• search

नायक और खलनायक के बीच फँसे संजय दत्त की असली और पूरी कहानी

By Bbc Hindi
Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    'अपना लाइफ़ कभी अप, कभी डाउन. ड्रग्स लिया. महंगे होटलों में भी रहा और जेल में भी. घड़ियां भी पहनीं, हथकड़ियाँ भी. 308 गर्लफ्रेंड्स थीं और एक एके-56 राइफल.'

    देवियो और सज्जनो कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए. आगे संजय दत्त यानी संजू बाबा की कहानी है. इस कहानी की शुरुआत उन्हीं से जिन्होंने संजय को जन्म दिया, उनकी माँ नरगिस.

    वो नरगिस जो 'मदर इंडिया' में ग़लत काम करने वाले अपने बेटे बिरजू को गोली मार देती है लेकिन ये पर्दे की बात थी.

    29 जुलाई 1959 को संजय के पैदा होने के बाद नरगिस ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनका दुलारा बेटा ज़िंदगी भर किन-किन आड़े-तिरछे रास्तों से गुज़रेगा.

    नरगिस और सुनील दत्त का बेटा संजय. फ़िल्म्स डिवीजन की डॉक्युमेंट्री में जब माँ नरगिस संजू को तैयार कर चूमती तो वो शरमाकर मुंह छिपा लेता है. छोटा संजू कैमरे की तरफ़ नहीं देखता था, लेकिन बाद के दिनों में उसने ज़िंदगी भर कैमरे के सामने रहना चुना.

    एक टीवी शो में संजय दत्त की आपा ज़ाहिदा ने एक क़िस्सा सुनाया, "संजय दिल का बहुत अच्छा रहा. एक बार नरीमन प्वॉइंट पर ड्राइवर कासिम भाई ने सड़क पर गाड़ी के पास बार-बार घूमते एक बच्चे को तमाचा लगाया तो गाड़ी से घर लौटते हुए संजू खूब रोया. हमें गाड़ी वापस लेनी पड़ी. उस बच्चे को दूध की बोतल दिलाई, तब संजय चुप हुआ".

    एक रेडियो इंटरव्यू में नरगिस ने बताया था, "संजय के पैदा होने के बाद मैं जब शूटिंग के लिए जाती तो वो रोने लगता. स्टूडियो में मैं भी फ़िक्रमंद रहती कि वो ठीक तो होगा. इसलिए मैंने फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ने का फ़ैसला किया".

    संजू के बिगड़ने की शुरुआत

    सुनील दत्त एक क़िस्सा कई बार सुना चुके हैं, एक बार कश्मीर में मज़ाक में उन्होंने संजू को सिगरेट पकड़ाई तो वो पूरी सिगरेट पी गए जिसे देखकर वे हैरान रह गए.

    संजू तब दस के भी नहीं हुए थे, घर पर सुनील दत्त से मिलने प्रोड्यूसर्स या दोस्त आते जो सिगरेट ये लोग पीकर फेंक देते थे. संजय उन्हीं बची हुई सिगरेटों को उठाकर छिपकर पीते.

    संजू को बिगड़ता देखकर उन्हें मुंबई के कैथेड्रल स्कूल से निकाल कर हिमाचल प्रदेश के मशहूर बोर्डिंग स्कूल 'सेंट लॉरेंस' भेज दिया गया. संजय के अगले कुछ साल वहीं बीते.

    संजय को बचपन में म्यूज़िक का शौक था. वो स्कूल की बैंड में सबसे पीछे ड्रम बजाते हुए चलते थे. उनकी बहन प्रिया दत्त ने एक टीवी शो में बताया था- 'संजय को सिर्फ़ एक ही तरह का स्कूल ड्रम बजाना आता था'.

    सुनील दत्त ने फ़ारुक़ शेख़ को दिए एक टीवी इंटरव्यू में क़िस्सा सुनाया था, 1971 के युद्ध के बाद जब भारतीय कलाकार परफॉर्म करने बांग्लादेश जाने वाले थे तो संजय भी जाने की ज़िद करने लगे. जब सुनील दत्त ने कहा कि वहां वो कलाकार जाएंगे, जो कुछ बजा या गा सकें. इस संजय ने कहा- "मैं बांगो बजाऊंगा".

