एक्जिट पोल से तो लगता है राजनीति में बुद्धू हैं राहुल

ओपेनियन पोल के नतीजे बता रहे हैं कि मध्यप्रदेश में जहां भाजपा हैट्रिक करने वाली हैं वहीं राजस्थान में बीजेपी को वापस सत्ता मिल रही है तो वहीं दिल्ली में भी भाजपा सबसे बडी़ पार्टी बनकर उबर रही है तो छ्त्तीसगढ़ में भी रमन सिंह का ही जादू चलने वाला है। सभी राज्यों के ओपेनियन पोल में कांग्रेस को नुकसान बताया जा रहा है जो कि आने वाले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता हैं।
वैसे कांग्रेस की नाकामी से एक सवाल भी लोगों के जेहन में उठ रहा है कि क्या कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी राजनीति की साख पर फेल हो गये हैं, उनका जादू चलने से पहले ही खत्म हो गया है या उनके परिवर्तनशील, आक्रामक रवैये को भारत का जनादेश समझ नहीं पा रहा है या फिर यूं कहे कि भारत के लोगों का मूड समझने में वह फेल हो गये हैं।
फर्स्ट पोस्ट में छपी हरतोष सिंह बाल की रिपोर्ट इस ओऱ इशारा करती है कि एग्जिट पोल के नतीजे केवल कांग्रेस पर ही नहीं बल्कि राहुल गांधी पर भी सवालिया निशान लगाते है।
कांग्रेस पार्टी ने अपनी जीत का दारोमदार राहुल गांधी के कंधों पर सौंपा रखा है.. वह राहुल गांधी जिनके पास दो चुनौतियां मुंह बाये खड़ी है, पहली वह की नेहरू-गांधी के वारिस के रूप में राहुल कांग्रेस की नैया पार लगायेंगे और दूसरी कांग्रेस के खोखले हो रहे संगठन को फिर से एकजुट करके मजबूत बनायेंगे जिसकी बात वह हर रैली और हर भाषण में करते हैं।
बावजूद इसके लोगों के सामने उनकी छवि राजनेताओं जैसी प्रभावशाली नहीं दिख रही हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज औऱ बात करने की भाषा आम लोगों से जुड़ने में उन्हें रोक रही है। क्या कारण है कि राहुल के भाषण लोगों को अच्छे नहीं लग रहे हैं।
इसके अलावा राहुल गांधी के जरिेये हाल ही में दिये गये कुछ बयान जो कि उनकी परिपक्कता पर भी सवाल उठाते हैं, यही नहीं क्लीन राजनीति और युवाओं का समर्थन करने वाले राहुल गांधी की पार्टी ने राजस्थान में भंवरी देवी हत्याकांड में शामिल मल्खान सिंह बिश्नोई की अस्सी बरस की मां अमेरी देवी को टिकट दिया, जो उनके कथनी और करनी में फर्क दर्शाता है। जो कि शायद एक बहुत बड़ा कारण बन रहा है लोगों का राहुल गांधी पर से भरोसा उठना।
हमेशा रैलियों में अपने परिवार के गुणगान को दोहराने वाले राहुल गांधी वैसे तो योग्यता को महत्व देने की बात करते हैं लेकिन दूसरी ओर सन् 1984 के दंगो के लिए जिम्मेदार टाईटलर के बेटे को राजनीति का टिकट बांटते नजर आते हैं। जो कि राहुल गांधी की समझ पर भी प्रश्न उठाता है।
राहुल गांधी की कथनी और करनी में अगर कोई अंतर दिखता है तो इसके पीछे उनकी सोच औऱ पार्टी की सोच का एक ना होना भी बड़ा कारण हो सकता है। फिलहाल अब तक तो जो तस्वीर सामने हैं उसके हिसाब से तो लगता है कि राहुल गांधी के नाजुक कंधों पर कांग्रेस की भारी-भरकम जिम्मेदारी हैं जिसे उठा पाने वह एग्जिट पोल के हिसाब से नाकाम ही दिख रहे हैं। राहुल गांधी की यह कमियां बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार मोदी के लिए फायदेमंद साबित हो रही हैं।
जहां राहुल गांधी की रैलियां नीरस और सतही दिखती हैं वहीं मोदी के रैली में जोश औऱ तर्क दिखते हैं। राहुल की रैली में परिवारवाद का नारा होता है तो मोदी की रैली में विकास औऱ तकनीक की बात होती है।
फिलहाल टक्कर तो कांटे की है ही जिसका जवाब राहुल गांधी कैसे देते हैं..इसको जानने के लिए बस थोड़ा इंतजार बाकी है। देखते हैं कि 8 दिसंबर का दिन राहुल गांधी और उनकी पार्टी के लिए क्या संदेश लेकर आता है? ( पढे: First Post)












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