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Supreme Court on POCSO: नाबालिगों के प्यार को संरक्षण? ‘रोमियो-जूलियट कानून’ क्या है? SC ने क्यों किया जिक्र

Supreme Court on POCSO: सुप्रीम कोर्ट ने POCSO कानून को लेकर एक बेहद जरूरी और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि जो कानून बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया था, वह कई मामलों में बच्चों के लिए ही परेशानी बन रहा है। कोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि, कुछ मामलों में इस कानून का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे नाबालिगों को बेवजह कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

खासकर ऐसे मामलों में, जहां किशोर आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं, वहां POCSO का कठोर इस्तेमाल न्याय के उद्देश्य को नुकसान पहुंचा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि POCSO कानून को समझदारी और सही तरीके से लागू किया जाए।

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इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह POCSO कानून में 'रोमियो-जूलियट' जैसी धारा जोड़ने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को अपराध की श्रेणी में डालने से बचाया जा सके।

क्या है पूरा मामला?

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। इस केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को जमानत दी थी और साथ ही यह निर्देश भी दिया था कि POCSO के हर मामले में शुरुआत में ही पीड़ित की मेडिकल उम्र जांच कराई जाए। उत्तर प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

POCSO के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि POCSO कानून के दुरुपयोग की ओर अदालतें पहले भी कई बार ध्यान दिला चुकी हैं। पीठ ने कहा कि-इन कानूनों के दुरुपयोग को बार-बार न्यायिक संज्ञान में लिया गया है। ऐसे में यह जरूरी है कि माइनर रिलेशनशिप और गंभीर यौन अपराधों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। अदालत ने इस फैसले की एक कॉपी भारत सरकार के लॉ सेक्रेटरी को भेजने का निर्देश भी दिया, ताकि इस मुद्दे पर नीतिगत स्तर पर विचार किया जा सके।

क्या है 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज?

दरअसल, 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज का उन मामलों को में राहत देता है, जहां उम्र में करीब-करीब नाबालिग आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं। यह प्रावधान कई देशों में मौजूद है, ताकि सहमति से बने माइनर रिलेशनशिप को अपराध की कैटेगरी में न डाला जाए।

हालांकि, भारतीय POCSO अधिनियम में फिलहाल यह क्लॉज स्पष्ट रूप से शामिल नहीं है, लेकिन कई अदालतें ऐसे मामलों में न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करती रही हैं। उदाहरण के तौर पर अगर 17 साल की लड़की और 18 साल का लड़का सहमति से संबंध में हैं,उम्र का अंतर बहुत कम है और किसी तरह की जबरदस्ती या शोषण नहीं है। ऐसे मामलों में अदालतें कठोर दंड से बचने का रुख अपनाती हैं। वहीं, जबरदस्ती, शोषण या बड़े उम्र अंतर के मामलों में कानून पूरी सख्ती से लागू होगा।

हाई कोर्ट का आदेश क्यों रद्द किया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि POCSO के हर मामले में जमानत से पहले पीड़िता की मेडिकल उम्र जांच अनिवार्य होगी। अदालत ने कहा कि पीड़िता की सही उम्र ट्रायल के दौरान तय किया जाना चाहिए, न कि जमानत के समय। जमानत की सुनवाई में अदालत सिर्फ यह देख सकती है कि उम्र से जुड़े जो दस्तावेज (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड) पेश किए गए हैं, वे मौजूद हैं या नहीं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस तकनीकी गलती के बावजूद आरोपी को जो जमानत दी गई थी, उसे रद्द नहीं किया जाएगा। यानी आरोपी की जमानत पहले की तरह बनी रहेगी।

'प्रहरी की भूमिका निभाएं वकील'

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में वकीलों की भूमिका पर भी अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अधिवक्ताओं की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे बदले की भावना से दायर मुकदमों को आगे बढ़ाने से बचें और न्याय प्रणाली के दुरुपयोग के खिलाफ प्रहरी की तरह काम करें। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि POCSO जैसे कानूनों का दुरुपयोग जारी रहा, तो इससे न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा कमजोर होगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल POCSO कानून की व्याख्या को जोर देता है, बल्कि यह भी संकेत करता है कि नाबालिगों के प्रेम संबंधों को अपराध की नजर से देखने की प्रवृत्ति पर अब पुनर्विचार जरूरी है।

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