अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव से भारत को झेलने पड़ेगे ये बड़े नुकसान

Tension Between The US and Iran Will Cause India to Suffer These Huge Losses.अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता ही जा रहा है, जानिए इस तनाव के बढ़ने से भारत पर क्या असर पड़ रहा और भविष्‍य में और क्या समस्‍या बढ़ सकती है।

बेंगलुरु। ईरान ने अपने वरिष्ठ जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए बुधवार तड़के इराक स्थित अमेरिका के तीन सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी। ईरान ने यह भी दावा किया कि इस हमले में कम से कम 80 अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं। ऐसे में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव और गहराता जा रहा हैं। अमेरिका ने ईरान के कासिम सुलेमानी को मारना आग में घी डालने जैसा साबित हुआ।

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    इसके बाद से ईरान अमेरिका को बरबाद करने पर आमदा हैं। यहां तक की ईरान ने अमेरिका को परमाणु हमले की धमकी तक दे डाली। हालांकि ईरान के सामने अमेरिका की सेना आधुनिक हथियारों और सैन्‍य सुविधाओं के लिहाज से अत्‍यधिक शक्तिशाली है। अगर दोनों देशों के बीच तनाव और बत्तर होते है, या खुदा न खास्‍ता युद्ध होता है तो अमेरिका के सामने ईरान कही टिक नही सकेगा।

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    लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई का असर दुनिया के कई देशों पर पड़ेगा। उन कई देशों में भारत भी शामिल हैं। भारत को इस लड़ाई का भारी नुकसान होगा। पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे भारत देश के लिए यह तनाव और मुश्किल बढ़ा सकता हैं।

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    मोदी सरकार अगले बजट में देश की बिगड़ी अर्थव्‍यवस्‍था को पटरी पर लाने के प्रयास कर रही है लेकिन अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ रहा तनाव, सारे प्रयास पर पानी फेर देगा। ऐसे में आपको यह जानना चाहिए कि ईरान और अमेरिका का तनाव अगर और बढ़ता है तो भारत को क्या खतरा है और भारत को इसका क्या-क्या खामियाजा झेलना पड़ रहा है और आगे भी झेलना पड़ेगा ?

    पेट्रोल की कीमतों पर असर

    पेट्रोल की कीमतों पर असर

    अमेरिका-ईरान के तनाव का भारत पर असर पहले दिन से ही दिखने भी लगा है। आपको याद हो तो शुक्रवार को जब अमेरिका ने ईरान के चीफ कमांडर कासिम सुलेमानी को मारा था, तब भारत में डीजल और पेट्रोल की कीमत बढ़ गयी थी। मंगलवार को लगातार छठे दिन पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा हुआ। इसका प्रमुख कारण था कि कच्चे तेल की कीमतों में हुई बढ़ोत्तरी। जैसे ही कच्चे तेल की कीमत में थोड़ा भी बदलाव होता है, भारत में डीजल-पेट्रोल की कीमतें भी कम-ज्यादा हो जाती है। भारत में रोजाना के हिसाब से डीजल-पेट्रोल की कीमतें तय होती है। माना जा रहा है कि अभी देश में पेट्रोल, डीजल की कीमतों में और इजाफा हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत अरब देशों के साथ ही ईरान से भी क्रूड ऑयल का आयात करता रहा है। देश में पेट्रोल-डीजल के दाम 14 महीनों के अधिकतम स्तर पर पहुंच चुके हैं। यह तनाव बना रहा तो पेट्रोल और डीजल के दाम और बढ़ेंगे।

