अयोध्या में बाबरी की याद में बनने वाली मस्जिद 'बाबर की परछाई' से भी दूर रह सकती है

नई दिल्ली- अयोध्या में पवित्र जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है तो धन्नीपुर गांव में सरकार की ओर से दी गई 5 एकड़ जमीन पर मस्जिद के निर्माण की तैयारियां भी चल रही हैं। नई मस्जिद उस बाबरी मस्जिद के बदले में मिली जमीन पर बनाई जाएगी, जो पहले राम जन्मभूमि पर मौजूद थी। इस कार्य के लिए भी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से एक इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन नाम की एक ट्रस्ट बनाई गई है, जो सारे निर्माण कार्यों और उनसे जुड़ी तमाम गतिविधियों पर नजर रखेगी। इस बीच ट्रस्ट के कार्यों से जुड़े लोगों की ओर से जो कुछ कहा जा रहा है, उससे यही जाहिर होता है कि नई मस्जिद पुरानी से पूरी तरह से अलग और आधुनिक नजरिए से तैयार की जाएगी। मस्जिद के लिए तैयार हो रहे कॉम्पलेक्स में 'भारतीय मूल्यों', 'इस्लाम की भावनाओं' और 'मानवता की सेवा' के साथ-साथ इकोलॉजिकल पैरामीटर्स को भी पालन किया जाएगा।

'बाबर की परछाई' से भी दूर रह सकती है नई मस्जिद

'बाबर की परछाई' से भी दूर रह सकती है नई मस्जिद

अयोध्या के धन्नीपुर गांव में जिस ट्रस्ट को मस्जिद के निर्माण की जिम्मेदारी मिली है, वह इसे एक नई शुरुआत मान रहा है। यही वजह है कि ट्रस्ट बाबरी मस्जिद के बदले में बनने वाली मस्जिद को 'बाबर की छाप' से भी दूर रखते हुए गंगा-जमुनी तहजीब की तर्ज पर इसका निर्माण करना चाहता है, जिसमें हिंदू और मुसलमानों की साझी विरासरत की झलक दिखलाई पड़े। ईटी की एक खबर के मुताबिक मस्जिद के ट्रस्ट, जिसे इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन का नाम दिया गया है के प्रवक्ता अतहर हुसैन का कहना है कि यह सेंटर इंडो-इस्लामिक परंपराओं की आधार पर तैयार होगा, जैसा कि औपनिवेशिक काल से पहले हुआ करता था। उन्होंने ये भी कहा है कि यहां से एक नई शुरुआत होने जा रही है, इसलिए इसे 'बाबरी मस्जिद' के प्रभाव से दूर ही रहना चाहिए। अतहर हुसैन पहले भी कह चुके हैं कि मस्जिद का नाम किसी बादशाह (बाबर) के नाम पर नहीं रखा जाएगा।

अयोध्या-फैजाबाद की संस्कृति की झलक मिलेगी

अयोध्या-फैजाबाद की संस्कृति की झलक मिलेगी

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत बाबरी मस्जिद के बदले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को नई मस्जिद के निर्माण के लिए अयोध्या के धन्नीपुर गांव में 5 एकड़ जमीन दी गई है। इसी जमीन पर इंडो इस्लामिक कल्चरल सेंटर का निर्माण होना है। इस सेंटर के आर्काइव्स सेक्शन के कंसल्टेंट क्यूरेटर के तौर पर काम देख रहे शिक्षाविद और फूड क्रिटिक पुष्पेश पंत का कहना है कि इस केंद्र के आर्काइव्स सेक्शन और यहां परोसे जाने वाले खाने के जरिए भी भारत की समग्र संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। इस कॉम्पलेक्स में एक अस्पताल भी बनाया जाएगा। पंत ने ये भी कहा कि 'आर्काइव्स में लखनऊ की संस्कृति नहीं, बल्कि अयोध्या-फैजाबाद की संस्कृति प्रदर्शित करने की योजना है।'

निर्माण में इकोलॉजिकल पैरामीटर्स का भी पालन होगा

निर्माण में इकोलॉजिकल पैरामीटर्स का भी पालन होगा

जब पंत के सामने यह सवाल रखा गया कि क्या मस्जिद के ढांचे में बाबरी मस्जिद की झलक दिखलाई पड़नी चाहिए, क्योंकि इसका निर्माण तो उसी के बदले में होना है तो उन्होंने कहा कि इसमें मेल-मिलाप की छाप महसूस होनी चाहिए, ना कि 'जख्मों' की याद दिलानी चाहिए। उनपर इस बात का बहुत ही गहरा असर पड़ा है कि हिंदू धर्म में पैदाइश और नास्तिक होने के बावजूद उन्हें इस प्रोजेक्ट की कंसल्टेंसी के लिए वक्फ बोर्ड ने संपर्क किया है। वहीं ट्रस्ट की ओर से कंसल्टेंट आर्किटेक्ट बनाए गए और जामिया मिलिया इस्लामिया के फैकल्टी ऑफ आर्किटेक्चर के संस्थापक डीन रहे एसएम अख्तर ने कहा है कि इस कॉम्पलेक्स की डिजाइन समकालीन होगी, जिसमें 'भारतीय मूल्यों', 'इस्लाम की भावनाओं' और 'मानवता की सेवा' के साथ-साथ इकोलॉजिकल पैरामीटर्स को भी पालन किया जाएगा।

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