छेड़छाड़ के शिकार होते हैं लड़की बनकर नाचने वाले ये पुरुष

'नकली ब्रेस्ट, लिपस्टिक पाउडर लगाकर पूरा लड़की का रूप धरते थे. लेकिन जब थोड़ी बुद्धि आई तो लगा कि हम क्या कर रहे हैं. और तय किया कि अब पैसा नहीं कमाएंगे, इज़्ज़त कमाएंगे. इज़्ज़त तो पहले भी थी, लेकिन वो ग़ुलाम इज़्ज़त थी."

62 साल के बनारसी मांझी 'आलम' किसी मंझे हुए नेता की तरह सरपट बोले जा रहे थे. आपसी बातचीत में उनकी ज़ुबां पर अंबेडकर, एकलव्य, मदर टेरेसा की शिक्षाएं झट से विराजमान हो जाती हैं.

बनारसी मांझी अपने ज़माने के मशहूर 'लौंडा' थे, जिसे सत्तर के दशक में रसूख वाले अपने 'दरवाज़े' पर नचाने में गर्व महसूस करते थे.

बिहार के ग्रामीण अंचलों में लौंडा नाच बहुत लोकप्रिय है. इसमें स्त्री की वेशभूषा में पुरुष नाचते हैं. ये कलाकार भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर को अपना आदर्श मानते हैं.

हालांकि, भिखारी ठाकुर के नाटकों के केन्द्र में सामाजिक समस्याएं थीं जबकि वर्तमान में लौंडा नाच अश्लील संवाद और इशारों के लिए ज़्यादा जाने जाना लगा है.

लौंडा नाच
Seetu Tiwari/BBC
लौंडा नाच

आंदोलन ने बदला जीवन

बिहार के गया ज़िले के लई गांव के बनारसी ने 14 साल की उम्र से ही लौंडा नाच करना शुरू किया था. उनके पिता लौंडा पार्टी में सारंगी बजाते थे. पिता ने उन्हें बचपन से ही इसके लिए ट्रेनिंग दी.

बनारसी बताते हैं कि उनके लड़कियों जैसे लंबे बाल थे, गला सुरीला था, हाथ और कमर में लोच थी, औरतों जैसी चाल ढाल के चलते उनकी बहुत डिमांड थी.

लेकिन 1978 में बोध गया भूमि आंदोलन ने उनका जीवन बदल दिया. मठ की ज़मीन को भूमिहीनों को बांटने को लेकर हुए इस आंदोलन के दौरान वह आंदोलनकारियों के संपर्क में आए.

बनारसी जेल गए और धीरे-धीरे लौंडा नाच के प्रति उनके मन में दुराव पैदा हुआ.

बनारसी आलम
Seetu Tiwari/BBC
बनारसी आलम

बकौल बनारसी, "हमने सोचा कि लौंडा नाचता है तो लोग कहते थे सरस्वती (हिंदू देवी) की देन है. लेकिन हमने तो कभी सरस्वती को नाचते नहीं देखा. ये लोग सरस्वती के नाम पर निचली जातियों को नचाते हैं और मोटा पैसा कमाते हैं. जब ये बात मुझे समझ आ गई तो हमने अपनी टीम को भंग कर दिया. ज़मीन के आंदोलनकारी बने और पूरा देश घूमे."

फिलहाल बनारसी कठपुतली का नाच दिखाकर और खेती करके अपना जीवनयापन कर रहे हैं. साथ ही वो अपने समाज की बेहतरी के लिए लगातार संघर्ष करते रहते हैं.

ललित कुमार
Seetu Tiwari/BBC
ललित कुमार

बेटी से सामने हुआ शर्मिंदा

बनारसी के गांव से तकरीबन 200 किलोमीटर दूर मछरियावां में 22 साल के ललित परेशान हैं. वो इस पेशे में हैं और आने वाले त्यौहारी मौसम में वो बहुत व्यस्त रहेंगे. ऐसे में उसकी बेचैनी बढ़ गई है.

