तेलंगाना चुनाव में क्या होगी पिछड़ी जातियों के वोटरों की भूमिका? कांग्रेस चल रही है जातिगत जनगणना का दांव
तेलंगाना में पिछड़े वर्ग (BC) की आबादी 56% है। यानी इस वर्ग के मतदाता जिस ओर झुके, उसकी जीत पक्की मानी जा सकती है। तेलंगाना चुनाव में इस बार जातिगत जनगणना और जाति आधारित राजनीति की पैरवी भी खूब की जा रही है। लेकिन, सवाल है कि क्या पिछड़ी जातियों के वोटर वहां चुनावों की हवा बदलने की स्थिति में लग रहे हैं?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी अन्य राज्यों की तरह ही जातिगत जनगणना के वादे को तेलंगाना में भी भुनाने की कोशिशों में जुटे हैं। कांग्रेस की जातिगत रणनीति का असर दूसरे प्रतिद्वंद्वी दलों पर भी नजर आ रहा है। हाल ही में सीएम के चंद्रशेखर राव ने कहा है कि जब उनकी मां बीमार पड़ गई थीं तो मुदिराज समाज की एक महिला ने उन्हें दूध पिलाया था।

तेलंगाना चुनाव में भी पिछड़ी जातियां बनी मुद्दा
वहीं राहुल की राजनीति की लाइन पर अब न केवल कांग्रेस जातिगत जनगणना की बात कर रही है, बल्कि सामाजिक न्याय और महिलाओं को 33% आरक्षण में से पिछड़ों को कोटा देने के भी वादे करने लगी है। वहीं भाजपा की ओर से ऐसी बातें सामने आ रही है कि वो किसी पिछड़े नेता को मुख्यमंत्री बनाने का भी वादा भी कर सकती है। इसके अलावा टिकटों में भी उनकी भागीदारी बढ़ाने के चर्चे हैं।
तेलंगाना में 134 जातियों में बंटा है पिछड़ा वर्ग
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक पिछड़ों की संख्या राज्य में इतनी है कि वह किसी के भी पक्ष में हवा का रुख पलट सकते हैं। लेकिन, दिक्कत ये है कि पिछड़े वर्ग में 134 जातियां शामिल हैं, जिनका समर्थन अलग-अलग दलों के लिए विभाजित रहता है। कई तरह के पिछड़े संगठनों ने यह कोशिश की भी है कि इन सभी जातियों को किसी एक संगठन के दायरे में ले आएं, ताकि सत्ता पर दबदबा कायम किया जा सके, लेकिन नाकामी ही हाथ लगी है।
पिछड़ा वर्ग कल्याण संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जाजुला श्रीनिवास गौड़ के मुताबिक, 'आप एक छोटे समुदाय को एकजुटता से मतदान के लिए तैयार कर सकते हैं। 13% मुसलमान या जनसंख्या में बहुत ही कम हिस्सेदारी वाले ब्राह्मणों को किसी पार्टी के पक्ष में एक होकर वोट देने के लिए मनाने की संभावना के उलट, राज्य की आधी से ज्यादा आबादी को एक छतरी के नीचे लाने की बात कहना जितना आसान है, करना उतना सरल नहीं है।'
अलग-अलग जातियों का भिन्न लक्ष्य
यही नहीं इन 134 पिछड़ी जातियों का चुनावों में लक्ष्य भी अलग-अलग हो जाता है। जैसे गौड़ का कहना है, 'जैसे अगर मुदिराज हो सकता है कि अपने समाज के उम्मीदवार होने की स्थिति में एकजुट होकर मतदान कर दें, लेकिन अगर उम्मीदवार गंगापुत्र समाज से हो गया तो पिछड़ा वर्ग से होने के बावजूद उनमें से अधिकांश वोट उससे छिटक सकता है। इसी तरह, यादव और कुर्मा अपना ज्यादातर वोट पद्मशाली को या एक-दूसरे को नहीं दे सकते......यही बात गौड़, मुन्नुरुकापु, विश्वब्राह्मण, प्रजापति, रजक, वड्डेरा और वंजरा जैसी जातियों के भी साथ है।'
तेलंगाना में इस बार पिछड़े किसे कर सकते हैं वोट?
जानकारों के मुताबिक 2014 और 2018 के चुनावों में पिछड़ी जातियों की बड़ी संख्या बीआरएस के पक्ष में थीं। लेकिन, इस बार उनका बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर जा सकता है। लेकिन, दिलचस्प बात ये है कि पिछड़ी जातियों के युवाओं में भाजपा की स्थिति मजबूत मानी जा रही है।
राहुल ने जिस तरह से पिछड़ों के मुद्दे उठाने शुरू किए हैं, उससे इस वर्ग को ऐसा लग रहा है कि इस बार कांग्रेस उनके सपने साकार कर सकती है। लेकिन, जानकारों की मानें कि इसके बावजूद सभी पिछड़ी जातियों को एक पक्ष में मोड़ पाना अभी तेलंगाना के लिए दूर की कौड़ी है।












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