Same Sex Marriage: जानिए क्यों मोदी सरकार समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का कर रही विरोध
Same Sex Marriage: सुप्रीम कोर्ट में आज समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग पर सुनवाई होगी। इसे कानूनी मान्यता देने का केंद्र सरकार विरोध कर रही है। जानिए क्या है आखिर केंद्र सरकार का तर्क

Same Sex Marriage: बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने को लेकर कई याचिकाएं दायर की गई थी। इन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उसका रुख क्या है इसको लेकर जवाब देने को कहा था। लेकिन केंद्र की ओर से समलैंगिक विवाह को लेकर जो जवाब दिया गया है उसपर विवाद भी हो रहा है।
शादी का मतलब आदमी-औरत का बंधन
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जो जवाब दाखिल किया है, उसमे कहा गया है कि भारत में शादी का मतलब सिर्फ एक आदमी और औरत के बीच का बंधन होता है। भारत में कभी भी शादी का मतलब समलैंगिक विवाह नहीं रहा है। ना तो हिंदू और मुस्लिम कानून में समलैंगिक विवाह का कोई जिक्र किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए
सरकार का कहना है कि अगर हमारे विधि निर्माताओं को इस तरह के विवाह को लेकर कोई कानून बनाना होता तो ऐसा पहले ही किया जा चुका होता। जब हमारे पर्सनल लॉ में सीधे तौर पर स्पष्ट किया गया है कि विवाह दो अलग-अलग लिंग के लोगों के बीच होता है, तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के मसले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
यह काम मुख्य रूप से विधायिका का है, वह यह तय करेगा कि समलैंगिक विवाह को लेकर कानून बनना चाहिए या नहीं। कोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि समलैंगिक विवाह को लेकर कानून बनाया जाए।
हर धर्म का दिया हवाला
इसके साथ ही केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन, पारसी लॉ में महिला, पुरुष, पति, पत्नी जैसे शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इन कानूनों में कभी भी यह नहीं सोचा गया कि समलैंगिक विवाह को मान्यता दी जाएगी। इन कानूनों का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है कि विवाह दो विपरीत लिंग के लोगों के बीच होगा, नाकि समलैंगिक। इन कानूनों का रुख बिल्कुल स्पष्ट है शादी सिर्फ महिला और पुरुष के बीच हो सकती है।
शादी पवित्र बंधन
हिंदू लॉ का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि विवाह को पवित्र बंधन कहा गया है। हिंदू लॉ में कहा गया है कि शादी सिर्फ महिला-पुरुष में हो सकता है। मुस्लिम लॉ में भी यही बात कही गई है। मुस्लिम लॉ में महिला और पुरुष के बीच एक कॉन्ट्रैक्ट होता है।
कानून बनाना विधायिका का काम
केंद्र सरकार की ओर से तर्क दिया गया है कि अगर कोई भी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है और कोर्ट यह सोचता है कि रातो-रात सभी कानूनों को बदल दिया जाएगा, तो यह गलत है। केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कहा गया है कि अगर समलैंगिक विवाह को कानूनी करार दिया जाए तो सभी कानूनों में बदलाव करना होगा।
समलैंगिक परिवार की तुलना सामान्य से नहीं हो सकती
सरकार ने कहा कि अगर मान लेते हैं को कोई दो पुरुष या दो महिलाएं आपस में शादी करते हैं तो उन्हें कभी भी महिला-पुरुष की शादी के बराबर नहीं माना जा सकता है। जो माता-पिता होते हैं उनके बच्चे होते हैं और उसे एक परिवार माना जाता है। वहीं जब समलैंगिक विवाह होता है और उन्होंने बच्चों को भी अपने साथ रखा है तो भी इसकी तुलना सामान्य परिवार से नहीं की जा सकती है।
कई कानून बदलने पड़ेंगे
हमने समलैंगिक संबंध को कानूनी करार दे दिया है, लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं है कि ये लोग अब शादी को कानूनी करने की मांग करें। केंद्र ने कहा कि अगर समलैंगिक विवाह को कानूनी करार दिया जाता है तो हमे शादी, तलाक, बच्चा गोद लेने, तलाक के बाद रखरखाव के खर्च से जुड़े तमाम कानूनों को बदलना पड़ेगा। लिहाजा इतने बड़े बदलाव को किया जाना संभव नहीं है।
समाज में अस्थिरता आएगी
अगर समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जाती है तो यह मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है। मौलिक अधिकारों के पार्ट 3 में कहा गया है कि अगर सरकार किसी खास उद्देश्य को हासिल करने के लिए समाज में कोई वर्गीकरण कर रही है तो यह मौलिक अधिकार का हनन नहीं है। अगर समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं देते हैं तो इससे समाज में शादी की व्यवस्था एक स्थिरता देती है।
आर्टिकल 14 का उल्लंघन नहीं
आर्टिकल 14 के उल्लंघन को लेकर केंद्र की ओर से कहा गया है कि हम लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर रहे हैं। हम दो पुरुषों और दो महिलाओं के बीच शादी की अनुमति नहीं दे रहे हैं। लिहाजा यह लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं है।
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आर्टिकल 19-21 का उल्लंघन नहीं
आर्टिकल 19 को लेकर सरकार की ओर से कहा गया है कि हालांकि असोसिएशन का आपको अधिकार है, लेकिन इसे कानूनी मान्यता देने की कोई बाध्यता नहीं है। आर्टिकल 21 का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि अगर समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जाती है तो ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि उनका जीने का अधिकार और स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं है।












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