Assam: असम सरकार द्वारा भैंस और बुलबुल की लड़ाई के लिए बनाई गई SOP रद्द, हाईकोर्ट ने दिया फैसला
Assam: गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने असम सरकार द्वारा दिसंबर 2023 में जारी की गई मानक संचालन प्रक्रिया को रद्द कर दिया है। जो माघ बिहू उत्सव के दौरान भैंस और बुलबुल लड़ाई की अनुमति देती थी। न्यायमूर्ति देवाशीष बरुआ ने पेटा इंडिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि यदि राज्य सरकार इन पारंपरिक गतिविधियों की अनुमति देना चाहती है तो उसे मौजूदा कानूनों में संशोधन करना होगा।
एसओपी रद्द होने का कारण
अदालत ने पाया कि एसओपी पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भैंस और बुलबुल लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले के बावजूद एसओपी ने जानवरों के प्रति क्रूरता को बढ़ावा दिया। एसओपी में नशीले पदार्थों और तेज हथियारों के उपयोग पर रोक लगाई गई थी। लेकिन जानवरों की सुरक्षा की पूर्ण गारंटी नहीं थी।

मुख्यमंत्री का दृष्टिकोण
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जनवरी में इन आयोजनों में भाग लिया और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस दौरान याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया गया कि भैंसों को मारपीट कर लड़ाई के लिए मजबूर किया गया और बुलबुलों को भूखा रखकर नशीले पदार्थ देकर भोजन के लिए लड़ाया गया। राज्य सरकार का कहना था कि यह परंपरा सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे पशु क्रूरता करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट का पूर्व फैसला
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पशुओं को चोट पहुंचने के कारण भैंस लड़ाई पर प्रतिबंध लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बुलबुल लड़ाई भी निलंबित कर दी गई थी। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना कानूनी संशोधन के इस प्रकार की गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या है आगे का रास्ता
असम सरकार के पास अब दो विकल्प बचे हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, और कर्नाटक जैसे राज्यों ने अपनी परंपराओं को बनाए रखने के लिए कानूनों में संशोधन किया है। असम सरकार भी ऐसा कर सकती है। सरकार को मौजूदा कानूनों के तहत पशु कल्याण के मानकों का पालन करना होगा।
संस्कृति और कानून के बीच संतुलन
यह फैसला असम में सांस्कृतिक परंपराओं और आधुनिक पशु कल्याण मानकों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर देता है। सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। अदालत का फैसला इस दिशा में एक कदम है कि कानून और नैतिकता दोनों का सम्मान किया जाए।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय का यह फैसला परंपरा और कानून के बीच एक महत्वपूर्ण संवाद को स्थापित करता है। असम सरकार को अब यह तय करना होगा कि सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखते हुए कानून और पशु कल्याण के मानकों का पालन कैसे किया जाए। यह निर्णय भारत में परंपराओं और आधुनिक मानकों के बीच संतुलन पर एक नई बहस को जन्म देगा।












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