    हारकर संजय को भी ले जाया गया. स्टेज पर लता मंगेशकर गाना गा रही थीं. गाते हुए अचानक लता रुक गईं और मुड़कर देखा कि बांगो ग़लत बज रहा था. इसके बाद लता उन्हें नज़रअंदाज़ करके गाती रहीं.

    ड्रग्स की शुरुआत

    1977 में संजय लॉरेंस स्कूल से 18 बरस की उम्र में घर लौटे. संजय का दाख़िला मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज में करवाया गया.

    यही दौर था जब संजू बाबा ड्रग्स की अंधेरी गली में मुड़ गए, उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि वे अपने कमरे में बंद रहते थे.

    नरगिस को शायद अंदाज़ा था कि उनका बेटा ड्रग्स लेने लगा है लेकिन उन्होंने इसका ज़िक्र सुनील दत्त से नहीं किया.

    संजय ने तय कर लिया कि वो फ़िल्मों में करियर बनाना चाहते हैं. वैसे संजय बड़े पर्दे पर पहली बार 1971 में 'रेशमा और शेरा' फ़िल्म में बाल कलाकार की तरह दिखे थे.

    बहरहाल, सुनील दत्त ने उनकी ट्रेनिंग करवाई. जब संजय फ़िल्मों के लिए तैयार हो गए तो उन्होंने 'रॉकी' फ़िल्म में संजय को बतौर हीरो लिया और टीना मुनीम को हीरोइन. फ़िल्म की शूटिंग शुरू हुई.

    कैंसर और दर्द का रिश्ता

    जब 'रॉकी' की शूटिंग चल रही थी उसी दौर में पता चला कि नरगिस को कैंसर है, इलाज के लिए सुनील दत्त उन्हें अमरीका ले गए.

    दो महीने कोमा में रहने के बाद जब उन्हें होश आया तो उन्होंने आँखें खोलते हुए पूछा- "संजय कहाँ है?"

    अस्पताल में सुनील दत्त नरगिस की आवाज़ रिकॉर्ड किया करते थे. उन्होंने अपने बेटे संजू के लिए ऑडियो मैसेज अस्पताल में रिकॉर्ड किया था. कुछ वक्त बाद तबीयत कुछ ठीक होने पर नरगिस भारत लौट आईं.

    संजय की पहली फ़िल्म की शूटिंग ज़ोरों पर थी. नरगिस ने सुनील दत्त से कहा था- "चाहे जैसे करिए, मुझे मेरे बेटे की फ़िल्म प्रीमियर में जाना है. स्ट्रेचर या व्हीलचेयर जो भी हो".

    सुनील दत्त ने सारी तैयारी कर भी दी थी. 7 मई 1981 को 'रॉकी' का प्रीमियर होना था. लेकिन नरगिस की तबीयत फिर बिगड़ गई. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनका शरीर जवाब देने लगा. 3 मई 1981 को नरगिस ने दुनिया को अलविदा कह दिया यानी 'रॉकी' के प्रीमियर से चार दिन पहले.

    फ़िल्मी पर्दा हो या ज़िंदगी, किसी के आने या जाने से कहानियां रुकती नहीं हैं.

    संजय दत्त ने एक इंटरव्यू में बताया था कि माँ की मौत के बाद वे बिल्कुल नहीं रोए थे.

    सिमी गरेवाल को दिए गए इंटरव्यू में सुनील दत्त ने बताया था कि 'रॉकी' के प्रीमियर के दिन सिनेमा हॉल में एक कुर्सी खाली रही. किसी ने आकर 'दत्त साहेब ये सीट खाली है'. इस पर उन्होंने कहा था- 'नहीं, ये मेरी पत्नी की सीट है'. रॉकी रिलीज़ हुई और लोगों को पसंद भी आई.

    नरगिस के गुज़रने के बाद संजय दत्त टीना मुनीम और ड्रग्स दोनों के और क़रीब आ गए.

    संजय दत्त ने अपने कई इंटरव्यू में खुलकर स्वीकार किया, "जितने भी तरह के ड्रग्स होते हैं, मैंने सब लिए. कहा जाता है कि 10 में से एक इंसान को किसी न किसी चीज़ की लत होती है. ये लत खाने, जुआ खेलने, शराब पीने या ड्रग्स लेने की हो सकती है. मैं इन 10 में से एक था. ड्रग्स लेना एक तरह की बीमारी है."