    कच्चे तेल के आयात पर संकट

    कच्चे तेल के आयात पर संकट

    भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल कंज्यूमर देश है, जो अपनी 80 फीसदी कच्चे तेल की भरपाई आयात से ही करता है। इसकी प्रमुख वजह है कि भारत में पिछले कई वर्षों में कच्चे के उत्तपादन में बहुत गिरावट आयी है। हाल के वर्षों की बात करें तो भारत ने 2018-19 में 207.3 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया है। अप्रैल-नवंबर 2019 के दौरान रोजाना करीब 45 लाख बैरल तेल आयात किया है। भारत की कच्चे तेल की आयात पर निर्भरता लगातार बढ़ती ही जा रही है। मालूम हो कि भारत और अमेरिका के बीच कच्‍चे तेल को लेकर समझौता भी है लेकिन भारत को अमेरिका से तेल लेना मिडिल ईस्ट की तुलना में काफी महंगा पड़ता है। इसलिए भारत इराक और सऊदी अरब से भी कच्चा तेल ले रहा है।

    अर्थव्‍यस्‍था और डगमगा सकती है

    अर्थव्‍यस्‍था और डगमगा सकती है

    बता दें ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बाद से कच्चे तेल की समुद्र के रास्ते सप्लाई बाधित हो रही है और विवाद बढ़ने पर यह बंद भी हो सकती है जिसका भारत को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। दुनिया भर में क्रूड ऑयल यानी कच्‍चा तेल एक ऐसी कमोडिटी है जिससे कई देशों की अर्थव्‍यवस्‍था चलती है। इसके सस्‍ता और महंगा होने का सीधा असर आम आदमी के जीवन पर पड़ता है। इसकी वजह से देश की इकोनॉमी भी प्रभावित होती है। यह न सिर्फ जीडीपी की ग्रोथ में मदद करता है, बल्कि कुछ देशों के कमाई का य‍ह जरिया भी है।

    ट्रेड डेफिसिट बढ़ेगा

    ट्रेड डेफिसिट बढ़ेगा

    केयर रेटिंग के ताजा आकलन की माने तो अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की वजह से ब्रेंट क्रूड पर भी असर पड़ा है। केयर रेटिंग के अनुसार इसकी कीमत में प्रति डॉलर की बढ़ोत्तरी भारत को सालाना करीब 11,482 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचा सकती है। यानी हमारा ट्रेड डेफिसिट बढ़ाने में भी अमेरिका-ईरान का तनाव अहम रोल अदा कर सकता है। बता दें आयात और निर्यात के अंतर को व्यापार संतुलन कहते हैं। जब कोई देश निर्यात की तुलना में आयात अधिक करता है तो उसे ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) कहते हैं। इसका मतलब यह है कि वह देश अपने यहां ग्राहकों की जरूरत को पूरा करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं का पर्याप्त उत्पादन नहीं कर पा रहा है, इसलिए उसे दूसरे देशों से इनका आयात करना पड़ रहा है।

    महंगाई बढ़ने पर मॉनिटरी पॉलिसी पर असर पड़ेगा

    महंगाई बढ़ने पर मॉनिटरी पॉलिसी पर असर पड़ेगा

    कच्चा तेल और ट्रेड डेफिसिट का नतीजा ये होगा कि महंगाई बढ़ेगी, जो मॉनिटरी पॉलिसी पर असर डालेगी। पहले ही नवंबर 2019 में रिटेल इंफ्लेशन तीन साल में सबसे अधिक 5.5 फीसदी हो गया है। वहीं दूसरी ओर रिटेल फूड इंफ्लेशन भी 10.1 फीसदी के स्तर को छू चुका है। कच्चे तेल और इसके प्रोडक्ट्स होलसेल प्राइस इंडेक्स में 10.4 फीसदी की भागीदारी करते हैं। केयर रेटिंग के अनुसार अमेरिका और ईरान का तनाव भारत में महंगाई पर सीधा असर डालेगा।

    गैस के दामों में बढ़ोत्तरी

    गैस के दामों में बढ़ोत्तरी

    भारत गैस की पूर्ति के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है और करीब 40 फीसदी गैस की पूर्ति आयात से ही होती है। गैस का प्रोडक्शन भी पिछले सालों में घटा है, जिसके चलते गैस की जरूरत को पूरा करने के लिए भारत के लिए आयात मजबूरी बन गया है। वैसे भारत सरकार ने गैस को लेकर अमेरिका से भी समझौता किया है, लेकिन वह मिडिल ईस्ट की तुलना में महंगा है।

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