'मुस्लिम फ़ंड’ के नाम पर 'करोड़ों की ठगी करनेवाला' शख़्स फ़रार, क्या है पूरा मामला
हरिद्वार के ज्वालापुर में एक 'मुस्लिम फ़ंड' का संचालक हज़ारों लोगों के करोड़ों रुपये लेकर फ़रार हो गया है.
पुलिस ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
साथ ही पुलिस ने कबीर म्यूचुअल बेनिफ़िट निधि लिमिटेड (मुस्लिम फ़ंड) के संचालक अब्दुल रज़्ज़ाक के ख़िलाफ़ लुक-आउट नोटिस जारी कर दिया है.
खाताधारकों में कई लोग बेहद ग़रीब हैं और सालों से थोड़ी-थोड़ी रक़म अब्दुल रज़्ज़ाक के पास जमा कर रहे थे ताकि ज़रूरत के वक्त उस पैसे का इस्तेमाल कर सकें, लेकिन रज़्ज़ाक के फ़रार हो जाने से वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.
दूसरी तरफ़ ऐसे लोग भी मौजूद हैं जिनका भरोसा अब भी अब्दुल रज़्ज़ाक पर बना हुआ है और उन्हें उम्मीद है कि रज़्ज़ाक के सामने आने के बाद सारी बातें स्पष्ट हो जाएंगी.
ढाई दशक से चल रहा था मुस्लिम फ़ंड
अब्दुल रज़्ज़ाक ज्वालापुर के ही सराय गांव के रहने वाले हैं. वह 1997 से ज्वालापुर में मुस्लिम फ़ंड नाम का एक चिट फ़ंड चला रहे थे. पिछले कुछ समय से वह प्रॉपर्टी की ख़रीद-फ़रोख्त का काम भी कर रहे थे.
स्थानीय लोगों के मुताबिक़ वह हाफ़िज़ (ऐसा व्यक्ति जिसे क़ुरान कंठस्थ हो) हैं और इसीलिए इलाके में उनकी छवि अच्छी थी, लोग इज़्ज़त करते थे. पिछले 25 साल में अब तक कोई गड़बड़ भी नहीं हुई थी इसलिए उनके प्रति लोगों का विश्वास बना हुआ था.
ज्वालापुर में मेन रोड हज्जाबान मोहल्ले में स्थित कबीर म्यूचुअल बेनिफ़िट निधि लिमिटेड के ऑफ़िस के एक दुकान के फ़ासले पर मौजूद एक मुस्लिम ढाबे के बाहर हमें अरमान और अर्सलान मिले.
अरमान के मुताबिक़, दो-तीन दिन से मुस्लिम फ़ंड का ऑफ़िस नहीं खुल रहा था, लेकिन लोगों ने सोचा कि शायद किसी काम में फंसे होंगे.
लेकिन बीते रविवार, 22 जनवरी को अचानक यह बात फैली कि अब्दुल रज़्ज़ाक लोगों के पैसे लेकर फ़रार हो गए हैं. देखते ही देखते फ़ंड के ऑफ़िस के बाहर खाताधारक जमा होने लगे.
सैकड़ों की संख्या में ये लोग ज्वालापुरी कोतवाली पहुंचे और हंगामा किया.
पुलिस ने अब्दुल रज़्ज़ाक के ख़िलाफ़ उचित क़ानूनी कार्रवाई करने का आश्वासन दिलाकर किसी तरह लोगों को शांत करवाया.
कोतवाली ज्वालापुर में अब्दुल रज़्ज़ाक के ख़िलाफ़ धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (विश्वास के आपराधिक हनन) के तहत केस दर्ज कर लिया गया है.
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मुस्लिम फ़ंड क्या होता है?
जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के उत्तराखंड प्रवक्ता शाह नज़र बताते हैं कि शरिया के मुताबिक़ ब्याज लेना और देना जायज़ नहीं होता. इसलिए ऐसे बैंक या वित्तीय संस्थान जो ब्याज लेते या देते नहीं हैं, उन्हें मुस्लिम फ़ंड कहा जाता है.
ऐसी वित्तीय संस्थाएं न तो जमा पर ब्याज देती हैं और न ही खाताधारकों को दिए जाने वाले क़र्ज़ या लोन पर ब्याज लेती हैं.
अब्दुल रज़्ज़ाक का कबीर म्यूचुअल बेनिफ़िट निधि लिमिटेड (मुस्लिम फ़ंड) भी ऐसे ही काम करता था और चूंकि उसके ज़्यादातर खाताधारक मुसलमान थे इसलिए यह विश्वास दिलाया गया था कि उनका पैसा इस्लामिक तरीक़े से जमा किया गया है.
लेकिन अब तक पुलिस की जांच में जो सामने आया है उससे यह पता लगता है कि अब्दुल रज़्ज़ाक 'इस्लामिक तरीक़े' से जमा फ़ंड का इस्तेमाल ग़ैर-इस्लामिक तरीक़े से कर रहे थे. मतलब यह कि उन्होंने यह पैसा कई बैंकों में जमा किया हुआ था और उनसे ब्याज कमा रहे थे. जमा राशि के आधार पर उन्होंने लोन भी ले रखा था जिन पर बैंकों को ब्याज चुकाया जाना था.