    उन्होंने बताया कि एक ड्रग एडिक्ट को कोई स्वीकार नहीं करता है लेकिन "डैड ने मुझे स्वीकार किया. वो प्रोड्यूसर्स को फोन कर कहते थे कि तुम मेरे बेटे को लेने से पहले सोच लो, वो ड्रग्स लेता है."

    'मैंने ड्रग्स छोड़ा क्योंकि...'

    संजय दत्त ने एक टीवी शो में बताया था, "एक दिन सुबह मेरी आँख खुली. पास में एक नौकर खड़ा था. मैंने कहा- भूख लगी है कुछ खाने को लाओ. ये सुनकर उसकी आंखों में आंसू आ गए. मैंने वजह पूछी तो वो बोला- 'आप दो दिन बाद सोकर उठे हैं'. मैंने शीशा देखा तो चेहरे पर सूजन थी, बिखरे बाल थे.

    "मुझे लगा कि मैं मर जाऊंगा. मैं डैड के पास गया और बोला- 'मुझे आपकी मदद चाहिए'. डैड ने मुझे मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया".

    1984 की शुरुआत में ड्रग्स की लत छुड़वाने के लिए सुनील दत्त उन्हें अमरीका ले गए, यही वक़्त था जब टीना से उनके रिश्ते टूट गए.

    अमरीका में ड्रग्स रिहैब में संजय एक ग्रुप में बैठे थे, तभी एक लड़के ने अचानक नरगिस का रिकॉर्डेड मैसेज प्ले कर दिया जो प्यारे बेटे संजू के नाम था. मैसेज था,

    ''किसी भी बात से ज्यादा संजू अपनी विनम्रता और चरित्र बचाए रखना. कभी दिखावा मत करना. हमेशा विनम्र रहना और बड़ों की इज़्ज़त करना. यही एक बात होगी जो तुम्हें दूर तक ले जाएगी. ये तुम्हें तुम्हारे काम में भी मदद करेगी.''

    वे बताते हैं, "मॉम की ये आवाज़ सुनी तो मैं घंटों रोया. मॉम के मरने के दो साल बाद ये सुनकर मैं चार-पांच घंटे रोया. जब आंसू रुके तो मैं बदला हुआ था".

    संजय दत्त ने भारत लौटते ही ख़ुद को दोराहे पर पाया, "नौ महीने बाद भारत लौटा तो मेरे घर पहुंचने के बाद जो पहला शख्स मुझसे मिलने आया, वो था एक ड्रग पैडलर. मेरे पास दो रास्ते थे. पहला मैं ड्रग्स ले लेता. दूसरा मैं इनकार कर देता. मैंने दूसरा रास्ता चुना".

    इलाज के लिए नौ महीने अमरीका में रहे संजय ने तय कर लिया कि वे फिल्म इंडस्ट्री छोड़कर अमरीका चले जाएँगे और बिजनेस करेंगे.

    लेकिन तभी पप्पू वर्मा ने 'जान की बाज़ी' फ़िल्म के लिए संजय दत्त को साइन कर लिया. ये फ़िल्म 1985 में रिलीज़ हुई संजय दत्त का अमरीका जाना टल गया.

    संजय दत्त की ज़िंदगी में एक सुहाना मोड़ 1986 रिलीज़ हुई महेश भट्ट की फ़िल्म 'नाम' के साथ आया, फ़िल्म के गानों के बोल भी कुछ वैसे थे, जैसे उन्हें अमरीका जाने से रोकने के लिए लिखे गए हों. 'तू कल चला जाएगा..... चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है..'

    कई मुहब्बतों के बाद संजय दत्त का दिल ऋचा शर्मा पर जा टिका. वो देवानंद की खोज थीं. वे मिलने लगे और एक-दूजे के करीब आ गए.

    1987 में उन्होंने शादी की और अगले ही साल एक बेटी हुई, त्रिशला लेकिन अचानक रिचा के सिर में दर्द होने लगा. डॉक्टर्स को दिखाया तो पता चला ब्रेन ट्यूमर है. इलाज के लिए ऋचा और त्रिशला अमरीका शिफ्ट हो गईं.

