खतरनाक है। नीरज का मृत शरीर ड्रेसिंग रूम में रखा था जिसे अब शवों की बढ़ती तादाद के कारण मोर्चरी बना दिया गया है। मुकेश ने कहा,अमृतसर ने दूसरा जलियांवाला बाग जैसा हादसा देखा है। ये घाव अब कभी नहीं भरेगा।

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