ललित बताते हैं कि वो फतुहा की एआरडी कोचिंग में वो बिहार पुलिस की तैयारी कर रहे हैं. जितने दिन बाहर रहेंगे, उतना पढ़ाई का नुकसान होगा.

ललित जब पहली बार स्टेज पर चढ़े तब वो आठवीं में पढ़ते थे. दसवीं कक्षा में उन्होंने अपनी पार्टी बना ली. वो ग्रैजुएशन करके बीते चार साल से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. जब उन्होंने ये सब शुरू किया उस वक्त कोई समझ नहीं थी लेकिन आज उन्हें अफ़सोस होता है.

दो बच्चों के पिता ललित कहते हैं, "रात को जब लड़की बनता हूं तो सुबह किसी से आंख मिलाने में बहुत शर्म महसूस होती है. एक बार मेरी बच्ची ने मुझे लौंडा बने देख लिया और जब उसने घर में मुझे उलाहना दी तो लगा कि मैं उसी वक्त मर जाऊं."

ललित कुमार
Seetu Tiwari/BBC
ललित कुमार

दर्शकों की प्रतिक्रिया

इन कलाकारों के जीवन की मुश्किलों से 17 साल के दीपक भी दो चार हैं. दीपक दास से मेरी मुलाक़ात पटना में आयोजित एक लौंडा नाच के दौरान हुई. नीले रंग का चटक लहंगा पहने दीपक स्टेज पर नाच रहे थे और सामने बैठे लोग उनके क़रीब जाने की लगातार कोशिश कर रहे थे.

आरा के एसकेएस कॉलेज के बाहरवीं के छात्र दीपक ने बताया, "कोई अच्छी लड़की सड़क पर चलती है तो लोग उसे छेड़ते हैं. हमें भी जब लोग लड़की बना देखते हैं तो बुरा बर्ताव करते हैं जबकि उन्हें मालूम है कि मैं लड़का हूं. मुझे बहुत नफ़रत होती है लेकिन पैसे के लिए ये करना पड़ेगा."

साल 2013 में दीपक ने जब नाचना शुरू किया तो उनके गांव वालों को मालूम नहीं था. लेकिन जब बात खुली तो साथ पढ़ने वाले लड़कों, गांव वालों और परिवार में बहनों ने तंज कसना शुरू किया.

दीपक कहते हैं, "हम फैक्ट्री में काम करते तो हमें 12 घंटे काम करना पड़ता और यहां एक रात के 500 रुपये मिल जाते हैं. पढ़ाई पूरी करके कोई भी नौकरी कर लेंगे लेकिन अपनी शादी से पहले ये पेशा छोड़ देंगे. मेरी बीबी को भी तो ये अच्छा नहीं लगेगा."

लौंडा नाच
Seetu Tiwari/bbc
लौंडा नाच

कुछ खुश भी

हालांकि, इतनी नकारात्मक आवाज़ों के बीच कुछ ऐसे भी हैं जो खुश हैं.

कुछ जो सरकारी नौकरी पा गए हैं लेकिन इस पेशे को नहीं छोड़ा है.

शैलेश कुमार (बदला हुआ नाम) रेलवे में ड्राइवर हैं. उन्हें 8 साल नौकरी करते हो गए लेकिन नौ साल की छोटी उम्र में जो लौंडा नाच करना शुरू किया था, वो अब तक जारी है.

वो कहते हैं, "जब मौका मिलता है साड़ी पहनकर स्टेज पर खड़े हो जाते हैं नाचने के लिए. ये हमारे भिखारी बाबा की परंपरा है जिसका ज़िम्मा हम पर है. बाकी बीवी नाराज़ रहती है तो उसकी चिंता हमें नहीं. जब तक शक्ति है हम नाचते रहेंगे."

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