    'नाम' की कामयाबी के बाद फ़िल्में लगातार फ्लॉप होती रहीं लेकिन माधुरी दीक्षित और सलमान खान के साथ की 1991 में आई फ़िल्म 'साजन' ने धूम मचा दी.

    इस बीच संजय दत्त और ऋचा के बीच दूरियां बढ़ गईं, माधुरी दीक्षित के साथ उनका नाम जोड़ा जाने लगा.

    कहानी खलनायक बन जाने की

    अब तक की कहानी दत्त परिवार के कई पुराने ऑडियो-वीडियो इंटरव्यू और डॉक्युमेंट्री पर आधारित थी. लेकिन संजय दत्त से जुड़े सबसे अहम और स्याह पन्ने अभी पलटने बाकी हैं.

    1993 में संजय 'आतिश' की शूटिंग के लिए मॉरीशस गए हुए थे. भारत में 1993 में हुए बम धमाकों की जांच चल रही थी. समीर हिंगोरा और हनीफ कड़ावाला ने पुलिस को बताया कि संजय के पास एके-56 राइफल थी.

    संजय दत्त
    AFP
    संजय दत्त

    संजय जब मुंबई लौटे तो उन्हें आतंकवाद निरोधक क़ानून 'टाडा' के तहत गिरफ्तार कर लिया गया.

    'द क्रेजी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ बॉलीवुड बैडबॉय' में यासिर उस्मान लिखते हैं, ''संजय ने पुलिस को बताया कि फिरोज ख़ान की यलगार फ़िल्म की शूटिंग के दौरान दुबई में उनकी मुलाकात दाऊद और अनीस से हुई थी. संजय ने अबु सलेम, हनीफ और समीर से तीन एके-56 ली थी. लेकिन दो एके-56 बाद में लौटा दी.''

    सुनील दत्त को ये यकीन नहीं हो रहा था कि संजय ऐसा कैसे कर सकते हैं? तहलक़ा मैगज़ीन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, उन्होंने बेटे से पूछा कि उन्होंने ऐसी हरकत क्यों की, इसके जवाब में संजय दत्त ने कहा ''मेरी रगों में मुस्लिम खून दौड़ रहा है. शहर में जो हो रहा था, मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता.''

    संजय दत्त ने कथित तौर पर इस बात को भी स्वीकार किया था कि जब मुंबई बम धमाके हुए तब वह विदेश में थे और उन्होंने अपने दोस्त युसूफ नलवाला से उस राइफल को नष्ट करने के लिए कहा था.

    हालांकि मुकदमे की सुनवाई के दौरान संजय अपने बयान से पलट गए.

    संजय के हथियार रखने की एक वजह 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए दंगे भी थे, ऐसा दावा करने वालों में एस हुसैन ज़ैदी भी हैं.

    'माई नेम इज अबु सलेम' किताब में ज़ैदी लिखते हैं, ''बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मंबई में भीषण दंगे हुए. सुनील दत्त ने घायलों के धर्म की परवाह किए बगैर लोगों की मदद की. संजय भी बढ़-चढ़कर आए. कुछ लोगों को ये बात जमी नहीं. कुछ उग्रपंथी संगठनों ने दत्त परिवार को गालियां और धमकियां देनी शुरू कीं. कुछ जगह सुनील दत्त पर हमले भी हुए. संजय इन फोन कॉल्स से परेशान आ चुके थे. फिल्मी हीरो को लगा कि असल लाइफ में हीरो बनने का वक्त आ गया है.''

    संजय को कुछ दिन जेल में रहना पड़ा लेकिन वो बेल पर बाहर आ गए. फ़िल्मी अफ़वाहों वाली पत्रिकाओं में जहां कभी माधुरी-संजय के रिश्ते बनने की ख़बरें छपती थीं, अब उनमें दोनों के रिश्तों के टूटने की ख़बरें छपने लगीं.

    संजय के जेल जाने का जिस एक आदमी को सबसे ज़्यादा फ़ायदा पहुंचा वो थे सुभाष घई. खलनायक 1993 की बड़ी हिट रही. यही वो साल था, जब संजय की मुलाकात मॉडल रिया पिल्लई से हुई.

