तेलंगाना चुनाव में 'परिवारवाद' पर चोट, क्या BRS पर पड़ा BJP का असर?
77वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से जो 10वीं बार राष्ट्र को संबोधित किया, उसमें उन्होंने 12 बार 'परिवारवाद' शब्द का इस्तेमाल कर विपक्षी दलों को निशाने पर लिया था। पीएम मोदी भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण को हमेशा से निशाना बनाते रहे हैं। लेकिन, इसबार तेलंगाना विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दलपर भी इसका प्रभाव दिख रहा है।
तेलंगाना की सत्ताधारी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के कम से कम 6 वरिष्ठ नेताओं को इस बार अपने बच्चों की चुनावी लॉन्चिंग टालनी पड़ी है। इसकी वजह ये है कि पार्टी नेतृत्व ने एक परिवार एक टिकट की नीति अपनाई है। इस फॉर्मूले में पार्टी के कई कद्दावर नेता फंस गए हैं।

'एक परिवार एक टिकट' का फॉर्मूला
तेलंगाना के मुख्यमंत्री और बीआरएस अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव ने सिर्फ मौजूदा एमएलए विद्यासागर राव के बेटे संजय राव को ही कोरुतला सीट से टिकट दिया है, क्योंकि खुद राव का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। जानकारी के मुताबिक विधान परिषद के सभापति गुथा सुखेंदर रेड्डी ने अपने बेटे के लिए ने मुनुगोडे या नलगोंडा किसी भी सीट से टिकट मांगा था, लेकिन पार्टी ने दोनों ही सीटों पर सीटिंग विधायकों पर ही बाजी लगाई है।
कई दिग्गजों के बच्चों को मिली मायूसी
कहते हैं कि अपनी छवि चमकाने के लिए अमित रेड्डी ने मुनुगोडे में अपने दादा के नाम वाले ट्रस्ट के मध्यम से कार्यक्रम भी आयोजित किए थे, लेकिन उनकी कोशिशें बेकार चली गई। शिक्षा मंत्री पी सबिता इंद्रा रेड्डी के बेटे कार्तिक रेड्डी ने सार्वजनिक तौर पर खुद के राजेंद्रनगर सीट से लड़ने की योजना बताई थी। जबकि अपनी मां के लिए महेश्वरम सीट का जिक्र किया था। बीआरएस की पहली लिस्ट में उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया गया।
कई नेताओं को टालनी पड़ी बच्चों की चुनावी लॉन्चिंग
इसी तरह से स्पीकर पोचारम श्रीनिवास रेड्डी चाहते थे कि उनके बेटे भास्कर रेड्डी को बांसवाड़ा से टिकट मिल जाए, लेकिन सीएम का स्पष्ट संदेश मिला कि चुनाव उन्हें लड़ना चाहिए, उनके बेटे को नहीं। इसी तरह पूर्व उपमुख्यमंत्री कदियम श्रीहरि चाहते थे की उनकी बेटी काव्या को टिकट मिले, लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट थमा दिया। बीआरएस के ऐसे अनेकों नेता हैं, जो अगली पीढ़ी को इस बार लॉन्च करने की पूरी तैयारी में थे, लेकिन टिकट के ऐलान के साथ उन्हें जोर का झटका लगा है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक,'एम हनुमंत राव के मामले में, उन्होंने अपने और अपने बेटे रोहित के लिए क्रमशः मल्काजगिरी और मेडक चुनाव क्षेत्रों से टिकट मांगा था, लेकिन पार्टी ऐसी नहीं चाहती थी।'
बीआरएस पर पड़ा बीजेपी का असर?
तेलंगाना विधानसा चुनाव को इस बार बीजेपी भी पूरे दमखम के साथ लड़ना चाहती है। क्योंकि, पार्टी के लिए यह 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए रिहर्सल की तरह है, जो उसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। पार्टी ने वहां अपने एक हजार नेता-कार्यकर्ताओं की टीम उतार चुकी है। उसका किसी दल के साथ गठबंधन भी नहीं है। ऐसे में भारत राष्ट्र समिति ने जिस तरह से एक परिवार एक टिकट की नीति अपनाई है, उसे बीजेपी से प्रभावित कहा जा सकता है। क्योंकि, बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व अक्सर बीआरएस को भी परिवार की पार्टी बताते रहे हैं।
वैसे केसीआर ने कोशिश तो जरूर की है, लेकिन पूरी तरह से वह टिकट वितरण को परिवारवाद से मुक्त भी नहीं रख पाए हैं। खुद के चंद्रशेखर राव दो सीटों से लड़ रहे हैं तो उनके मंत्री बेटे केटी रमाराव भी सिरसिला सीट से अपनी उम्मीदवार कायम रखे हुए हैं।












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