TMC Crisis: ममता बनर्जी के सपोर्ट में अब भी कितने सांसद? कौन वफादार, कौन खामोश और कौन बदल सकता है खेल
TMC Political Crisis: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में बचा कौन है और जा कौन रहा है। विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी के भीतर जो असंतोष धीरे-धीरे पनप रहा था, अब वह खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। पहले विधायकों के बड़े समूह के अलग होने की खबरें आईं, फिर राज्यसभा से इस्तीफे हुए और अब लोकसभा सांसदों को लेकर ऐसा दावा सामने आया है जिसने ममता बनर्जी की राजनीतिक चुनौती को और बड़ा बना दिया है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब लड़ाई सिर्फ पार्टी छोड़ने वालों और पार्टी में बने रहने वालों के बीच नहीं है। टीएमसी के अंदर एक तीसरा ग्रुप भी दिखाई दे रहा है, जो अभी खुलकर किसी खेमे में नहीं गया है। यही ग्रुप आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। दावों और जवाबी दावों के बीच जो सबसे बड़ा सवाल हर किसी के जेहन में घूम रहा है, वो ये कि इस महा-संकट की घड़ी में 'दीदी' के साथ आखिरकार कितने सांसद वफादार बचे हैं? और वो कौन से चेहरे हैं जो इस पूरी सियासी जंग में 'साइलेंट मोड' पर चले गए हैं? आइए, अंदरखाने की इस पूरी इनसाइड स्टोरी को समझते हैं।

▶️TMC Split Explained: आखिर विवाद की शुरुआत कहां से हुई? क्या सच में टूट गई TMC?
टीएमसी में अंदरूनी असंतोष की चर्चा लंबे समय से हो रही थी, लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इसे सार्वजनिक कर दिया। पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी पहले ही दावा कर चुके हैं कि बड़ी संख्या में विधायक उनके साथ हैं। उनके अनुसार 80 में से 58 विधायक अलग लाइन पर चल रहे हैं और विधानसभा में नेतृत्व को लेकर भी विवाद पैदा हो चुका है।
इसके बाद लोकसभा में भी बगावत की चर्चा शुरू हुई। इस पूरे सियासी ड्रामे के केंद्र में हैं टीएमसी की सीनियर नेता और लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार। काकोली ने यह दावा करके सबको चौंका दिया है कि पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 उनके साथ आ चुके हैं। इन बागी सांसदों ने बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन को समर्थन देने का मन बना लिया है और इसके लिए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को बाकायदा चिट्ठी लिखकर संसद में एक अलग गुट (सिटिंग अरेंजमेंट) के रूप में बैठने की जगह भी मांगी है।
दिलचस्प बात यह है कि दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की तलवार से बचने के लिए काकोली गुट को कम से कम 19 सांसदों के समर्थन की जरूरत है और उनका दावा 20 का है। अगर यह दावा सच साबित होता है, तो यह गुट खुद को ही 'असली टीएमसी' घोषित करने की कानूनी लड़ाई भी जीत सकता है, ठीक वैसे ही जैसे महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ हुआ था।

▶️कौन हैं ममता बनर्जी के '7 वफादार' सांसद: जो संकट में भी चट्टान की तरह खड़े हैं
तमाम दावों और बगावत के बीच, ममता बनर्जी का एक छोटा लेकिन बेहद मजबूत धड़ा अभी भी उनके साथ पूरी ताकत से खड़ा है। काकोली घोष दस्तीदार ने खुद इन नामों को अपने पाले से अलग बताया है, जिसका सीधा मतलब है कि ये नेता 'दीदी' के सिपहसालार बने हुए हैं। इन 7 सांसदों में शामिल हैं:
🔹अभिषेक बनर्जी: ममता के भतीजे और पार्टी के युवा चेहरा, जिन पर बागियों ने तानाशाही का आरोप लगाया है।
🔹महुआ मोइत्रा: अपनी आक्रामक बयानबाजी के लिए मशहूर महुआ ने बागियों को ललकारते हुए कहा है कि अगर हिम्मत है तो इस्तीफा देकर बीजेपी के टिकट पर दोबारा चुनाव जीत कर दिखाएं।