    संजय दत्त
    Getty Images
    संजय दत्त

    बेल, जेल, बेल, जेल

    एक साल तक ज़मानत पर रहने के बाद जुलाई 1994 में संजय को फिर जेल जाना पड़ा. इस बार सीधा 'अंडा सेल', वो जगह जहां सबसे खूंखार अपराधियों को रखा जाता है.

    आज से कुछ साल पहले संजय की अपनी बहन प्रिया दत्त से अनबन की खबरें थीं लेकिन जेल के दिनों में दत्त भाई-बहनों के बीच का किस्सा फ़ारुक़ शेख़ के शो 'जीना इसी का नाम है' से दुनिया ने जाना.

    प्रिया दत्त ने इसी शो में बताया था, ''रक्षा बंधन में हम जेल में गए तो डैड ने कहा- राखी बांधो. संजू ने भारी मन से कहा- मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है लेकिन ये कूपन मैंने बचाए हुए हैं. ये कूपन जेल में चाय खरीदने के लिए मिलते थे.''

    प्रिया ने 1998 में कहा था- संजय वो कूपन मेरे पास अब भी हैं.

    सिमी गरेवाल के शो रॉनदेवू में संजय ने जेल के दिनों का एक किस्सा सुनाया था.

    संजय ने कहा, ''जेल में डैड मिलने आते तो कहते- कल हो जाएगा बेटा, कल हो जाएगा. ऐसे ही तीन-चार महीने चलता रहा. एक दिन डैड जब आए और बोले- कल हो जाएगा बेटा, तो मैं चिल्ला पड़ा, डैड कब हो जाएगा. ये सुनकर डैड ने मेरा कॉलर पकड़ा और रोते हुए कहा- मुझे माफ कर बेटा, अब मैं तेरे लिए कुछ नहीं कर सकता.''

    यासिर उस्मान किताब में लिखते हैं कि जब सुनील दत्त को तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार से किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली तो वो बाला साहेब ठाकरे के पास गए. ठाकरे ने खुलकर संजय का बचाव किया और कहा कि दत्त परिवार का कोई भी सदस्य देशविरोधी नहीं है.

    संजय दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा
    AFP
    संजय दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा

    संजय का साथ देने वालों में शत्रुघ्न सिन्हा भी रहे.

    ये इन्हीं ठाकरे की शिवसेना थी, जो एक वक्त में संजय दत्त की फ़िल्मों का जमकर विरोध कर रही थी.

    जेल जाने के 15 महीने बाद संजय को राहत मिली अक्टूबर 1995 में. माथे पर टीका लगाए, सफेद कुर्ता पहने संजय जेल से बाहर आए.

    उनकी रिहाई के दो महीने बाद दिसंबर 1996 में ऋचा शर्मा ने आखिरी सांस ली, रिया पिल्लई से उनकी नज़दीकियाँ और बढ़ने लगीं. रिया से 1998 में संजय ने शादी कर ली. 1999 में उनकी फ़िल्म 'वास्तव' हिट रही और उन्हें बेस्ट एक्टर का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला.

    वास्तव
    BBC
    वास्तव

    साल 2000 में ऐसे ऑडियो सामने आए, जिनमें संजय दत्त छोटा शकील से बात करते सुनाई दिए. ये ऑडियो इंटरनेट पर आज भी मिल जाएंगी.

    यासीर उस्मान अपनी किताब में लिखते हैं, ''सीबीआई इन कॉल्स को रिकॉर्ड कर रही थी. 2002 में इन्हें सबूत की तरह पेश किया गया.

    मुंबई के 58 पाली हिल के जिस बंगले में नरगिस ने एक घर बसाया था, उस घर का हर सदस्य अब अलग-अलग रहने लगा था.

    साल 2003 में संजय दत्त को एक ऐसी फ़िल्म मिली, जिसने उनकी छवि पर शानदार रोगन का काम किया.

    'मुन्नाभाई एबीबीएस' में सुनील दत्त ने संजय के पिता का रोल किया था, फ़िल्म बड़ी हिट साबित हुई. दो साल बाद 2005 में सुनील दत्त ने आखिरी साँस ली. एक बाप और पति, जिसने अपनी सांसों का बड़ा हिस्सा दर्द का रिश्ता निभाने में गुज़ारा.

