तीन तलाक़: जो मांगा वो मिला ही नहीं!

मुस्लिम महिलाएं
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"छह साल की मेरी शादी से मुझे तीन बच्चे हैं. लेकिन अब मैं अपने पति के साथ नहीं रहती"

ये कहते हुए 27 साल की रेशमा (बदला हुआ नाम) के चेहरे पर कोई भाव नहीं था. न दुख का, न तो बदले का, न तो आने वाले अंधेरे भविष्य की चिंता का.

उन्होंने पति को छोड़ा या पति ने उनको? इस सवाल पर वो साफ़ कहती हैं, "क्या फर्क पड़ता है इस बात से? इतना समझ लीजिए कि अब तक उन्होंने मुझे तलाक़ नहीं दिया है."

रेशमा उत्तर प्रदेश के बांदा शहर से दिल्ली आई है. सिर्फ ये बताने के लिए तलाक बिना दिए भी एक मुस्लिम महिला की ज़िंदगी बर्बाद की जा सकती है और वो उसकी जीती जागती मिसाल हैं.

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नए कानून में क्या प्रावधान?

रेशमा का सरकार से एक सवाल है. बिना तलाक़ बोले अगर पति छोड़ दे, उस सूरत में सरकार के पास नए कानून में क्या प्रावधान है.

केन्द्र सरकार एक बार में तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) 2017 संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में पेश करने जा रही है. लेकिन बिल के मौजूदा स्वरूप को लेकर कुछ मुस्लिम महिला संगठनों को एतराज़ है. रेशमा भी उस संगठन के साथ खड़ी है.

मुंबई की मुस्लिम महिला संगठन 'बेबाक़ कलेक्टिव' के मुताबिक आने वाला बिल, महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने की जगह और कमज़ोर बनाने वाला है.

'बेबाक़ कलेक्टिव' की तरफ से नए बिल की कमियां गिनाने के लिए वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह सामने आईं.

इंदिरा जय सिंह
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'तीन तलाक़ को गैरकानूनी करार देता है बिल'

इंदिरा जयसिंह ने चार पन्ने वाली बिल की कॉपी पढ़ते हुए कहा, "मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) नाम का नया बिल एक तरफ तो एक बार में तीन तलाक़ को गैरकानूनी करार देता है और दूसरी तरफ मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने की भी बात करता है. ये दोनों बातें एक साथ कैसे सही हो सकती है?"

केन्द्र सरकार पर बिल जल्दबाज़ी में लाने का आरोप लगाते हुए इंदिरा जयसिंह ने कहा कि कोर्ट में तीन तलाक के केस पर सुनवाई के दौरान उनकी दलील महिलाओं को समान हक़ और सम्मान दिलाने की थी. लेकिन जब सरकार तलाक देने वाले पति को ही जेल भेज देगी तो शादी का रिश्ता ही नहीं बचेगा. तो फिर कैसा हक और कैसा सम्मान?

बतौर इंदिरा जयसिंह, बिल में मौजूद प्रावधान के मुताबिक,

  • एक बार में तीन तलाक़ कहने वाले मर्द को तीन साल की जेल की सज़ा होगी.
  • इस कानून के तहत इस जुर्म को गैर-ज़मानती बनाया गया है.
  • बिल में तलाकशुदा पत्नी और आश्रित बच्चे के लिए गुजारा भत्ता तय करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को देने की बात कही गई है.
  • एक बार में तीन तलाक़ दिए जाने की सूरत में नाबालिग बच्चे का अधिकार मां को दिया जाए.
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लेकिन बिल में 'बेबाक़ कलेक्टिव' कई खामियां गिनाती हैं.

उनके मुताबिक, तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिला कोर्ट का दरवाजा इसलिए खटखटाती है ताकि वो पति के साथ रह सके और उसे आर्थिक मदद मिलती रहे. लेकिन पति को जेल भेजने से उसे दोनों ही अधिकार नहीं मिलेंगे.

  • विवाह एक सामाजिक अनुबंध है, तो फिर विवाह तोड़ने पर आपराधिक मामला क्यों बनाया जाए.
  • बिल में निकाह हलाला, बहुविवाह और दूसरे तरह के तलाक के बारे में कोई जिक्र नहीं है.
  • बिल इस पर भी चुप है कि पति अगर जेल चला जाएगा तो गुज़रा भत्ता सरकार देगी या तलाक देने वाला पति या फिर तलाक देने वाले पति का परिवार.
  • बिना तलाक बोले अगर पति छोड़ दे उस सूरत में सरकार के पास नए कानून में क्या प्रावधान है.
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सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को कहा था- असंवैधानिक

इस साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम मर्दों के एक बार में तीन तलाक़ कहने की प्रथा को असंवैधानिक क़रार दिया था. फिर चाहे वो ईमेल या टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए ही क्यों ना कहा गया हो.

लेकिन बिल के पक्ष में केन्द्र सरकार की अपनी दलील है. तीन तलाक पर प्रतिबंध संबंधित विधेयक पर केन्द्र सरकार ने संसद में जवाब देते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश के अलग-अलग इलाकों से लगभग 66 मामले रिपोर्ट किए गए हैं.

सरकार के मुताबिक, तीन तलाक का मुद्दा लिंग न्याय, लिंग समानता और महिला की प्रतिष्ठा, मानवीय धारणा से उठाए हुए मुद्दा हैं न कि विश्वास और धर्म से जुड़ा मुद्दा है.

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'कुरान आधारित मुस्लिम फेमिली कानून हो'

लेकिन एक दूसरी मुस्लिम महिला संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की बिल पर अलग राय है.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन अध्यक्ष जाकिया सोमन नए बिल का स्वागत करती हैं. पर साथ में वो कुछ और भी चाहती हैं.

उनके मुताबिक, "हमारी मांग है कि कुरान आधारित मुस्लिम फेमिली कानून होना चाहिए. हम सरकार के नए कानून का स्वागत करते हैं. लेकिन तीन तलाक के लिए ये जरूरी है कि पति और पत्नी दोनों को इसका हक हो, 90 दिन का वक्त दिया जाए. साथ ही हलाला और बहुविवाह पर भी कानून बने"

उनके मुताबिक "अगर एक से ज़्यादा विवाह करने की प्रथा को ग़ैर-क़ानूनी नहीं किया जाता तो मर्द तलाक़ दिए बग़ैर वही रास्ता अपनाने लगेंगे, या फिर तीन महीने की मियाद में तीन तलाक़ देने का रास्ता अख़्तियार करने लगेंगे."

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