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खाताधारक
अब्दुल रज़्ज़ाक के काम करने का तरीक़ा चिट फ़ंड वाला था और उनके ज़्यादातर खाताधारक ग़रीब तबके के हैं.
चिट फ़ंड के कलेक्शन एजेंट रोज़ इन लोगों के पास जाते थे और दिन की बचत के अनुसार, खाताधारक अपने खाते में जमा करने के लिए पैसे दे देते थे. हर डिपॉज़िट की एंट्री पासबुक में की जाती थी.
खाताधारक ख़ुद भी ऑफ़िस में आकर पैसे जमा करवा सकते थे. इस पैसे पर ब्याज नहीं मिलता था, लेकिन जब आवश्यकता हो तब खाताधारक अपनी जमा रक़म निकलवा सकता था.
फ़ंड से बिना ब्याज का लोन भी मिलता था जिसके लिए जेवर आदि ज़मानत के रूप में जमा करने होते थे.
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पुलिस ने कबीर म्यूचुअल बेनिफ़िट निधि लिमिटेड में काम करने वाले कर्मचारियों को बुलाकर उनसे पूछताछ की और खातों की जानकारी निकलवाई. इसके अनुसार, इस फ़ंड में कुल 13 हज़ार ऐसे खाते थे जिनमें पैसे जमा हैं.
इनमें से साढ़े आठ हज़ार ऐसे खाते हैं जिनमें 500 रुपये से कम जमा थे यानी कि ये ऐसे खाते हैं जिनसे पैसा नहीं निकलवाया जा सकता. 1,107 ऐसे लोग हैं जिनके खातों में 10 हज़ार रुपये से ज़्यादा हैं. इनमें दर्ज रक़म छह-सात लाख रुपये तक है.
ख़ास बात यह है कि इस फ़ंड में सिर्फ़ मुसलमानों के ही खाते नहीं हैं. क़रीब ढाई हज़ार हिंदुओं के भी खाते इस फ़ंड में हैं.
स्थानीय लोगों का कहना है कि दो साल पहले अब्दुल रज़्ज़ाक ने इस फ़ंड का नाम बदलकर कबीर म्यूचुअल बेनिफ़िट निधि लिमिटेड किया था. इससे पहले रज़्ज़ाक के इस फ़ंड का नाम मुस्लिम फ़ंड ही था.
खाते फ़्रीज़, संपत्तियां अटैच करने की तैयारी
हरिद्वार के एसएसपी अजय कुमार सिंह की अब तक की जांच से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि कबीर म्यूचुअल बेनिफ़िट निधि लिमिटेड के पास लोगों के सात-साढ़े सात करोड़ रुपये जमा होने चाहिए. इसके अलावा डेढ़ करोड़ रुपये का क़र्ज़ भी सोने के बदले दिया गया है. इस जमा सोने की क़ीमत भी ढाई करोड़ रुपये के आसपास होनी चाहिए.
पुलिस को अब्दुल रज़्ज़ाक और मुस्लिम फ़ंड के उनके दो सहयोगियों के 23 खातों का अब तक पता चला है जिन्हें फ़्रीज़ करवा दिया गया ताकि इनमें कोई ट्रांज़ैक्शन न हो सके.
एसएसपी ने यह भी बताया कि 'अब्दुल रज़्ज़ाक और उनके सहयोगियों ने जो भी संपत्ति ख़रीदी है, उसकी भी सूची तैयार की जा रही है.
इसके अलावा अब्दुल रज़्ज़ाक के संबंधियों की संपत्तियों की भी जांच की जा रही है और उनके पास जो भी अघोषित संपत्ति मिलेगी उसे अटैच कर लिया जाएगा. यह माना जाएगा कि वह इस फ़ंड के पैसों से ली गई है.'
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मंगलवार शाम तक अब्दुल रज़्ज़ाक़ और उसके परिवार के नाम हरिद्वार रजिस्ट्रार कार्यालय में पुलिस को 22 सम्पत्तियों की रजिस्ट्री मिल गई थी. इन सभी संपत्तियों की बिक्री रोकने के लिए रजिस्ट्रार कार्यालय को लिखा गया है.
पुलिस ने फ़ंड के कलेक्शन एजेंटों के आख़िरी दो दिनों में एकत्र किए गए क़रीब 6 लाख रुपये भी ज़ब्त कर लिए हैं.
एसएसपी ने बताया कि पुलिस ने अब्दुल रज़्ज़ाक के ख़िलाफ़ लुक आउट नोटिस जारी करवा दिया है ताकि उसके विदेश भाग जाने की आशंका न रहे.
लुक आउट नोटिस दरअसल लुक आउट सर्कुलर (एलओसी) होता है. इसका इस्तेमाल संबंधित व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार जाने से रोकने के लिए किया जाता है. (एलओसी) जारी होने के बाद एयरपोर्ट, समुद्री क्षेत्र और बंदरगाहों पर इमिग्रेशन जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति को रोक लिया जाता है ताकि वह देश न छोड़ सके.
