बीटल्स का वो इंटरव्यू और कबीर बेदी के ऐक्टर बनने की कहानी
तब मेरी उम्र क़रीब 19 साल की रही होगी, जब दिल्ली में बीटल्स का मशहूर बैंड आया था. मैं उनके म्यूज़िक का दीवाना था और ठान रखी थी कि किसी भी तरह उनसे ज़रूर मिलूंगा और बातें भी करूंगा. हालांकि ये काम आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा था.

ये कहना है आकर्षक लुक और बेहतरीन व्यक्तित्व के लिए मशहूर अभिनेता कबीर बेदी का.
वो कहते हैं, ''काफ़ी मशक्कत के बाद बड़ी मुश्किल से मैं उनसे मिल सका. मुझे उनका इंटरव्यू रिकॉर्ड करने का भी मौका मिला.''
कबीर बेदी ने वो इंटरव्यू आकाशवाणी में सुनाया. उस समय वो आकाशवाणी के लिए फ़्रीलांसिंग किया करते थे. कबीर बेदी के अनुसार, उस समय परिवार के पास पैसे नहीं थे. इसलिए उन्हें अपनी पढ़ाई और फ़ीस के लिए काम करना पड़ता था.
वो बताते हैं कि आकाशवाणी के कर्मचारियों ने बीटल्स के रिकॉर्ड किए हुए इंटरव्यू को टेप से ही मिटा दिया क्योंकि वो टेप के पैसे बचाना चाहते थे. शायद उन्हें ये एहसास नहीं था कि वो कर क्या रहे हैं.
वो कहते हैं कि 'यदि ये हादसा मेरे साथ नहीं हुआ होता तो मुझे ये अक्ल नहीं आती कि मैं उस समय अपनी ज़िंदगी के साथ कर क्या रहा था.'
कबीर बेदी कहते हैं, ''बहुत सोचने-समझने के बाद मैं मुंबई रवाना हो गया. यहां आकर मैंने पांच साल तक विज्ञापनों के लिए काम किया. साथ ही थियेटर करता रहा और फिर हीरो बन गया.''
अपनी ऑटोबायोग्राफी 'स्टोरीज़ आई मस्ट टेल: दि इमोशनल लाइफ़ ऑफ़ एन एक्टर' की कुछ घटनाओं का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं कि इसे लिखते समय उनके कई पुराने जख़्म फिर से उभर आए.
डिप्रेशन से बेटे का संघर्ष और ख़ुदकुशी
बीबीसी से ख़ास बातचीत में कबीर बेदी कहते हैं, ''मैं जानता था कि मेरा बेटा सुसाइड करने वाला है, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी उसे बचा नहीं पाया. उसका ग़म आज भी मुझे सताता है. मैंने तब इस बात को महसूस किया कि डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति का पूरा परिवार भी उन दिमाग़ी तकलीफ़ों से गुज़र रहा होता है. उस दर्द से निकलना आसान नहीं होता.''
सिद्धार्थ, कबीर बेदी की पहली पत्नी प्रोतिमा के बेटे थे और उनकी दो संतानों में सबसे बड़े थे. 25 साल की कम उम्र में ही वो सीज़ोफ़्रेनिया के शिकार हो गए और फिर आत्महत्या कर ली.
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ओडिसी डांसर रहीं प्रोतिमा गौरी बेदी के साथ 'ओपन मैरिज' ने भी कबीर बेदी को दर्द से गुज़रने को मजबूर कर दिया था.
वो बताते हैं, ''जब आप शादी करते हैं तो सोचते हैं कि कोई साथ होगा. परिवार होगा, बच्चे भी होंगे. वो सब हुआ लेकिन फिर हालात ऐसे बने कि हमें ओपन मैरिज में रहना पड़ा. उसमें हम सब पर क्या गुज़री, इस किताब में उसका भी ज़िक्र किया गया है.''
कबीर कहते हैं, ''यदि आज कोई ओपन मैरिज का ख़्याल रखता है, तो उसे ये ज़रूर जानना चाहिए कि उसे किन हालातों से गुज़रना पड़ेगा.''
