SIR Supreme Court: क्या वोटर लिस्ट के नाम पर हुआ ‘साइलेंट गेम’? SIR पर आज सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा फैसला
SIR Supreme Court: देश की चुनावी राजनीति और लोकतंत्र से जुड़े सबसे बड़े मामलों में से एक पर आज (27 मई) सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाने जा रहा है। मामला है चुनाव आयोग (Election Commission of India) के उस 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' यानी SIR अभियान का, जिसके तहत बिहार से शुरू होकर कई राज्यों में वोटर लिस्ट की दोबारा जांच की गई थी। विपक्ष, सामाजिक संगठनों और कई एक्टिविस्टों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के जरिए लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए और चुनाव आयोग ने अपनी संवैधानिक सीमा पार कर दी।
पूरा विवाद जून 2025 में बिहार से शुरू हुआ, जब चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट का विशेष पुनरीक्षण अभियान शुरू किया। इस प्रक्रिया में उन लोगों से दस्तावेज मांगे गए जिनका नाम 2002 या 2003 की पुरानी वोटर लिस्ट में नहीं मिल रहा था। शुरुआत में 11 तरह के दस्तावेज मांगे गए थे, बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी को भी स्वीकार किया गया।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया ने करोड़ों मतदाताओं पर अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ डाल दिया। उनका तर्क है कि पहले से वोटर लिस्ट में मौजूद व्यक्ति को भारतीय नागरिक माना जाता है, लेकिन SIR ने इस सिद्धांत को उलट दिया।
किन लोगों ने दी चुनौती? (Who Challenged The Exercise)
इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज समेत कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके अलावा नेताओं महुआ मोइत्रा, केसी वेणुगोपाल, मनोज कुमार झा और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने भी याचिका दायर की।
याचिकाओं में कहा गया कि चुनाव आयोग नागरिकता जांच एजेंसी की तरह काम नहीं कर सकता। नागरिकता तय करने का अधिकार केंद्र सरकार और विदेशी ट्रिब्यूनल्स के पास है, न कि चुनाव आयोग के पास।
पश्चिम बंगाल में क्यों बढ़ा विवाद?
यह मामला सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में चर्चा में आया। अदालत में रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में करीब 91 लाख वोटरों के नाम हटाए गए। यह कुल मतदाताओं का लगभग 11.88 प्रतिशत था।
विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में गरीब, प्रवासी और कमजोर तबकों के लोगों के नाम बिना उचित सुनवाई के हटा दिए गए। कई जगहों पर 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' जैसे तकनीकी आधारों पर नाम काटने की बात भी सामने आई।
चुनाव आयोग का क्या है पक्ष?
चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि उसका मकसद सिर्फ वोटर लिस्ट को साफ करना था। आयोग का कहना है कि मृत, डुप्लीकेट, स्थानांतरित या गैर-पात्र लोगों के नाम हटाना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि SIR नागरिकता तय करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चुनावी सत्यापन का हिस्सा था।
आयोग ने यह भी कहा कि बूथ लेवल ऑफिसरों के जरिए घर-घर जाकर जांच की गई और प्रक्रिया को "सॉफ्ट टच" तरीके से लागू किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के पास वोटर लिस्ट संशोधित करने की शक्ति जरूर है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं हो सकता। प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय का पालन जरूरी है।
कोर्ट ने यह भी पूछा था कि क्या SIR का उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान करना था, क्योंकि आधिकारिक नोटिफिकेशन में इसका साफ उल्लेख नहीं था। बाद में अदालत ने अंतरिम आदेश देते हुए आधार, राशन कार्ड और EPIC जैसे दस्तावेजों को भी मान्य बनाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने साफ कहा था कि उद्देश्य "ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करना होना चाहिए, न कि बड़े पैमाने पर नाम हटाना।"
आज का फैसला क्यों है बेहद अहम?
आज आने वाला फैसला सिर्फ वोटर लिस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह तय करेगा कि वोट देने का अधिकार सिर्फ कानूनी अधिकार है या संवैधानिक सुरक्षा से जुड़ा मौलिक अधिकार भी।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट यह भी स्पष्ट कर सकता है कि संविधान के अनुच्छेद 324 और 326 के तहत चुनाव आयोग की शक्तियों की सीमा क्या है। अगर अदालत SIR प्रक्रिया को गलत ठहराती है, तो कई राज्यों में तैयार हुई वोटर लिस्ट और उनसे जुड़े चुनावी नतीजों पर भी राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। यानी आज का फैसला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था की दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक फैसला माना जा रहा है।














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