Same Sex Marriage: सरकार के खिलाफ पूर्व अटॉर्नी जनरल की दलीलें, बुधवार को भी जारी रहेगी सुनवाई
Same Sex Marriage पर बहस के दौरान कभी भारत सरकार के सबसे बड़े वकील रह चुके मुकुल रोहतगी ने ही आज सरकार के खिलाफ दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा, विधवा विवाह पर भी इतनी आसानी से सहमति नहीं बनी थी।

Same Sex Marriage यानी समलैंगिक शादियों को लेकर भारत की सुप्रीम कोर्ट में जिरह हो रही है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच में इस अहम मसले पर सुनवाई के दौरान कहा गया कि पति-पत्नी के बदले स्पाउस का इस्तेमाल होना चाहिए।
बुधवार को भी सुनवाई होगी
लंबी जिरह के बाद मंगलवार को संविधान पीठ ने कहा कि इस मामले की अगले दिन यानी बुधवार को सुनवाई होगी। मंगलवार की सुनवाई के दौरान कुछ और भी अहम बातें कही गईं। पांच प्रमुख बातों पर नजर-
- रोहतगी ने कहा- अगर सरकार और कोर्ट से शादी का अधिकार नहीं मिलता तो ये नागरिकता नहीं देने के समान है।
- समलैंगिक को समान दर्जा न मिलने पर रोहतगी ने कहा- मुझे अपराधी नहीं माना जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से बराबरी भी नहीं मिलती।
- विवाह के लिए कानून का दारोमदार संसद पर नहीं छोड़ा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करती है।
- भारतीय समाज में अभिभावक बच्चों को सेटेल करना चाहते हैं। शिक्षा, पेशा के साथ इसमें शादी चुनना भी शामिल है।
- आरक्षण का प्रावधान वंचितों को बराबरी पर लाने के लिए किया गया। कई कारणों से समाज में असमानता रही है।
विधवा विवाह को समाज ने आसानी से स्वीकार नहीं किया
इससे पहले सुनवाई के दौरान पूर्व अटॉर्नी जनरल रहे मुकुल रोहतगी ने कहा, एक समय ऐसा भी था जब आजाद भारत में हिंदू मैरिज एक्ट के तहत विधवा महिला को दोबारा शादी की परमिशन नहीं थी, लेकिन समय बदला और समाज ने इसे स्वीकार भी किया।
समलैंगिक शादियां अपराध नहीं
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से अपील की है कि एक ऐसा डायरेक्टिव, डेक्लरेशन या घोषणा जारी किया जाए, जिसमें समलैंगिक शादियों को अपराध न माना जाए। ऐसी शादियां करने वाले लोगों को भी बराबरी का अधिकार मिले।
विवाह मूल अधिकार, SC दखल दे
सीजेआई चंद्रचूड़ ने मुकुल रोहतगी की दलीलों के बाद सवाल किया कि अगर विधायिका इस मुद्दे पर संसद में विचार कर रही है तो क्या कोर्ट आदेश पारित कर सकता है? इस पर रोहतगी ने कहा, विवाह मूल अधिकार है। कोर्ट को दखल देना चाहिए।

ट्रांसजेंडर पर बने कानून पर भी बातें हुईं
सरकार की तरफ से पेश तुषार मेहता ने ट्रांसजेंडर के लिए बने कानूनों का हवाला दिया। उन्होंने कहा, सवाल सामाजिक-न्यायिक मान्यता का भी नहीं है, स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी ट्रांसजेंडर के साथ भेदभाव नहीं होगा, कानून में कोई कमी नहीं।
महिला-पुरुष की स्थिति पर कोर्ट में चर्चा
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा, पुरुषों और महिलाओं की बायोलॉजिकल स्थिति पर कोई दुविधा नहीं है। सवाल केवल जननांगों का नहीं। उन्होंने कहा, स्पेशल मैरेज एक्ट में धारणा केवल लिंग और योनि तक सीमित नहीं है।
धारा 377 का भी जिक्र हुआ
इसके साथ-साथ ये भी दलील दी गई है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर किया था तब भी समाज असहज था, लेकिन इसे स्वीकार किया गया। हालांकि, जमीनी हकीकत में बहुत बदलाव नहीं आया है।
समलैंगिकों के साथ भेदभाव नहीं हो
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 की व्याख्या में समलैंगिकता को अपराध मानने से इनकार कर दिया था। कोर्ट का मानना है कि समलैंगिकों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।
सिब्बल का सवाल- सेम सेक्स की शादी टूटने पर बच्चों का क्या होगा
समलैंगिक शादियों पर देश की सबसे बड़ी अदालत में जिरह के दौरान पूर्व कांग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने ऐसी शादियों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि शादियों के टूटने पर बच्चों की जिम्मेदारी के मामले में क्या होगा? ये गंभीर सवाल है।
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सरकार ने सुनवाई के औचित्य पर सवाल किया, CJI बिफरे
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की कोर्ट में मंगलवार को जब इस मामले पर सुनवाई शुरू हुई तो सरकार ने सुनवाई के औचित्य पर सवाल खड़े किए। CJI की नाराजगी पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, सरकार को सोचना पड़ेगा कि इस मामले में पक्षकार बने या नहीं।
संविधान पीठ में सुनवाई
जिन पांच जजों की संविधान पीठ में इस मामले की सुनवाई हो रही है, इसमें चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के अलावा, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एस रवींद्र भट भी शामिल हैं।
RSS और जमीयत सरकार के साथ!
दिलचस्प है कि समलैंगिक शादियों का केंद्र सरकार ने विरोध किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और इस्लामिक संस्था जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने भी इस मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया है। कोर्ट के समक्ष 20 याचिकाएं हैं, जिनपर संयुक्त सुनवाई हो रही है।
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