पुतिन ने पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ ऐसे खोला मोर्चा, भारत का कितना फ़ायदा

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रूस ने उन देशों और कंपनियों को तेल बेचने से मना कर दिया है, जो पश्चिमी देशों के तेल के दाम नियंत्रित करने के फ़ैसले को मान रहे हैं.

जी-सात देशों, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ ने रूसी तेल का दाम 60 डॉलर प्रति बैरल निर्धारित किया था और ये दाम 5 दिसंबर से लागू हो गया.

इन देशों की कोशिश है कि एक तरफ़ जहाँ यूक्रेन के ख़िलाफ़ जारी रूसी लड़ाई की मशीनरी को उपलब्ध राजस्व में कटौती हो, तेल के दाम इतने भी न बढ़ जाएं जिससे कोविड से तबाह हुई अर्थव्यवस्थाओं की धीमी रिकवरी को चोट पहुँचे.

https://twitter.com/vonderleyen/status/1598734779750309888

रूस ने कहा कि दाम नियंत्रित करने के पश्चिमी देशों के क़दम का रूसी तेल पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

https://twitter.com/RussianEmbassy/status/1601538790837080064

रूस की तरफ़ से जारी किए गए आदेश में कहा गया है कि ये प्रतिबंध एक फ़रवरी से एक जुलाई तक पाँच महीने के लिए लागू रहेंगे. आदेश में ये भी कहा गया है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चाहें, तो इस प्रतिबंध में शामिल देशों को तेल सप्लाई करने के लिए विशेष अनुमति दे सकते हैं.

भारत ऐसे इशारे दे चुका है कि वो उन देशों में शामिल नहीं है, जो पश्चिमी देशों के नियंत्रित दामों को मानेंगे और कहा है कि वो वही करेगा जो उसके लोगों के हित में होगा.

https://twitter.com/ANI/status/1600434191002320896

यानी भारत और चीन को रूस की तेल की सप्लाई जारी रहेगी. 31 मार्च, 2022 को खत्म हुए साल में भारत में आयातित रूसी तल की मात्र कुल आयात का 0.2 प्रतिशत था. आज ये आँकड़ा 20 प्रतिशत से भी ज़्यादा हो गया है.

भारत की कुल तेल की ज़रूरत का 80 प्रतिशत से ज़्यादा आयात से पूरा होता है. 31 मार्च को ख़त्म हुए साल में भारत का कुल तेल आयात बिल 119 अरब डॉलर था.

एनर्जी डेटा ट्रैकर कंपनी वॉर्टेक्सा के मुताबिक़ नवंबर में लगातर दूसरे महीने रूस भारत का नंबर 1 तेल सप्लायर रहा. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का भाव 84 डॉलर प्रति बैरल है.

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Oil rig
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ऐसे समय में, जब बहुत हद तक ये साफ़ है कि कौन से देश रूस का तेल ख़रीद रहे हैं, और कौन नहीं, ऐसे में रूस ने ये प्रतिबंध की घोषणा क्यों की है?

सिंगापुर में एनर्जी मामलों की जानकार वंदना हरि के मुताबिक़ रूस की ये घोषणा अपनी इज़्ज़त बचाने की कोशिश जैसी ही है.

वंदना हरि के मुताबिक़ किसी भी देश को ये सही नहीं लगेगा कि कुछ देश मिलकर उसके देश में पैदा होने वाले तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम तय करें और ऐसा क़दम उस देश के प्रभुत्व के लिए बड़ा झटका है.

ऐसे में रूस के लिए बदला लेने के क़दम उठाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. वो ये दिखाना चाहता है कि वो भी कोई क़दम उठा रहा है.

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रूस और भारत
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भारत के लिए फ़ायदे का सौदा

वंदना हरि के मुताबिक़ रूस से डिस्काउंट में तेल ख़रीदने से हो सकता हो कि उसे लाने ले-जाने या इंश्योरेंस के दाम बढ़ गए होंगे लेकिन ये भारत के लिए फ़ायदे का सौदा साबित हुआ है और इससे भारत ने ढेर सारा पैसा बचाया है.

मीडिया रिपोर्टों में इंडस्ट्री सूत्रो के हवाले से दावा किया गया है कि भारत को रूस से डिस्काउंट पर तेल लेने पर 35,000 करोड़ रुपये तक का फ़ायदा हुआ.

जिस तरह से भारत और चीन ने रूस के सस्ते तेल का आयात बढ़ाया है, उस पर पश्चिमी देशों में सवाल उठते रहे हैं.

अमरीका की ट्रेज़री सेक्र्टरी जैनल येलेन ने अपनी भारत यात्रा में कहा था कि तेल के नियंत्रित दाम से भारत और चीन जैसे देशों के हाथ भी मज़बूत होंगे और वो रूस से आयातित तेल के दाम और सस्ते करने को लेकर दबाव डाल पाएँगे.

वंदना हरि इस दावे से अलग सोच रखती हैं.

वो कहती हैं, "मान लीजिए रूसी तेल के नियंत्रित दाम 60 डॉलर है और बाज़ार में यही तेल 90 डॉलर प्रति बैरल बिक रहा है और भारत रूस से कहता है कि आप हमें 60 डॉलर पर तेल दीजिए तो रूस कह सकता है कि वो ऐसा नहीं करेगा."

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रूबल और रुपये की व्यवस्था

वो चीन को ज़्यादा तेल बेच सकता है या फिर रूस की तरफ़ से कहा जा सकता है कि वो तेल बेचने के बजाए उसे स्टोर करेगा.

वो कहती हैं कि जब तक भारत और चीन साथ न आएँ और रूस से सस्ते दाम पर तेल बेचने के लिए दबाव न डालें, तब तक नियंत्रित दाम का क्या फ़ायदा, और रूस और भारत साथ आने से रहे.

वो कहती हैं कि तेल के दाम को नियंत्रित करने का फ़ैसला बकवास और अर्थहीन था.

वंदना हरि कहती हैं, "ये दिखाता है कि आपको तेल के बाज़ार की समझ नहीं है. ये एक स्टॉक बाज़ार जैसा है. क्या आप टेस्ला के शेयर के दाम को नियंत्रित कर सकते हैं?"

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यस सिक्योरिटीज़ में रिसर्च के वाइस प्रेसिडेंट हितेश जैन भी मानते हैं कि तेल के दाम को नियंत्रित करने का कोई फ़ायदा नहीं होगा, ख़ासकर ऐसे समय में, जब रूस जिस दाम पर तेल भारत को दे रहा है उसका दाम 60 डॉलर से ज़्यादा दूर नहीं है.

वो कहते हैं, "भारत और रूस पहले ही रूबल और रुपये की व्यवस्था पर काम कर रहे हैं ताकि उनके बीच व्यापार बढ़े."

हितेश जैन मानते हैं कि अमरीका ने रूसी तेल के दाम नियंत्रित करने के क़दम से संदेश ही दिया है कि प्रतिबंधों का असर नहीं हो रहा है.

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