उनके अनुसार, ''हमारी बात तो तब की थी, जब ओशो 'फ़्री लव' की बातें किया करते थे. हिप्पियों का ज़माना था, जिनका नारा ही था - मेक लव, नो वॉर.'' लेकिन पुरानी प्रथाओं से निकलकर ओपन मैरिज करने का उनका प्रयास असफल रहा और उन्हें तलाक़ लेना पड़ा.
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चार शादी की कबीर ने
बॉलीवुड के साथ हॉलीवुड में भी काम करने वाले कबीर बेदी भारत के शुरुआती कुछ कलाकारों में से थे. लेकिन वो करियर से ज़्यादा अपनी शादियों के लिए चर्चा में रहे. चौथी शादी तो उन्होंने 70 साल की उम्र में अपने से 29 साल छोटी परवीन दोसांझ से की.
प्रोतिमा के बाद उन्होंने ब्रिटिश मूल की फ़ैशन डिजाइनर सुज़ेन हम्फ़्रीज़ का हाथ थामा. फिर टीवी और रेडियो प्रस्तोता रहीं निकी रिड्स को अपना जीवनसाथी बनाया. आख़िर में, परवीन दोसांझ उनकी ज़िंदगी में आईं.
कबीर बेदी साहिर लुधियानवी का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, ''साहिर साहब ने कहा था कि जिस अफ़साने को अंजाम तक पहुंचाना मुश्किल हो, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना बेहतर है. कई रिश्ते ज़िन्दगी भर नहीं चल सकते.''
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परवीन बॉबी को याद करके भावुक हुए
उसके बाद परवीन बाबी की बात करते वो फिर से भावुक हो उठते हैं.
कबीर कहते हैं, ''परवीन के बारे में लिखना मेरे लिए बहुत मुश्किल था. परवीन बहुत होशियार थीं, कहीं न कहीं मज़हबी भी. बिना किसी की मदद लिए वो मुंबई में बहुत बड़ी स्टार बन गई थीं. मैंने उनके साथ के हर लम्हे का ज़िक्र किया है. आख़िर कैसे प्यार हुआ, कैसे हम क़रीब आए और कैसे अलग हो गए.''
इस किताब में वो लिखते हैं, "उनकी लाश चार दिन बाद जुहू के उनके फ़्लैट में मिली थी. उनका एक पैर गैंग्रीन से सड़ गया था. उनके बेड के पास व्हीलचेयर मिली थी. ये एक स्टार का तन्हा और त्रासद अंत था. जो कभी करोड़ों दिलों की मल्लिका हुआ करती थीं. उनके जानने वाले और कभी प्यार करने वाले तीन लोग महेश भट्ट, डैनी और मैं, उनके अंतिमदर्शन करने जुहू के क़ब्रिस्तान गए थे. हमने उनकी बॉडी को उनके रिश्तेदारों के साथ मिलकर क़ब्र में दफ़्न किया."
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पहली फ़िल्म - हलचल
हिंदी सिनेमा में कबीर बेदी को काम करने का मौका पहली बार 1971 में आई फ़िल्म 'हलचल' में मिला था.
वो कहते हैं, ''ओपी रल्हन साहब से जब मैं मिला तो उन्होंने मुझे देखकर कहा कि अच्छे लगते हो. तुम्हें मैं अपनी फिल्म में लूंगा. यह सुनने के बाद मैंने उनसे पूछ लिया कि सर फ़िल्म की स्टोरी क्या है?''
यह सुनते ही रल्हन साहब कबीर बेदी पर भड़क गए और कहने लगे कि 'तुम मुझसे स्टोरी मांग रहे हो. तुम्हें शर्म नहीं आती.'
उन्होंने कबीर बेदी से कहा, 'मैंने धर्मेंद्र को स्टार बनाया है और तुम कल के लड़के मुझसे फिल्म की स्टोरी पूछते हो. फिल्म करनी है तो करो वरना रहने दो.''
इसके बाद कबीर ने बिना कुछ कहे चुपचाप फ़िल्म कर ली. बाद में उन्हें पता चला कि रल्हन साहब ख़ुद इस फ़िल्म के हीरो हैं और हेलेन उनकी हीरोइन. कबीर और ज़ीनत अमान फ़िल्म में साइड रोल में थे.
कबीर बेदी कहते हैं, ''फ़िल्म तो बुरी तरह पिट गई, लेकिन शुक्र है उसका असर मुझ पर और ज़ीनत पर नहीं पड़ा.''
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