OBC कार्ड, 2029 में बड़ा रोल...सिद्धारमैया से CM कुर्सी छोड़ने के बदले कांग्रेस ने क्या डील ऑफर की!
Karnataka Political Crisis (Siddaramaiah): कर्नाटक की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा भूचाल आ चुका है। साल 2023 के विधानसभा चुनावों में बंपर जीत के बाद कांग्रेस सरकार जिस सहजता से चल रही थी, अब वह इतिहास बनने जा रही है। दिल्ली के बंद कमरों में चली लंबी मैराथन बैठकों के बाद खबर आ रही है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया 28 मई को अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। बेंगलुरु से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल इतनी तेज है कि सिद्धारमैया ने गुरुवार (28 मई) सुबह अपने सरकारी आवास पर पूरी कैबिनेट को नाश्ते पर बुलाया है, जिसके बाद उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की उम्मीद है।
अंदरखाने खबर यह है कि कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को हटाने के लिए एक ऐसा मास्टर प्लान तैयार किया है, जिसे वह ठुकरा नहीं पा रहे हैं। पार्टी उन्हें सीधे दिल्ली की राजनीति में लाकर एक बड़ा राष्ट्रीय रोल देने की तैयारी कर चुकी है। चलिए जानते हैं कि आखिर दिल्ली में सात घंटे तक चली उस सीक्रेट मीटिंग में क्या खिचड़ी पकी और सिद्धारमैया को क्या ऑफर दिया गया है।

दिल्ली में 7 घंटे चली गुप्त बैठक और 'ऑफर 2029' का पूरा सच
दिखाने के लिए तो कांग्रेस के बड़े नेताओं ने मीडिया के सामने यही कहा कि बैठक सिर्फ राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) चुनावों को लेकर थी। संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने साफ शब्दों में कहा कि नेतृत्व परिवर्तन की खबरें सिर्फ अफवाह हैं। लेकिन, कैमरे के पीछे की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने सिद्धारमैया के साथ वन-टू-वन बात की और उन्हें सम्मानजनक तरीके से कुर्सी छोड़ने का फॉर्मूला समझाया।
इंडिया टूडे की रिपोर्ट के मुताबिक सिद्धारमैया को साफ संदेश दिया गया कि पार्टी अब उन्हें 2029 लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े ओबीसी चेहरे के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है। कांग्रेस मानती है कि पिछड़ा वर्ग और जातिगत जनगणना की राजनीति आने वाले वर्षों में उसके लिए सबसे बड़ा हथियार बन सकती है।
कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया के सामने 'मिशन 2029' का दांव खेला है। राहुल गांधी इस समय देश में जिस तरह से जातिगत जनगणना और सोशल जस्टिस (सामाजिक न्याय) की राजनीति को धार दे रहे हैं, उसके लिए पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक बेहद मजबूत और विश्वसनीय ओबीसी (OBC) चेहरे की जरूरत है। सिद्धारमैया को बताया गया कि कर्नाटक की राजनीति से निकलकर अब उन्हें देश की राजनीति में कांग्रेस का मुख्य ओबीसी चेहरा बनना होगा।
सिद्धारमैया ने तुरंत हामी क्यों नहीं भरी?
सूत्रों का कहना है कि सिद्धारमैया ने तुरंत फैसला लेने के बजाय थोड़ा समय मांगा है। दिल्ली से लौटने के बाद उन्होंने करीबी मंत्रियों और भरोसेमंद नेताओं से बातचीत भी की।
माना जा रहा है कि वह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी राजनीतिक ताकत और सम्मान दोनों सुरक्षित रहें। इसी बीच गुरुवार सुबह उनके सरकारी आवास पर पूरी कैबिनेट की बैठक भी बुलाई गई है। इसके बाद होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर पूरे देश की नजर टिकी हुई है।
राज्यसभा का रास्ता और दिल्ली में 'महा-पदोन्नति' का मास्टर प्लान
पार्टी सिद्धारमैया को जबरन हटाकर कर्नाटक में कोई बगावत मोल नहीं लेना चाहती, इसलिए उनके एग्जिट (Exit) को एक 'प्रमोशन' की तरह पेश किया जा रहा है। आलाकमान ने उन्हें भरोसा दिया है कि आगामी 8 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के जरिए उन्हें संसद भेजा जाएगा और दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) में बेहद अहम संगठनात्मक जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
इसके साथ ही, आलाकमान ने सिद्धारमैया को यह भी आश्वस्त किया है कि दिल्ली आने के बाद उनके मान-सम्मान और उनके गुट के मंत्रियों से जुड़े सभी मुद्दों का पूरा ख्याल रखा जाएगा।
हालांकि, दिल्ली में इस बड़े ऑफर को सुनने के बाद सिद्धारमैया ने तुरंत हां नहीं कहा। उन्होंने कुछ समय मांगा और बेंगलुरु लौटकर अपने सबसे करीबी मंत्रियों और वफादार विधायकों के साथ देर रात तक गुप्त सलाह-मशविरा किया, जिसके बाद ही उन्होंने कैबिनेट की बैठक बुलाने का फैसला किया।
डीके शिवकुमार की ताजपोशी का रास्ता साफ? (Is DK Shivakumar set to become the next Karnataka CM?)
सिद्धारमैया के इस संभावित इस्तीफे की खबरों ने उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (DK Shivakumar) के खेमे में जश्न का माहौल बना दिया है। साल 2023 में जब सरकार बनी थी, तभी से डीके शिवकुमार के समर्थक दावा कर रहे थे कि ढाई-ढाई साल का एक 'पावर-शेयरिंग' समझौता हुआ है, जिसके तहत पहले हाफ में सिद्धारमैया और दूसरे हाफ में शिवकुमार मुख्यमंत्री बनेंगे।
हालांकि, हाईकमान ने कभी भी इस फॉर्मूले को खुले तौर पर स्वीकार नहीं किया था, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि डीके शिवकुमार की बारी आ चुकी है। सिद्धारमैया के हटते ही वे मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार के रूप में सामने आ गए हैं। फिर भी, पार्टी नेतृत्व इस पूरे बदलाव को इस तरह संभालना चाहता है जिससे अक्का (सिद्धारमैया) गुट में यह संदेश न जाए कि वे हार गए हैं और डीके गुट जीत गया है।
राहुल गांधी का 'कास्ट सेंसस' कार्ड और 2029 का बड़ा गणित
अगर इस पूरे घटनाक्रम को गहराई से देखें, तो यह सिर्फ कर्नाटक की सत्ता की लड़ाई नहीं है। यह असल में कांग्रेस की 2029 के लोकसभा चुनावों की एक बहुत बड़ी और सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, कांग्रेस इस समय बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड के सामने ओबीसी और पिछड़े वर्गों को एकजुट करने में जुटी है।
सिद्धारमैया कर्नाटक में 'अहिंदा' (AHINDA - अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलितों का गठबंधन) राजनीति के सबसे बड़े प्रतीक रहे हैं। अगर वे राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के साथ खड़े होते हैं, तो कांग्रेस को पूरे देश के पिछड़े वर्ग के वोट बैंक में पैठ बनाने में बड़ी मदद मिल सकती है।
इसी दूरगामी फायदे को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री को दिल्ली बुलाने की यह पूरी बिसात बिछाई गई है। अब सभी की निगाहें गुरुवार सुबह होने वाले घटनाक्रम पर टिकी हैं कि क्या सिद्धारमैया इस राष्ट्रीय भूमिका को खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं या फिर कर्नाटक की राजनीति में कोई नया मोड़ आता है।














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