सरकार के तीन साल, कई सवालों में घिरे केजरीवाल

पांच साल से अधिक पुरानी आम आदमी पार्टी एक मिशन के तौर पर शुरू हुई थी. लेकिन इसे अब किस तरह देखा जा रहा है, बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद का विश्लेषण.

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कितनी आम है दिल्ली पर राज करने वाली आम आदमी पार्टी?

जब 2013 में दिल्ली विधान सभा चुनाव में एक साल पुरानी आम आदमी पार्टी 70 सीटों में से 28 सीटें जीत कर दूसरे नंबर पर आयी तो उस समय देश में एक सियासी भूचाल सा आ गया.

पार्टी भ्रष्ट व्यवस्था, बदनाम नेताओं और घिसी-पिटी राजनीती से ऊबे हुए लोगों के लिए उम्मीद की एक किरण बन कर आयी.

आम लोगों को लगा सत्ता उन्हें मिली है, शक्ति उन्हें मिली है. 'आप' उनकी है.

पार्टी के संयोजक और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक मसीहा बन कर आये. लगा ये नेता बाक़ी नेताओं से अलग हैं.

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उस समय बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू के कुछ शब्दों पर ग़ौर करें:

"हमारा मुख्य प्रतिद्वंद्वी भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता है. बीजेपी और कांग्रेस इन दोनों को रेप्रेज़ेंट करती हैं"

"कौन कराता है दंगे? जनता नहीं कराती है दंगे, नेता कराते हैं दंगे"

"कांग्रेस और बीजेपी एक ही व्यवस्था के हैं. हम व्यवस्था के ख़िलाफ़ हैं. हम कहते हैं इस व्यवस्था के ज़रिए विकास हो ही नहीं सकता. आपको राजनीती बदलनी पड़ेगी. आपको पूरा सिस्टम बदलना पड़ेगा."

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तीन साल, कई सवाल

इन बयानों को उन्होंने हर मंच पर दोहराया. लोगों ने सोचा उन्हीं के बीच से पहली बार एक ईमानदार नेता उभर कर सामने आया है जो 'ज़ेड केटेगरी' की सुरक्षा के ख़िलाफ़ है और जिसने सत्ता से जुड़े तमाम ग़ैर ज़रूरी आराम ठुकरा दिए हैं.

जब वो मुख्यमंत्री होते हुए केंद्र के ख़िलाफ़ धरने पर बैठे तो साधारण लोगों ने इसे सराहा.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार 14 फ़रवरी को सत्ता में तीन साल पूरे कर लेगी.

लेकिन क्या 'आप' सही में आम लोगों की पार्टी साबित हो सकी है जैसा कि इसने वादा किया था?

क्या केजरीवाल दशकों पुरानी सियासी व्यवस्था को ध्वस्त करने के अपने मिशन में कामयाब हो सके हैं?

क्या बदलाव की लहर लेकर आने वाली आम आदमी पार्टी परिवर्तन लाने में सफल हुई है?

आम आदमी पार्टी
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इससे भी बढ़ कर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक मुहिम से एक सियासी पार्टी तक का इसका अब तक का सफ़र कैसा रहा?

पार्टी के नेता आशुतोष कहते हैं, ''जहाँ तक पार्टी सफ़र का सवाल है तो वो अच्छा रहा है. ये और बेहतर हो सकता था लेकिन फिर भी इस बात की संतुष्टि है कि जिन उद्देश्यों को पार्टी आगे लेकर चली थी उन उद्देश्यों पर पार्टी लगातार आगे बढ़ती जा रही है.''

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उनका कहना था कि जिस तरह से शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी के मामले में काम हुआ है, केंद्र सरकार के बाधाएं डालने के बावजूद वो काम "ऐतिहासिक" है.

वहीं राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद कहते हैं, ''आम आदमी पार्टी को लोगों ने व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखा था, लेकिन इस पार्टी ने आख़िरकार सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकारियत पर ही ध्यान दिया है."

वो आगे कहते हैं, "उसमें भी तानाशाहियत और एक व्यक्ति का केंद्र में होना, उस व्यक्ति के इर्द-गिर्द एक शक्तिशाली गुट, अगर आप आलोचना करते हैं तो पार्टी छोड़नी ही होगी. ये सब कुछ आम आदमी पार्टी में दिखलाई पड़ा."

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आम प्रतिक्रियाएं कुछ इस तरह की हैं: "कुछ खुशी और कुछ संतुष्टि मगर निराशा, चिंता और उत्पीड़न कहीं अधिक."

'मैनेजमेंट ऑफ़ होप में चूके'

अपने जन्म के पांच साल बाद लोगों की अपेक्षाएं पूरी हुईं?

इस सवाल के जवाब में पार्टी नेता आशुतोष कहते हैं, "एक बात तो स्पष्ट है कि जब आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो लोगों की आकांक्षाएं बहुत थीं. हम से उम्मीद बहुत थीं."

आशुतोष स्वीकार करते हैं कि वो उम्मीदों पर पूरी तरह से खरे नहीं उतरे, "मुझे लगता है कि ये जो मैनेजमेंट ऑफ़ होप है उसमे हम कहीं थोड़ा सा चूके हैं."

