भाजपा को शिवसेना क्या अब बोझ नज़र आने लगी है? - नज़रिया

शिवसेना
Getty Images
शिवसेना

भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का ढाई दशक से ज़्यादा पुराना गठबंधन टूट की कगार पर है. दोनों तरफ़ से तलवारें खिंच चुकी हैं. बात अब आर-पार की लड़ाई की हो रही है.

अभी तक शिवसेना लगातार हमला कर रही थी और भाजपा चुप थी. अब भाजपा ने पलटवार किया है. इस आक्रमण की अगुआई ख़ुद राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने संभाली है.

अमित शाह ने कहा है कि जो हमारे साथ रहेगा उसे जिताएंगे और जो ख़िलाफ़ जाएगा उसे हराएंगे. इसके साथ ही उन्होंने पार्टी की राज्य इकाई से कहा कि वह अकेले लड़ने के लिए तैयार रहे.

शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की राजनीतिक सूझ-बूझ की उपज है.

जब शिवसेना का मराठी मानुष का आंदोलन ठंडा पड़ा और उसने हिंदुत्व का रुख़ किया तो प्रमोद महाजन ने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और स्वर्गीय वाल ठाकरे के समाने प्रस्ताव रखा कि हिंदुत्व विचारधारा वाली दोनों पार्टियों को साथ मिलकर चलना चाहिए.

मोदी और ठाकरे
Getty Images
मोदी और ठाकरे

शिवसेना को मोदी कभी पसंद नहीं आए

दोनों ने पहली बार 1995 में सरकार बनाई. गठबंधन के प्रारम्भ से ही एक बात साफ़ थी कि शिवसेना बड़ी पार्टी और भाजपा छोटी. यह सिलसिला चलता रहा.

प्रमोद महाजन के रहते ही नितिन गडकरी और प्रदेश भाजपा के कुछ नेताओं ने इसे तोड़ने का प्रयास किया. महाजन के निधन के बाद यह ज़िम्मेदारी गोपीनाथ मुंडे ने संभाली पर 2004 में केंद्र और राज्य से सत्ता के बाहर होने के बाद दोनों दलों के मतभेद बढ़ने लगे.

साल 2013 में जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के मुद्दे पर चर्चा चल रही थी तो सेना ने अपनी ओर से सुषमा स्वराज का नाम आगे बढ़ा दिया. बाल ठाकरे की मौत के बाद सेना को उम्मीद थी कि उन्हें वही रुतबा और सम्मान मिलेगा जो बाल ठाकरे को हासिल था. पर वैसा हुआ नहीं.

इसी तल्खी के बीच दोनों ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा और बड़ी कामयाबी हासिल की. लोकसभा में भाजपा का स्ट्राइक रेट बेहतर था.

विधानसभा चुनाव में सेना की दो शर्तें थीं. हमेशा की तरह सीट भाजपा से ज़्यादा चाहिए और सीट कोई भी पार्टी ज़्यादा जीते लेकिन मुख्यमंत्री सेना का ही होगा.

शिवसेना
Getty Images
शिवसेना

शिवसेना विपक्ष की भूमिका में भी

भाजपा ने इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया और गठबंधन टूट गया. अकेले लड़कर भाजपा राज्य की चौथे नम्बर की पार्टी से सबसे बड़ी ( 122 विधानसभा सीटें) पार्टी बनकर उभरी.

तब से आज तक उद्धव ठाकरे इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि शिवसेना गठबंधन की जूनियर पार्टनर है.

वह केंद्र, राज्य और मुंबई नगर निगम में भाजपा के साथ सत्ता में हैं. पर रोज़ भाजपा को गाली देते हैं.

पिछले साढ़े चार साल से शिवसेना सत्तारुढ़ दल और विपक्ष दोनों की भूमिका एक साथ निभा रही है. इतना ही नहीं वह प्रधानमंत्री पर निजी हमले के मामले में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों से भी कई बार आगे निकल जाती है.

सवाल है कि तीनों जगहों पर सत्ता में साझीदार होने के बावजूद शिवसेना ऐसा व्यवहार क्यों कर रही है.

