ग़ालिब की हजारों ख्वाहिशों में एक ऐसी भी....

मशहूर शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान उर्फ़ मिर्ज़ा ग़ालिब के दिल में कलकत्ता (अब कोलकाता) के लिए ख़ास जगह थी. इस शहर से उनका बेहद पुराना और नजदीकी संबंध था.

ग़ालिब का जन्म भले ही आगरा में हुआ और वो दिल्ली में रहे हों लेकिन उनके दिल के किसी कोने में यह महानगर गहरा बसा था.

कोलकाता में एक सड़क का नाम भी उनके नाम पर है 'मिर्ज़ा ग़ालिब स्ट्रीट'.

मिर्ज़ा ग़ालिब की 221वीं जयंती के मौके पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उस सड़क पर ग़ालिब की तस्वीर के साथ उनकी शायरी को उकेरा गया है. इससे ये सड़क एक सजीव संग्रहालय में बदल गई है.

ग़ालिब के अनसुने और मज़ेदार क़िस्से

फरवरी, 1826 में इस महानगर में पहुंचे ग़ालिब उत्तर कलकत्ता के एक मकान में छह रुपए महीने किराए पर रहे थे.

हालांकि, अब वहां रहने वालों को इसकी जानकारी नहीं है.

ग़ालिब
PRABHAKAR M.
ग़ालिब

ग़ालिब की ख्वाहिश

लाल रंग के उस तीन मंजिला मकान में रहने वाली प्रीति धर बताती हैं, "मेरे पुरखों ने बहुत पहले ये मकान खरीदा था. यहां रहे मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है. लेकिन ये हमारा सौभाग्य है कि इस मकान में कभी इतने महान शायर रह चुके हैं."

दरअसल, मिर्ज़ा की हजारों ख्वाहिशों में एक कलकत्ते में रहना भी थी. लेकिन उनके सामने दिल्ली लौटने की मजबूरी थी.

'ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयां और...'

बावजूद इसके उनकी लेखनी में कलकत्ता के प्रति दर्द जब-तब झलकता रहा.

यही वजह थी कि अपने मिलने-जुलने वालों से बातचीत में इस महानगर का जिक्र छिड़ने पर ग़ालिब ने लिखा था 'कलकत्ते का जो जिक्र तूने किया हम नशीं/इक तीर मेरे सीने में मारा के हाय हाय'.

बंगाल को कमाल की जगह बताते हुए ग़ालिब ने कहा था कि बंगाली सौ साल पीछे भी जीते हैं और सौ साल आगे भी.

यहां अपने प्रवास के दौरान ग़ालिब कलकत्ता मदरसा कालेज में होने वाले मुशायरों में नियमित तौर पर मौजूद रहते थे.

'समय से आगे थे ग़ालिब'

हालांकि, बाद में भाषा के मुद्दे पर विवाद होने के बाद उन्होंने वहां जाना छोड़ दिया.

जाने-माने कवि श्रीजातो कहते हैं, "ग़ालिब अपने समय से बहुत आगे की चीज थे. अपनी बुद्धिमता की वजह से ही वो यहां साहित्यिक विवाद में फंसे थे."

कोई साल भर बाद कोलकाता से लौटने के बावजूद इस महानगर से उनका प्रेम रत्ती भर भी कम नहीं हुआ था. उनकी लेखनी में भी यह बात झलकती है.

दरअसल, ग़ालिब के यहां आने का मकसद लेखन नहीं बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी से अपनी पारिवारिक पेंशन को दोबारा शुरू कराना था.

पहले उनके परिवार को दस हजार रुपए सालाना पेंशन मिलती थी. लेकिन किसी वजह से सरकार ने ये पेंशन आधी कर दी थी.

लेकिन साल भर यहां रहने के बावजूद जब उनको इसमें कामयाबी नहीं मिली तो अगस्त, 1829 में उन्होंने भारी मन से उन्होंने कलकत्ता छोड़ दिया.

लेकिन मरते दम यह महानगर उनके सीने के किसी कोने में बसा रहा.

कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी (सीईएसी) ने पार्क स्ट्रीट इलाके स्थित मिर्ज़ा ग़ालिब स्ट्रीट में बिजली के वितरण बाक्सों पर गालिब की शेरो-शायरी उकेर कर इसे एक जीवंत संग्रहालय में बदल दिया है.

सीईएसी के एक प्रवक्ता कहते हैं, "यह कोलकाता के समृद्ध इतिहास और विरासत से स्थानीय लोगों और पर्यटकों को अवगत कराने और इस महानगर से जुड़ी रहीं जानी-मानी हस्तियों को श्रद्धांजलि देने का तरीका है.'

ध्यान रहे कि इससे पहले सत्यजित रे और सुभाष चंद्र बोस को भी इसी तरीके से याद किया जा चुका है.

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