सामान्यतः (एलओसी) ऐसे व्यक्ति की आवाजाही रोकने में मदद करती है जिस पर संज्ञेय अपराध का आरोप हो. इसे जारी करवाने के लिए किसी केस के जांच अधिकारी को इमिग्रेशन ब्यूरो, गृह मंत्रालय को दरख़्वास्त करनी होती है.
25 साल का भरोसा एक दिन में कैसे टूटेगा?
अब्दुल रज़्ज़ाक के फ़रार होने से कई लोगों के सामने अपनी सारी जमा-पूंजी खोने का डर पैदा हो गया है तो कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें अब भी यह विश्वास नहीं हो रहा कि अब्दुल रज़्ज़ाक धोखा कर सकते हैं.
अरमान ने बीबीसी हिंदी को बताया कि उनके परिवार के ढाई लाख समेत उनके नज़दीकी रिश्तेदारों के 10 लाख रुपये कबीर म्युचुअल बेनिफ़िट निधि में फंस गए हैं.
हमने उनसे पूछा कि इस मुस्लिम फंड से बस चंद क़दम दूर एक सहकारी बैंक भी है, आपने उसमें पैसे क्यों नहीं जमा करवाए थे?
अरमान कहते हैं, "अब तो सब यही कह रहे हैं. पुलिस भी यही कह रही है लेकिन किसे पता था. इतने सालों से तो सब ठीक ही चल रहा था, अब अचानक ऐसा कर दिया... कोई क्या कह सकता है."
खुरेजा नाम की एक ग़रीब महिला की जमा राशि तो कम है, लेकिन उनकी दिक्कत बड़ी है. उनके 76 हज़ार रुपये अब्दुल रज़्ज़ाक के फ़रार होने से फंस गए हैं. वह बेहद परेशान हैं क्योंकि उनके पति की मौत हो चुकी है और दो जवान बेटियों की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर है.
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अगले महीने उनकी बेटी की शादी है. वह पूछ रही हैं कि वह इसके लिए पैसा कहां से लाएंगी. उनके पास न कोई संपत्ति है और न ही मदद करने वाला कोई और.
खुरेजा अपनी दिक़्क़त लेकर हरिद्वार के वार्ड 41 के पार्षद इसरार अहमद के पास भी पहुंची थीं.
इसरार अहमद कहते हैं ऐसे कई लोग उनके पास शिकायत लेकर आ रहे हैं. कई लोग तो बहुत परेशान हैं, जिनका सारी जमा पूंजी इस फंड में फंस गई है.
इस सवाल के जवाब में कि अब्दुल रज़्ज़ाक आदमी कैसे थे? क्या उनसे इस तरह धोखा देने की आशंका थी?
इसरार अहमद और उनके साथ मौजूद दो लोग कहते हैं, 'आदमी तो अच्छे थे. आदमी तो अब भी अच्छे ही हैं.'
कइयों का भरोसा टूटा नहीं है?
इसरार अहमद कहते हैं कि 30 साल का भरोसा एक दिन में कैसे टूट जाएगा? न जाने क्या बात है?
वह बताते हैं कि हाफ़िज़ अब्दुल रज़्ज़ाक का ज्वालापुर के सराय गांव के रहने वाले हैं और तीन बेटों वाला उनका एक संयुक्त परिवार है. तीनों बेटों की शादी हो चुकी है.
इनमें से दो बेटे तो अब्दुल रज़्ज़ाक के साथ ही मुस्लिम फ़ंड में काम करते थे.
एक बेटा ज्वालापुर में ही आठवीं कक्षा तक का एक स्कूल चलाता है.
इसरार अहमद के अनुसार, मुस्लिम फ़ंड शुरू करने के साथ ही अब्दुल रज़्ज़ाक ने प्रॉपर्टी में निवेश करना शुरू कर दिया था.
राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में ज़मीनों की क़ीमत बढ़ी तो उनकी संपत्ति भी बहुत बढ़ गई और वह इलाके के संपन्न आदमी गिने जाने लगे. लेकिन पिछले कुछ समय से सब-कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा था.
वह कहते हैं, 'ऐसा सुनने में आ रहा है कि वह कुछ परेशान तो थे क़रीब साल भर से. अपनी ज़मीन भी बेचने की तैयारी कर रहे थे. यह भी सुनने में आ रहा है कि उन्होंने कहीं ज़मीन ली थी और उनके पार्टनर ने उन्हें धोखा दे दिया था.'
जब इसरार अहमद ने कहा कि वह सामने आएं तो पता चले कि दरअसल मामला क्या है.... तो उनके साथ बैठे लोगों ने इस पर सहमति जताई.
अब्दुल रज़्ज़ाक के सामने आने का इंतज़ार पुलिस को भी है और अरमान, खुरेजा जैसे उनके खाताधारकों को भी. इनमें से कई की ज़िंदगी का सब-कुछ रज़्ज़ाक के मुस्लिम फ़ंड में दांव पर लगा हुआ है.
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