    'मान्यता प्राप्त' संजय

    रिया से संजय का रिश्ता 2008 तक चला. इसके बाद संजय 'मान्यता प्राप्त' हो गए. मान्यता यानी दिलनवाज़ शेख जिन्होंने प्रकाश झा की फ़िल्म गंगाजल में 'अल्हड़ मस्त जवानी' आइटम सॉन्ग में डांस किया और चर्चा में आईं.

    संजय के मान्यता तो करीब आईं लेकिन बहनें प्रिया, नम्रता और जीजा, दोस्त कुमार गौरव दूर हो गए. संजय-मान्यता की शादी में दोनों बहनें शामिल नहीं हुईं. लेकिन 2010 में जुड़वा बच्चों इकरा और शाहरान को मान्यता ने जन्म दिया. दोनों बुआओं का गुस्सा कुछ कम हुआ.

    लेकिन 1993 के दाग अब भी संजय के दामन पर थे. 2006 में जिस मुन्नाभाई ने लोगों को गांधीगीरी सिखा दी थी, अभी उसके हिंसा के हथियारों को पकड़ने की सज़ा बाकी थी.

    संजय दत्त
    AFP
    संजय दत्त

    2007 में टाडा कोर्ट का फैसला आया कि संजय आतंकवादी नहीं हैं लेकिन उन्हें छह साल की सज़ा सुनाई गई. संजय जेल गए लेकिन जल्दी ही ज़मानत पर बाहर आ गए.

    2013 में सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सज़ा घटाकर पांच साल कर दी. संजय मई 2013 को जेल गए और फरवरी 2016 में अच्छे व्यवहार के आधार पर संजय को जेल से जल्दी रिहा करने का फैसला आया.

    फरवरी 2016 में संजय एक बार फिर माथा पर टीका लगाए बाहर आते हैं. जेल के अंधेरे से निकले संजय के लिए आखिरकार 'सुबह हो गई मामू.'

    संजय दत्त
    AFP
    संजय दत्त

    ख़ासतौर पर अब, जब संजय दत्त की ज़िंदगी पर एक फ़िल्म संजू बनी है. फ़िल्म में रणबीर कपूर संजय का किरदार निभा रहे हैं.

    ये वही रणबीर हैं, जिनके पिता को एक ज़माने में संजय दत्त गुलशन ग्रोवर के साथ पीटने चले गए थे. वजह थी संजय की टीना से मुहब्बत.

    आटोबायोग्राफी 'खुल्लम खुल्ला' में ऋषि कपूर लिखते हैं, ''एक दिन संजू और गुलशन ग्रोवर नीतू के अपार्टमेंट में गए. उन्हें शक था कि मेरा और टीना के बीच कुछ है. बाद में गुलशन ग्रोवर ने मुझे बताया कि संजय नीतू के घर मुझसे लड़ने आया था. लेकिन नीतू ने संजय को समझाया कि ऐसा कुछ नहीं है, जैसा तुम समझ रहे हो. टीना और चिंटू (ऋषि कपूर) के बीच कुछ नहीं चल रहा है.''

    रणबीर कपूर
    AFP
    रणबीर कपूर

    संजय ने अब तक क़रीब 130 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया है. समाजवादी पार्टी के पाले में रहते हुए राजनीति में भी हाथ आजमाया, इस वजह से बहन से मतभेद भी हुए.

    संजय दत्त की कारों का नंबर 4545 होता है, संजय इस उम्र में भी कुछ लोगों के लिए संजू बाबा ही हैं, ढलती उम्र में संजय दत्त ने जैसी बॉडी बिल्डिंग की कि सलमान भी शरमा जाएँ.

    बाबा कहे जाने को कुछ मजबूती संजय के बदन पर गुदे संस्कृत टैटू के मंत्रों को देखकर भी मिल जाती है. टैटू, जिनमें सुनील नरगिस का नाम भी है, ऊँ नम: शिवाय भी और आग फेंकता ड्रैगन भी...

    (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    The real and full story of Sanjay Dutt stuck between the hero and the villain

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X