🔹कल्याण बनर्जी: जिन्हें ममता बनर्जी ने आनन-फानन में लोकसभा में पार्टी का चीफ व्हिप (मुख्य सचेतक) नियुक्त कर दिया है ताकि सदन में अनुशासन बना रहे।
🔹सायनी घोष, कीर्ति आजाद, सौगत रॉय और सुदीप बंद्योपाध्याय: ये वो चेहरे हैं जो लगातार मीडिया के सामने आकर बागी गुट के दावों को झूठा और बीजेपी के 'डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट' की मनगढ़ंत कहानी बता रहे हैं।
▶️'साइलेंट मोड' का रहस्य: न दीदी के साथ, न बागियों के पास
टीएमसी के अंदर इस वक्त सिर्फ दो नहीं, बल्कि तीन धड़े साफ नजर आ रहे हैं। एक धड़ा काकोली के साथ है, दूसरा ममता के साथ। लेकिन एक तीसरा गुट भी है जिसे 'साइलेंट मोड' का गुट कहा जा रहा है। ये वो वीआईपी चेहरे हैं जो इस पूरी उठापटक पर बिल्कुल चुप हैं। न तो इन्होंने बगावत का झंडा उठाया है और न ही ममता बनर्जी के पक्ष में कोई बयान जारी किया है। इन शांत बैठे सांसदों में शामिल हैं,
- शत्रुघ्न सिन्हा और यूसुफ पठान: ग्लैमर और खेल जगत से राजनीति में आए ये दोनों दिग्गज नेता फिलहाल किसी भी पाले में खुलकर खड़े नहीं दिख रहे हैं।
- रचना बनर्जी, सजदा अहमद, प्रतिमा मोंडल, माला रॉय और मिताली बेग: इन महिला सांसदों ने भी पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है, जिससे इनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर सस्पेंस और गहरा गया है।
इन नेताओं की तरफ से अब तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है। न तो वे बागी गुट के कार्यक्रमों में प्रमुखता से दिखे हैं और न ही ममता गुट की तरफ से खुलकर बयानबाजी कर रहे हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों की नजर सबसे ज्यादा इसी समूह पर टिकी हुई है।

▶️कौन हैं वो सांसद, जो बागी हो गए?
इस बगावत की पटकथा दिल्ली में बहुत तेजी से लिखी गई। 9 जून के घटनाक्रम पर नजर डालें तो बागी सांसदों की हलचल साफ देखी जा सकती है। सबसे पहले 11 बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के बंगाल प्रभारी भूपेंद्र यादव के घर पर एक बेहद गोपनीय मीटिंग की, जहां पश्चिम बंगाल के शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। इसके तुरंत बाद, बागी खेमे की एक और बड़ी बैठक सांसद शताब्दी रॉय के दिल्ली स्थित आवास पर हुई, जिसमें जून मालिया, बापी हलदर, अबू ताहिर खान और असित कुमार समेत कई नेता पहुंचे।
हालांकि नाम उजागर होने की बात करें तो 20 में से अब तक 14 नाम ही खुलकर सामने आए हैं। इनमें काकोली घोष दस्तीदार के अलावा शताब्दी रॉय, बापी हलदर, अरूप चक्रवर्ती, जून मालिया, दीपक अधिकारी (देव), कालीपदा सरेन, जगदीश बसुनिया, असित मल, अबू ताहिर खान, खलीकुर रहमान, शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी और पार्थ भौमिक शामिल हैं। बाकी के 6 नामों को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है।
▶️राज्यसभा से भी झटका: सुखेंदु शेखर रे का इस्तीफा
मुश्किलें सिर्फ लोकसभा तक सीमित नहीं हैं। राज्यसभा में भी टीएमसी के कुल 13 सांसद हैं, लेकिन वहां भी पार्टी बिखर रही है। पार्टी के बेहद वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में चीफ व्हिप रहे सुखेंदु शेखर रे ने न सिर्फ अपने पद से बल्कि संसद की सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। इसके अलावा एक अन्य सांसद के इस्तीफे और 12 सांसदों की स्थिति स्पष्ट न होने की वजह से उच्च सदन में भी ममता बनर्जी की पकड़ ढीली होती दिख रही है।
▶️Anti Defection Law: क्या सांसदों पर दल-बदल कानून लागू होगा?