आम आदमी पार्टी के नेताओं के अनुसार पार्टी देश में सियासत को थोड़ा बहुत बदलने में कामयाब रही है. आशुतोष कहते हैं कि चुनाव से पहले पार्टियां अब ये देखती हैं कि उमीदवार भ्रष्ट है तो उसे टिकट न दो.

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उनके मुताबिक़, उनकी पार्टी भ्रष्टाचार को सियासी एजेंडे पर लाने में कामयाब रही है.

लेकिन अपूर्वानंद कहते हैं कि व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह करने वाली पार्टी आज दूसरी साधारण पार्टी की तरह बन गयी है, "बाहर (सत्ता के) विद्रोही रुख़ रखना आसान है सरकारियत एक ऐसी चीज़ है जो सारे विद्रोह को ठंडा करती है इसलिए जो पुराना उत्साह था वो ठंडा हो गया है. इसमें कोई शक़ नहीं."

केंद्र से तनातनी

पिछले कुछ सालों में पार्टी की आलोचना करने वालों की संख्या बढ़ी है.

आंदोलन जैसी दिखने वाली पार्टी के बारे में दिल्ली की 15 सालों तक मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित की राय है कि जनता के भरपूर साथ के बावजूद पार्टी ने जनता को मायूस किया है.

उन्होंने हाल में बीबीसी से कहा था की अरविंद केजरीवाल उपराज्यपाल और केंद्र से सही रिश्ते बनाने में नाकाम रहे.

उनका कहना था कि केंद्र से दिक़्क़तें उन्हें भी आती थीं लेकिन उन्होंने उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी से बेहतर संबंध रखे जिसके नतीजे में दिल्ली मेट्रो का प्रस्ताव पारित हो पाया.

लेकिन आशुतोष कहते हैं कि केंद्र ने उनसे सहयोग किया ही नहीं. वे कहते हैं, "2015 के विधान सभा चुनाव के बाद अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया प्रधानमंत्री से मिले और कहा कि हम आपका पूरा सहयोग चाहते हैं.''

''हमारी तरफ से कोई कमी नहीं रही. कई वरिष्ठ मंत्रियों से मिले और कहा कि हम दिल्ली के लिए काम करना चाहते हैं लेकिन कहीं न कहीं ये लग रहा था कि बीजेपी जिस तरह से दिल्ली में बुरी तरह से चुनाव हार गयी तो वो सदमा मोदी जी बर्दाश्त नहीं कर पाए और जिस तरह का समर्थन उन्हें देना चाहिए था उन्होंने नहीं दिया, कहीं न कहीं उन्होंने दिल्ली वालों से बदला निकालने की कोशिश की."

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गलतियों से सीखे और जीते

पार्टी ने शुरू के दिनों में कई ग़लतियां कीं. 49 दिन तक सत्ता में रहने के बाद अचानक सत्ता छोड़ने पर पार्टी के समर्थकों में मायूसी छा गयी.

केजरीवाल को भगौड़ा कहा गया. उन्होंने जनता से माफ़ी मांगते हुए इसे एक बड़ी भूल बताया था.

कहा जाता है कि दिल्ली सरकार छोड़ने के पीछे केजरीवाल की मंशा यह थी कि वो केंद्र में एक किंग मेकर की भूमिका निभाएंगे.

इसलिए पार्टी ने लोकसभा में 440 उम्मीदवार खड़े किए थे. शायद वो भी एक भूल थी क्यूंकि पार्टी को केवल चार सीटों पर विजय प्राप्त हुई और वो सभी पंजाब में.

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इसके बाद पार्टी ने एक बार फिर चिंतन किया. संगठन को मज़बूत किया और जगह-जगह 'डेल्ही डायलॉग' करके दिल्ली की जनता से जुड़ने का काम तेज़ी से शुरू कर दिया.

नतीजा ये हुआ कि 2015 में हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव में इसने 67 सीटें हासिल करके खुद को भी हैरान कर दिया.

लेकिन जब भी पार्टी मज़बूत नज़र आती है इसके अंदरूनी झगड़े सामने आते हैं.

पार्टी को स्थापित करने वाले दो बड़े व्यक्ति प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव अब पार्टी से अलग हैं.

पार्टी के कुछ नेताओं पर नक़ली डिग्री और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. हाल में राज्य सभा के उम्मीदवारों की लिस्ट में कुमार विश्वास जैसे बड़े नेता के बजाये एन.डी गुप्ता और सुशील कुमार गुप्ता जैसे लोगों को शामिल करने पर पार्टी की काफी आलोचना हुई.

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पार्टी के अंदरूनी उठापटक के बारे में पार्टी दावा करती है कि आपसी घमासान ही अंदरूनी लोकतंत्र की पहचान है.

आम आदमी पार्टी अब भी एक नयी पार्टी है. इससे ग़लतियां हुई हैं और आगे भी होंगी. अपूर्वानंद कहते हैं ये अभी एक मुकम्मल सियासी पार्टी नहीं बन पायी है. इसके पास राष्ट्रीय दृष्टि नहीं है. बड़ी पॉलिसी नहीं है.

वे कहते हैं, "वो अभी एक मुकम्मल पार्टी में परिवर्तित नहीं हो पायी है. उसे अपनी जड़ें फैलानी हैं. वो काम शुरू नहीं हुआ है. अगर वो दिल्ली तक सीमित रह जायेगी तो वो पार्टी नहीं बन पाएगी."

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