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पंजाब यूनिवर्सिटी में ABVP को इस लड़की ने दी पटखनी

इस समय भारत के कई विश्वविद्यालयों में चुनावी माहौल बना हुआ है.

सभी छात्र अपनी-अपनी पार्टी को स्टूडेंट यूनियन के चुनावों में जिताने के लिए पूरी जी-जान लगाए हुए हैं.

लेकिन इस साल छात्र चुनावों से जुड़ी सबसे असाधारण ख़बर आई चंडीगढ़ से.

चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में हुए छात्रसंघ चुनाव में पहली बार किसी लड़की ने अध्यक्ष पद का चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया है.

पंजाब विश्वविद्यालय में मास्टर ऑफ़ साइंस कोर्स के दूसरे साल की छात्रा कनु प्रिया अब स्टूडेंट यूनियन की अध्यक्ष होंगी.

कनु प्रिया को राजनीति के अलावा फ़ोटोग्राफ़ी पसंद है. इसके ज़रिए उन्हें अपनी भावनाओं को ज़ाहिर करना अच्छा लगता है.

22 साल की कनु प्रिया पंजाब के तरनतारन ज़िले के पट्टी गाँव से हैं. वो साल 2015 में स्टूडेंट फ़ॉर सोसायटी (एसएफ़एस) नाम के एक छात्र संगठन में शामिल हुई थीं.

कनु प्रिया अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवार आशीष राणा से 719 वोटों के अंतर से जीती हैं. अध्यक्ष पद के लिए चुनाव में खड़े दोनों उम्मीदवारों के बीच वोटों का ये फ़ासला, उनकी जीत के जितना ही ऐतिहासिक माना जा रहा है.

बीबीसी से बात करते हुए कनु प्रिया ने बताया कि पंजाब विश्वविद्यालय का माहौल कुछ इस तरह का रहा है कि यहाँ लड़कियों को अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवारी नहीं दी जाती थी.

कनु प्रिया के मुताबिक़, "पंजाब विश्वविद्यालय में महिलाओं को चुनाव से हमेशा पीछे रखा गया है. ये पहली बार हुआ है जब इस तरह का मिथक टूटा है."

एसएफ़एस ही क्यों?

पंजाब विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव में चार पदों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव) के लिए 6 सितंबर को चुनाव हुआ था.

छात्रसंघ चुनाव में एसएफ़एस, एबीवीपी, एनएसयूआई, एसओआई के अलावा पीयूएसयू, एसएफ़पीयू जैसे कई संगठन चुनाव में खड़े हुए थे.

कनु प्रिया ने बताया कि किसी भी पार्टी ने एक भी लड़की को अध्यक्ष पद के लिए खड़ा नहीं किया था. केवल एसएफ़पीयू ने उपाध्यक्ष पद के लिए एक महिला को खड़ा किया था.

पंजाब
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एसएफ़एस यानी कनु प्रिया की पार्टी ने केवल अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था.

ये पार्टी साल 2010 से विश्वविद्यालय में सक्रिय है और इसने साल 2014 से चुनाव लड़ना शुरू किया था.

कनु प्रिया साफ़ करती हैं कि एसएफ़एस की वामपंथी विचारधारा है, लेकिन ये आइसा से जुड़ी नहीं है.

वो कहती हैं, "हम अब तक चार बार चुनाव लड़ चुके हैं. इसमें से तीन बार महिला उम्मीदवार को अध्यक्ष पद के लिए खड़ा किया है. इन्हीं बातों ने हमारी पार्टी को दूसरों से अलग बनाया है. और देखिए, अब हम इस मुकाम तक पहुँच पाए हैं."

पार्टी की जीत पर कनु प्रिया कहती हैं कि ये मेरी अकेली की जीत नहीं है. ये पूरी पार्टी की जीत है.


लेकिन विश्वविद्यालय में कई लोगों का मानना था कि एक महिला अध्यक्ष नहीं बन सकती, जो कि अब ग़लत साबित हुआ है.

कनु प्रिया कहती हैं, "राजनीति में रुचि मुझे विश्वविद्यालय में आने के बाद हुई. पार्टियाँ तो कई थीं लेकिन काम जिसका अच्छा लगा मैं उससे जुड़ी."

उनका मानना है कि छात्रसंघ चुनाव में अब पैसा हावी होता जा रहा है. दूसरी पार्टियों के उम्मीदवार चुनाव के दौरान छात्रों को बाहर घुमाने ले जाते हैं, उन्हें फ़िल्में दिखाते हैं.

कनु प्रिया का दावा है कि उन्होंने ये सब नहीं किया, फिर भी उन्होंने जीत हासिल की.

वो कहती हैं, "हम छात्रों से मिलते थे. उनसे बात करते थे और उनके मुद्दों को सुनते थे. इसलिए हमारा ज़्यादा ख़र्चा भी नहीं आया. मैंने चुनाव में बस 3000 रुपये ख़र्च किये होंगे और वो सारा फंड छात्रों ने ही मिलकर जमा किया था."

कनु के छात्रों से जो वादे किये

कनु प्रिया कहती हैं कि उनकी जीत, सालों की मेहनत का नतीजा है.

उन्होंने कहा, "विश्वविद्यालय के छात्रों ने हमारी इस बार की मेहनत को नहीं, बल्कि साल 2010 से जो हम काम कर रहे हैं, उसे देखा. हमारी पार्टी समाज के बीच में ही रहकर छात्रों की बात करती है. और इसका यही मतलब है कि विश्वविद्यालय के छात्रों को छात्रों के ही मुद्दे चाहिए. उन्हें छात्रों को राजनीति करते हुए देखना है. उन्हें मंत्री या किसी पार्टी की काउंसिल नहीं चाहिए."

कनु प्रिया महिलाओं की सुरक्षा पर काम करना चाहती हैं. उनकी माने तो यहाँ जिसकी जान-पहचान ऊपर तक होती है, उनके लिए हॉस्टल में सीट मिलना आसान होता है. बाकी छात्र हर साल कष्ट झेलते हैं.

कनु प्रिया अपने चुनावी वादों की फ़ेहरिस्त को दोहराते हुए कहती हैं, "मैं हॉस्टल आवंटन के इस सिस्टम को बंद करवाना चाहती हूँ. हम इसे ऑनलाइन करना चाहते हैं ताकि किस हॉस्टल में कब और किसके लिए जगह खाली है, ये सारी जानकारी मिल सके. इतना ही नहीं जैसे लड़कों के लिए हॉस्टल पूरी रात खुले होते हैं, लड़कियों के लिए ऐसा क्यों नहीं हो सकता. लड़कियों पर लाइब्रेरी और हॉस्टल में आने-जाने के लिए टाइमिंग की बंदिश नहीं होनी चाहिए."

आख़िर में कनु प्रिया ने कहा कि उनकी जीत बहुत आम है, लेकिन पीयू में पहली बार किसी महिला का अध्यक्ष बनना इसे ख़ास बनाता है.


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