पूरे विवाद का कानूनी पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण है। लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं। यदि वास्तव में 20 सांसद किसी अलग समूह के साथ जाते हैं तो यह संख्या दो-तिहाई के करीब पहुंचती है। भारतीय राजनीति में दल-बदल विरोधी कानून के तहत दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन वाली स्थिति अलग तरह से देखी जाती है।
यही कारण है कि सांसदों की संख्या को लेकर इतना बड़ा राजनीतिक और कानूनी संघर्ष दिखाई दे रहा है। ममता समर्थक नेता दावा कर रहे हैं कि बागी गुट के पास दो-तिहाई समर्थन नहीं है। वहीं बागी गुट अपने पास पर्याप्त संख्या होने का दावा कर रहा है।
▶️दिल्ली से लेकर बंगाल तक सियासी घमासान: किसने क्या कहा?
कुणाल घोष (टीएमसी नेता): "जो लोग आज एनडीए के साथ जाने की बात कर रहे हैं, वो कल तक 'दीदी-दीदी' का नारा लगाते नहीं थकते थे। ममता बनर्जी के सिंबल पर चुनाव जीतकर ऐसी अवसरवादिता दिखाना राजनीति के गिरते स्तर को दिखाता है।"
अधीर रंजन चौधरी (कांग्रेस नेता): "यह सब एक नौटंकी है। जो लोग 4 मई तक बीजेपी के खिलाफ जंग लड़ रहे थे, हार मिलते ही देश की तरक्की का बहाना बनाकर एनडीए की गोद में बैठ रहे हैं।"
संबित पात्रा (बीजेपी प्रवक्ता): "यह टीएमसी का अंदरूनी मामला है, लेकिन जिस तरह से सांसदों के इस्तीफे और बयानों के दस्तावेज सामने आ रहे हैं, उससे साफ है कि ममता जी की पार्टी के भीतर अब कुछ भी ठीक नहीं बचा है।"
▶️ममता का जवाबी दांव
बगावत की चर्चाओं के बीच ममता बनर्जी ने भी तेजी से राजनीतिक संदेश दिया। उन्होंने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर कल्याण बनर्जी को पार्टी का चीफ व्हिप नियुक्त करने की जानकारी दी। यह कदम सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे यह संदेश देने की कोशिश भी माना जा रहा है कि पार्टी की आधिकारिक कमान अब भी ममता बनर्जी के हाथ में है।
दूसरी ओर काकोली घोष ने भी दावा किया है कि वह खुद को अब भी संसदीय नेतृत्व की भूमिका में मानती हैं। यही टकराव आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है।
अगर बागी गुट के दावे सही साबित होते हैं तो इसका असर सिर्फ टीएमसी तक सीमित नहीं रहेगा। इससे लोकसभा में एनडीए की संख्या बढ़ सकती है और महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सरकार को अतिरिक्त ताकत मिल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ सांसदों की संख्या की नहीं है। यह बंगाल में टीएमसी की भविष्य की पहचान, नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण की लड़ाई बन चुकी है।
▶️आगे क्या? दिल्ली की सत्ता पर इसका क्या असर होगा?
अगर टीएमसी के ये 20 सांसद आधिकारिक तौर पर एनडीए पाले में आ जाते हैं, तो देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा:
मजबूत होगी सरकार: लोकसभा में एनडीए के पास फिलहाल 293 सांसद हैं। इन 20 नए सांसदों के जुड़ने से यह आंकड़ा 313 तक पहुंच जाएगा, जिससे सरकार और ज्यादा स्थिर हो जाएगी।
अटके हुए बिल होंगे पास: एनडीए को सबसे बड़ा फायदा 'परिसीमन बिल' और 'महिला आरक्षण बिल' को पास कराने में मिलेगा। हाल ही में परिसीमन बिल जरूरी बहुमत (352 वोट) न मिलने के कारण 52 वोटों से गिर गया था। इन नए सांसदों के आने से बीजेपी दो-तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंच जाएगी।
बंगाल विधानसभा में पहले ही 80 में से 58 विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग गुट बना चुके हैं। अब सांसदों की इस बगावत ने साफ कर दिया है कि ममता बनर्जी के लिए अपनी पार्टी को पूरी तरह टूटने से बचा पाना अब किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।















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