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क्या बदलना चाहिए IAS-IPS की भर्ती का तरीका? संसदीय पैनल की रिपोर्ट से चर्चा शुरू

एक संसदीय समिति ने सिविल सर्विस परीक्षा में भर्ती की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार करने का सुझाव दिया है। इसकी वजह ये है कि यह पाया है कि पिछले कुछ वर्षों में सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले 70% से ज्यादा लोग टेक्निकल या मेडिकल बैकग्राउंड के रहे हैं।

समिति की चिंता है कि इस तरह से देश अच्छे इंजीनियरों या डॉक्टरों को गंवा रहा है। कार्मिक, लोक शिकायत और कानून एवं न्याय विभाग से संबंधित संसद की स्थाई समिति ने अपनी 131वीं रिपोर्ट में कहा है, 'इस तरह से हर साल सैकड़ों टेक्नोक्रैट गंवा दिए जाते हैं, जो कि अन्य विशेष क्षेत्र में काम कर सकते हैं और वह भी देश की जरूरत है।'

ias ips recruitment

सिविल सेवा में इंजीनियरों का बढ़ता दबदबा-संसदीय रिपोर्ट
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 'सिविल सेवक बनने की ललक शायद दूसरे क्षेत्रों के कार्यों पर भी प्रतिकूल असर डालता है।' अगर साल 2011 से 2020 के बीच सिविल सेवा परीक्षाओं के माध्यम से चुने गए उम्मीदवारों के आंकड़े देखें तो इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के लोगों की संख्या 46% से बढ़कर 65% हो चुकी थी।

मेडिकल बैकग्राउंड वालों का बदल रहा है ट्रेंड
हालांकि, इस दौरान मेडिकल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों की संख्या में गिरावट भी दर्ज की गई है और वह 14% से घटकर (2011 से 2020 के बीच) सिर्फ 4% रह गए हैं। हालांकि, इस अवधि में मानविकी के सफल उम्मीदवारों की संख्या 23% से 28% के बीच ऊपर-नीचे होती रही। सिर्फ 2012 में इनकी सफलता का ग्राफ 40% तक पहुंच गया था।

मानविकी के उम्मीदवारों की बढ़ गई है चुनौती
रिव्यू ऑफ फंक्शनिंग ऑफ रिक्रूट्मेंट ऑर्गेनाइजेशंस ऑफ गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के नाम से यह रिपोर्ट गुरुवार को ही संसद में पेश की गई है। इस रिपोर्ट के बारे में ओआई ने दिल्ली के एक आईएएस एस्पिरेंट्स सौरभ चौधरी से बात की। उन्होंने कहा कि 'अगर एक आईएएस राजनीति में चला जाए तो उसकी प्रतिभा का वहां पूरा इस्तेमाल नहीं हो सकता। इसी तरह से मेरे हिसाब से टेक्नोक्रैट को इसमें नहीं आने देना चाहिए। यह सही नहीं है। वह अपने मूल फील्ड में अपनी प्रतिभा का और बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।'

रिपोर्ट में पिछले कुछ वर्षों के दिए गए हैं आंकड़े
दरअसल, संसदीय पैनल ने जो रिपोर्ट दी है, उसके अनुसार साल 2020 में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के लिए कुल 833 उम्मीदवारों का चुनाव हुआ था। इनमें से 541 या 65% इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के थे। जबकि, मेडिकल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों की संख्या 33 थी जो कि 4% होता है। जबकि, 193 उम्मीदवार मानविकी विषयों से सफल हुए जो कि 23% है। अन्य की संख्या 66 या 8% है, जो इन सभी विषयों से अलग बैकग्राउंड वाले थे।

वहीं एक साल पहले यानी 2019 में कुल 922 उम्मीदवारों ने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। इनमें से 582 या 63% इंजीनियरिंग, 56 या 6% मेडिकल,223 या 25% मानविकी बैकग्राउंड वाले थे। बाकी 61 या 6% उम्मीदवारों का बैकग्राउंड अलग था।

नीति आयोग ने क्या सुझाव दिए थे?
गौरतलब है कि एक रिपोर्ट के मुताबिक इस स्थिति की वजह से 2018 में नीति आयोग की ओर से एक सुझाव ये आया था कि सिविल सर्वेंट को उनके टैलेंट के हिसाब से पोस्टिंग दी जानी चाहिए, ताकि उनकी विशेषज्ञता का इस क्षेत्र में भी सही उपयोग हो सके। लेकिन, इसपर किसी ने बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। (इनपुट-पीटीआई)

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