पहली वजह तो यही है कि वह अब भी भाजपा को बड़ा भाई मानने को तैयार नहीं है. दूसरा कारण आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सीटों की दावेदारी का दबाव बनाने की पेशबंदी है.

मोदी और ठाकरे
Getty Images
मोदी और ठाकरे

शिवसेना की नई शर्तें

विधानसभा चुनाव के लिए शिवसेना की शर्त अब भी वही है, जो 2014 में थी. एक नई शर्त यह जुड़ी है कि यदि गठबंधन में चुनाव लड़ना है तो महाराष्ट्र विधानसभा भंग की जाय और लोकसभा के साथ ही उसके चुनाव हों जिससे लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा के मुकरने की कोई गुंजाइश ही न रहे.

भाजपा अभी तक दोनों शर्तें मानने को तैयार नहीं है. इसके बावजूद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मानता है कि साथ चुनाव लड़ने में फ़ायदा है.

वोटों का बंटवारा न होने के अलावा इसका बड़ा कारण यह है कि लोकसभा चुनाव से ऐन पहले वह नहीं चाहती कि यह धारणा बलवती हो कि उसके सहयोगी दल उसे छोड़कर जा रहे हैं.

ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अमित शाह ने शिवसेना के प्रति ऐसा आक्रामक रुख़ क्यों अपनाया?

क़रीब दो-ढाई महीने पहले उद्धव ठाकरे ने सेना के लोकसभा सदस्यों और वरिष्ठ नेताओं की बैठक बुलाई. बैठक में उन्होंने कहा कि भाजपा से गठबंधन तोड़कर हमें अकेले चुनाव लड़ना चाहिए.

उनके इस प्रस्ताव का सबसे पुरज़ोर समर्थन राज्यसभा सदस्य संजय राउत ने किया. पर लोकसभा के ज़्यादातर सदस्यों का कहना था कि यदि पार्टी अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने का फ़ैसला करती है तो वे इस बार चुनाव नहीं लड़ना चाहेंगे.

देवेंद्र फडणवीस और आदित्य ठाकरे
Getty Images
देवेंद्र फडणवीस और आदित्य ठाकरे

अकेले लड़ने पर किसे लाभ

यह बात अमित शाह को पता है. पर सवाल है कि यह तो थोड़ी पुरानी बात है. फिर इस समय आक्रमण का क्या औचित्य है. विभिन्न समाचार चैनलों और भाजपा के अंदरूनी सर्वेक्षणों की रिपोर्ट बता रही है कि महाराष्ट्र में भाजपा अकेले लड़ी तो गठबंधन की तुलना में बेहतर करेगी.

पर इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि शिवसेना की अलोकप्रियता बढ़ती जा रही है. वह पिछले साढ़े चार साल जो नकारात्मक राजनीति कर रही है, उसका उसे नुक्सान हो रहा है.

भाजपा को लग रहा है कि शिवसेना अब बोझ बन गई है. साथ ही उसे अब राज्य सरकार के गिरने का भी डर नहीं रह गया है. शिवसेना को झटका देने के लिए हो सकता है भाजपा न केवल गठबंधन तोड़ दे बल्कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने का फ़ैसला कर ले.

सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे जिस तरह रोज़ सामना अख़बार के ज़रिए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को निजी तौर पर कोस रहे हैं उससे भाजपा की प्रदेश इकाई में भारी नाराज़गी थी. अमित शाह का बयान शिवसेना के लिए तो था ही अपने कार्यकर्ताओं के लिए भी था.

इसके अलावा भाजपा को पता है कि सेना की जीवन की डोर मुंबई महानगर पालिका से जुड़ी हुई है. भाजपा से गठबंधन टूटते ही वह सत्ता के तीनों केंद्रों से बाहर हो जाएगी. भाजपा अब शिवसेना को अपनी शर्तों पर झुकाकर भी कोई गठबंधन करेगी या नहीं यह भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

ये भी पढ़ें:

धर्म सभा के दौरान अयोध्या के मुसलमानों का कैसे बीता दिन

शिवसेना में महिलाओं को बड़ी ज़िम्मेदारी क्यों नहीं?

'शिवसेना-बीजेपी अलगाव का फ़ायदा कांग्रेस को'

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+